8/15/10

पास रहो ! -मुक्तिबोध

मुक्तिबोध को एकबार एक आलोचक साब ने पौरुष का कवि घोषित किया,चलिए ये तो फिर भी भला पर बाद उसके, कहा उन्होंने, कि उनकी कविताओं में प्रेम और स्त्री, दोनों गायब हैं.उनके बिम्ब प्रतीक सब पौरुष वाले हैं.
भले मानुष की बात का जवाब क्या देना और नाम में क्या रखा है, पर बात की बात में यह
कविता याद आई, देखिये
और देखते रह जाइए-




तुम चाहे जो हो
नारी, या देश या विश्व
बालक या युवा अश्व
सर्वोत्तम जो भी है-
फुश्पा या चुम्बन या लक्ष्य
श्रेष्ठतम स्वप्नों के कक्ष
वह तुम हो!!
और जो भी है मेरे पास
मन-भीतर
आग या रस
बेबस ह्रदय का बस
सब तुम्हें देने को
उमड़ता है जी!!
और ये, सब देकर
जो कुछ शेष
जैसे दुःख के दारिद्र्य के लत्तर
कमजोरी के बुरे-बुरे रूप स्वरुप बुरे बुरे वेश
उन सबसे
अपने को छिनना भिन्न करने का लक्ष
अभिन्न नहोना है
यानी तुम्हे पाना है
अपने अकेले में न जाने कबसे
लड़ते रहने का कार्य
यह सब स्वीकार्य
बशर्ते कि तुम रहो पास
सहास!!

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