1/15/10

कबीर

नाहीं धर्मी नाहीं अधर्मी, ना मैं जती न कामी हो,
ना मैं कहता ना मैं सुनता, ना मैं सेवक स्वामी हो !
ना मैं बंधा ना मैं मुक्ता ना मैं बिरत न रंगी हो,
ना काहू से न्यारा हुआ ना काहू का संगी हो !
ना हम सरग लोक को जाते ना हम नरक सिधारे हो,
सब ही कर्म हमारा कीया हम कर्मन ते न्यारा हो !
या मत को कोई बिरला बूझे सो अटर हो बैठे हो,
मत कबीर काहू को थापे मत काहू को मेटे हो !

कबीर

1 comment:

Arpita said...

कबीर को यहाँ पढ जी खुश हो गया....