8/11/10

गेहूं दो, चावल दो !



1967 में लिखी नागार्जुन की यह कविता पेश है.
कविता में बाबा ने हिन्दुस्तानी दलालों को लक्ष्य बनाया है.
सबसे जोरदार है अंदाज़े बयां -


गेहूं
दो, चावल दो !


गेहूं दो, चावल दो !
इतना दिया, और दो, पुष्कल दो !
गंगा बेकार है, हडसन का जल दो !
चारा दो, फल दो !
हिलेगी कैसे, दुम में बल दो !
गेहूं दो, चावल दो !!

जीत हम जाएँ, सवालों का हल दो !
बटोर लिए हैं राजा-रानी, मोर पंख झल दो !
धोखा खा जाएँ पड़ोसी, ऐसी अकल दो !
उगे हैं बगावत के अंकुए, उनको मसल दो !
रंगी हैं तरुण निगाहें, जादुई काजल दो !

जपे हैं नाम बहुत, उसका फल दो !
फिलहाल गेहूं दो, चावल दो !
और दो, अधिक दो, पुष्कल दो !
कानो को भले बराबर मल दो !
हिलेगी खूब, दुम में बल दो !

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