8/20/10

काश्मीर क़ी घाटी


काश्मीर की घाटी



काली माई ने अबकी हो!
किसका खून पिया है?
यह विशाल नरमेध यज्ञ हो!
बाकी कौन जिया है?



जी मार दिए नव तरुण-तरुणियाँ
मार दिए बागान

जी
मार दिए केसर के महमह खेत
संगीनों से रेत-रेत कर हत्या कर दी है
हंसी-खेल में मुल्क हुआ शमसान

एक तो मारेंगें
दूसरे रोने न देंगे,
गर कहीं पत्थर उठाया
तीसरे वे गोलियों से भून देंगें.
चार खूंटे ठोंक कर,
जीना बना देंगे कठिन
जटिल कर देंगे हवा में सांस लेना वे,
पोखरों में जहर घोलेंगे
औ आँखें फोड़ देंगे
औ कहेंगे हम तुम्हारी ही हैं करते बात!

कौन है वह राष्ट्र, वह धृत राष्ट्र
जहाँ अंधी नाचती है योगमाया,
अपनों ने भी कसर कहाँ बाकी रक्खी है,
कुटिल भुजंगिनी भारत क़ी सरकार-
एक समूची सभ्य जाति क़ी बलि लेकर भी
दांत दिखाती, लालकिले से करती जाये टनों मसखरी.
ज़री-काम करती भाषण में,
चाक करे है दिल दिमाग.

सस्ती मौत, सस्ती मौत
बेहद सस्ती मौत!
गोली से लाठी से चाकू-संगीनों से
आंसू गैस से बम से
छर्रों से वाटर पाईप से
तन से मन से धन से
मारो, मारो मारो
लालकिले से
मारो
भूख गरीबी महंगाई सब चंडूखाने क़ी गप्पें हैं!
मारो, इस्लामाबाद से मारो
घर में घुस कर मारो
गली गली में मारो
बाढ़ लगी है
घर-दुआर औ पशू-परानी, गल्ला-गेहूं, छाता-जूता नाश हो गए!
जनता को यह चिल्लाने दो !

मार पाई क्या इराकी जनता को सेना,
मार पाई क्या क्लस्टर बम से मन ?
बित्ते भर क़ी भगतसिंह क़ी पार्टी को क्या मार पाए थे अंगरेजी हुक्काम ?
मार सकी क्या भूमिहीन मजदूरों के जन आन्दोलन को
कोई भी सरकार ?
मर सकती क्या आज़ादी क़ी आग?

अभी बर्फ जब जम जाएगी
जभी हिमालय जिन्दा होगा
खून के थक्के बन जाएँगे
जिन्दा-दिल हथियार
प्रतिरोधी कश्मीरी जनता
रक्त पिपासु काली के हाथों का खप्पर तब छीनेगी
इब्लीशों का नाश करेगी
उठा पटक देगी सरकारों का कंकाली ढांचा
असली डेमोक्रेसी अपने लिए बुनेगी
अपने मन से अपने तन से जोड़ेगी
नए नए उद्योग
और अपने बल से अपनी जन्नत को फिर
हासिल कर ही लेगी
धीरज रक्खो!

मृत्युंजय/ बंगलुरु

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