9/3/10

कुमार गन्धर्व: बिरह के बोल

कुमार साहब के स्वरों में एक अ क्लासिक उदात्तत्ता है। ये हमें क्लासिक के आधारों क़ी तरफ ले जाती है। कुमार साहब ने एक बार हिन्दी साहित्य सम्मलेन क़ी पत्रिका के लिए लेख लिखा था जिसमें उन्होंने लोक को सारे शास्त्रीय संगीत का आधार बताया था, और किसी भी नयी खोज के लिए संगीतकारों को उस दिशा में जाने क़ी सलाह दी थी। औरों क़ी छोडिये, कुमार साहब खुद ता-जिन्दगी इसी रास्ते से गुजर कर रचते रहे।

आज सुनिए उनका एक गीत जो मध्यकालीन स्त्री क़ी आवाज़ को अभिव्यक्ति देता है। अगर आपको जायसी के पद्मावत क़ी रानी नागमती और उनके वियोग क़ी याद हो तो कुमार क़ी इस रचना का अर्थ और खुलने लगता है।
"हौं बिन नाह मंदिर को छावा", जिस पर रामचंद्र शुक्ल से मर्यादावादी भी रीझ गए थे.

2 comments:

Ashok Pande said...

बढ़िया!

कभी कबाड़ख़ाने पर भी चढ़ाया था इसे. अब म्यूज़िक अपलोड करना आ गया है सो खूब सुनाओ. तुम्हारे ब्लॉग को अपने ब्लॉगरोल में डाल डाल रहा हूं.

Anonymous said...

bahut khoob agar isame download karne ki suvidha di jay to aur bhi achchha ho.