1/18/10

रंग-बिरंगे सपने










मैं रंग-बिरंगे सपनों के
नीले दर्पण में
लाल-हरे मस्तूलों वाली
मटमैली सी नाव संभाले
याद तुम्हारी झिलमिल करती श्याम देह
केसर क़ी आभा से
गीला है घर बार
मार कर मन बैठा हूँ
ख़ाली मन की ख़ाली बातें
रातें हैं बिलकुल खामोश
डर लगता है.

मृत्युंजय

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