2/17/10

भूतों की कहानियों में प्रेम

"प्रेम क़ी भूतकथा "
पर कुछ नोट्सनुमा

यह उपन्यास देर से पढ़ पाया, पर मज़ा गया. मुझे कहने दीजिये क़ि अभी तक के आपके कथा संसार में यह सबसे ज़बरदस्त है. अधूरेपन की शिकायत, कथा के बाहर के दबाव, है तो बस एक घनघोर रवानी. "प्रेम की भूतकथा" में ऐसा क्या है जो मुझे इतना आकर्षित करता है? पहली बात है वह भाषा. यह भाषा मुझे अनुवाद की भाषा लगी, अपनी सारी सामर्थ्य में. कभी आपके द्वारा किये गए अनुवाद पढ़ने का मौका नहीं मिला पर कह सकता हूँ क़ि आप एक बेहतरीन अनुवादक हैं. अनुवाद इसलिए याद आया क्योंकि भारतीय औपनिवेशिक देश-काल में उपनिवेशकों और उपनिवेशितों की संस्कृति के बीच एक खास तरह का संवाद इस किताब में मौजूद है. पूरा मसूरी इन भूतों के साथ एक द्वंद्वात्मक सम्बन्ध बनाये हुए है, और यही वह बात होगी जहाँ मेरे जैसे पाठक के लिए यह उपन्यास रोचकता का सृजन करता है. अंग्रेज होते हुए भी ये भूत हमारे स्मृति में हिन्दुस्तान के ही भूत हैं. एक भूली हुई कहानी के ये वाहक हैं, जो अनिवार्यतः हमारे अतीत का हिस्सा है, और हम उस अतीत के रू रू होना चाहते हैं.भूत क्या करते हैं? ज़बरदस्त किस्सागो होने के नाते उनके ऊपर ये ज़िम्मेदारी आयद होती है क़ि वे हमें परेशान करें, हमारा जी दुखाएं और हमको सहने क़ी ताकत अता करें. इस उपन्यास के भूत एक सीधे दुखांत को हमारे लिए एक सहनीय वृत्तान्त में बदल देते हैं. वे हमारे लिए अतीत को एक दूरी पर ले जाते हैं. वे कथा के उन हिस्सों को रेखांकित करते हैं, जो ज्यादा ज़रूरी हैं. वे अपने बयान क़ी ताकत से और अतीत से अपने रिश्तों के बलबूते कथा को नितांत पुरानी बनने से रोकते हैं और पाठक को चुनने का मौका देते हैं. यह जरूर है क़ि विकल्प उनके अपने मिजाज़ से तय होते हैं. जेम्स क़ि हत्या किसने क़ी, यह सवाल, भूत बीच में लटका हुआ छोड़ देते हैं क्योंकि हत्या क़ी स्टोरी चाहने वाले संपादक के खिलाफ वे एलन क़ी कहानी को अधिक जरूरी मानते हैं. यहीं हम फिर एक बार भूतों का अजीमुस्सान कारनामा देखते हैं, हत्या क़ी कहानी के दायरे फैलने लगते हैं और एक पुराने इश्क क़ी नयी कहानी वृत्तान्त क़ि शक्ल हासिल कर लेती है. ठीक यही, किसी जासूसी उपन्यास या के किसी सही घटना के वर्णन से अलग यह कहानी अपने लिए नया रास्ता खोलती है, यथा-अर्थ को रचाने का रास्ता. क्या यह कहानी मुझे असफल प्रेम क़ी पुरानी कहानियों , जिनमे बलिदान देना होता था, क़ी याद दिलाती है? चंद्रधर शर्मा गुलेरी क़ी 'उसने कहा था' और जयशंकर प्रसाद क़ी 'पुरस्कार' को याद करना कैसा रहेगा? इनमे से पहली में लहनासिंह और दूसरी में ममता शहीद होते हैं. पहली कहानी में लहना अपने बचपन के एक आकर्षण और अपने मालिक के प्रति अपनी स्वामिभक्ति को मिला लेता है. दूसरी में ममता अरुण के प्रति अपने विकसित प्रेम को राज्यभक्ति के साथ मिलने क़ी कोशिश करती है. इन दोनों कहानियों में रजा या मालिक के साथ, कहिये राजभक्ति के साथ प्रेम का गहरा रचाव है. चूँकि यह कथा औपनिवेशकों क़ी है, इसलिए मैं ऊपर क़ी कहानियों में पसरे ताने बाने से इस कथा क़ी तुलना नहीं कर सकता. औपनिवेशकों के लिए राज्यभक्ति के मायने अगर खोजे भी जाये तो वे बेहद अलग होंगे. इस कहानी में हम प्रेम के पुराने परिचित ढांचे के जगह एक दूसरा अपरिचित ढांचा देखते हैं. और जैसा के पहले मैंने कहा, यह भी हमारे अतीत का हिस्सा है.भूतों का वक्त के साथ क्या रिश्ता है?वे वक्त को लीनियर नहीं रहने देते, वे वर्त्तमान में नहीं हैं ,वे भूत हैं, पर कहानी में निपट वर्त्तमान के किस्सागो है. वे अवसाद से घिर जाने से हमको बचा लेते हैं. दलालों के जीवन चरित छापते संपादकों क़ी दुनिया से, अनायास नहीं क़ि भूत दिलचस्पी नहीं रखते हैं.हाँ, एक बात थोड़ी खटकती है क़ि पत्रकार को बहुत पहले, पाठक के साथ ही, मिस बीन क़ि कहानी शुरू होने के साथ ही कथा समझ लेनी चाहिए! वह ऐसा कर के अंत में बीन के भूत को रुलाता क्यों है? शानदार उपन्यास लिखने के लिए बधाई.


मृत्युंजय
इलाहाबाद / बंगलुरु

No comments: