8/6/10

ग़ालिब : चंद अशआर

बहुत दिनों बाद अचानक यह ग़ज़ल नज़र से गुज़री
सोचा इसके कुछ शेर हज़रात के सामने पेश करूं.
इसको पढ़ते ही फिराक़ साहब का वो शेर याद आता है-
"पास रहना किसी का रात की रात
मेहमानी भी, मेजबानी भी"
खैर, ग़ालिब की ग़ज़ल के कुछ शेर यूं हैं -




मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए
जोशे कदह से बज़्म चरागाँ किये हुए

करता हूँ जमा फिर जिगरे लख्त लख्त को
अरसा हुआ है दावते मिश्गां किये हुए

फिर चाहता हूँ नाम ए दिलदार खोलना
जां नजरे दिल फरेबिए उन्वां किये हुए

मांगे है फिर किसी को लब ए बाम पर हवस
जुल्फे सियाह रुख प परीशां किये हुए

दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन
बैठे रहें तसव्वुरे जाना किये हुए

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