8/19/10

रोना

मैं रोना चाहता हूँ!

आंसू भरे हुए दिमाग पर जोर डाल रहा हूँ
कि बूँद भर भी नहीं निकलेगा आंसू

रोना तो हमेशा किसी के सामने चाहिए

अपने ही सामने बैठ कर रोना
हमेशा की तरफ इस बार भी कम टिका

जब कि मैं चाहता हूँ खूब रोऊँ

इधर उधर देख कर रोना भी
अंततः अपनी तरफ देख कर रोना बन जाता है

इसमें सोने की तुक मिला दूँ क्या?
या फिर खोने का?

(ये पेंटिंग मेरे एक प्रतिभाशाली बेरोजगार दोस्त अनुपम की है.)

मृत्युंजय/बंगलुरु

1 comment:

addictionofcinema said...

Bahut badhiya painting aur bahut bhyanak kavita
rone ki tuk sone ya khone se milane ki dhamki ise ek darawani udasi me duba dalti hai..bahut badhiya
Vimal