8/19/10

शमशेर

शमशेर हिंदी के ही नहीं, संसार के अप्रतिम कवियों में एक हैं। वे प्रेम को उसकी द्वंद्वात्मकता में महसूस करते हैं। तो दया, सहानुभूति के चक्कर और ही दाता का भाव। माशूक के लिए कुर्बान होने क़ी जिद क़ी बजाय वे ग़ालिब के
ज्यादा नजदीक हैं। ' तो फिर संगे-दिल तेरा ही संगे-आस्तां क्यूं हो' वाले ग़ालिब क़ी अगली कड़ी हिन्दुस्तानी कविता में तब हाथ लगती है जब शमशेर
लिखते हैं- 'हाँ, तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं, जिनमें वे फंसने नहीं आतीं' एंगेल्स रचना में विचारधारा को छुपा हुआ मानने के हिमायती थे। शमशेर क़ी कविताएँ इसी चुनौती के साथ लुभाती हैं। उसको
समझने के लिए मुक्तिबोध का सूत्र मेरे तो काफी काम आया-
"अंधियाली मिट्टी क़ी गीली-गीली परतों
में डूबो, डूबो, गड़ो, और गल जाओ"
दो कविताएँ पेश हैं, शमशेर जी को याद करते हुए-


लेकर सीधा नारा


लेकर सीधा नारा
कौन पुकारा
अंतिम आशाओं क़ी संध्याओं से?

पलकें डूबी ही-सी थीं -
पर अभी नहीं;
कोई सुनाता-सा था मुझे
कहीं;
फिर किसने यह, सतो सागर के पार
एकाकीपन से ही, मानो-हार,
एकाकी हो मुझे पुकारा
कई बार?

मैं समाज तो नहीं; मैं कुल
जीवन;
कण-समूह में हूँ मैं केवल
एक कण।

कौन सहारा !
मेरा कौन सहारा !

(1941)



चुका भी हूँ मैं नहीं !


चुका भी हूँ मैं नहीं
कहाँ किया मैंने प्रेम
अभी।

जब करूंगा प्रेम
पिघल उठेंगे
युगों के भूधर
उफान उठेंगे
सात सागर।
किन्तु मैं हूँ मौन आज
कहाँ सजे मैंने साज़
अभी।

सरल से भी गूढ़, गूढ़तर
तत्त्व निकालेंगे
अमित विषमय
जब मथेगा प्रेम सागर
ह्रदय।

निकटतम सबकी
अपर शौर्यों क़ी
तुम

तब बनोगी एक
गहन मायामय
प्राप्त सुख


तुम बनोगी तब
प्राप्य जाय !

(1941)


शमशेर बहादुर सिंह

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