9/5/10

कुमार गन्धर्व पर सर्वेश्वर

कुमार गन्धर्व एक अनूठे संगीतकार हैं. अपनी लोक सम्पृक्ति और आवेग भरी आवाज़ के साथ वे हमसे तादात्म्य कायम करते हैं. हिन्दी कवियों और रचनाकारों की एक पूरी पीढी उनसे गहरे प्रभावित रही है. पर सब ऐसा नहीं मानते. एक बार लगभग अनौपचारिक सी बातचीत में वरिष्ठ आलोचक शिव कुमार मिश्र ने सवाल खड़ा किया कि "कुमार साहब ने गाने के लिए कबीर के आध्यात्मिक पद ही चुने हैं. दूसरे किस्म के पद वहां नहीं हैं." और यह बात तथ्य के नहीं वरन आरोप की शक्ल में थी. हाँ, यह सच है, पर क्या गायन को हम सिर्फ उसके बोल के लिए सुनने जाते हैं? इसके लिए छपे हुए शब्द ही पढ़ लेना बेहतर होता. गायक गाने को कैसा निभाता है यह भी मानीखेज चीज है. गायन के रूप का कथ्य खोजने की बजाय इतने स्थूल रूप से उसके उपरी ढांचे को छू कर लौट आना मुझे विचित्र और आश्चर्यजनक, दोनों लगा. और जहाँ तक मोटा-मोटी ढांचे की भी बात है, कबीर को तो ऐसे पदों के लिए आध्यात्मिक नहीं कहा जाता. कुमार साहब पर यह इनायत क्यों? जवाब संभव हैं पर इसकी यहाँ जगह नहीं.

कुमार साहब की गायकी की ताकत को शब्दों में ढाल पाना बेहद मुश्किल काम है पर ये चुनौती निभाई सर्वेश्वर जी ने.इस अद्भुत कविता को हम सब तो पढ़ ही रहे हैं, शिवकुमार जी को जरूर ही इसे पढ़ना चाहिए!
आज वही कविता-

सुरों के सहारे

दूर-दूर तक
सोयी पड़ी थी पहाड़ियां
अचानक टीले करवट बदलने लगे
जैसे नींद में उठ चलने लगे.

एक अदृश्य विराट हाथ बादलों-सा बढ़ा
पत्थरों को निचोड़ने लगा
निर्झर फूट पड़े
फिर घूमकर सब कुछ रेगिस्तान में बदल गया.

शांत धरती से
अचानक आकाश चूमते
धूल भरे बवंडर उठे
फिर रंगीन किरणों में बदल
धरती पर बरसकर शांत हो गए.

तभी किसी
बांस के वन में आग लग गयी
पीली लपटें उठने लगीं,
फिर धीरे-धीरे हरी होकर
पत्तियों से लिपट गयीं.

पूरा वन असंख्य बांसुरियों में बज उठा,
पत्तियां नाच-नाचकर
पेड़ों से अलग हो
हरे तोते बन उड़ गयीं.

लेकिन भीतर कहीं बहुत गहरे
शाखों में फंसा
बेचैन छटपटाता रहा
एक बारासिंहा.

सारा जंगल कांपता हिलता रहा.

लो वह मुक्त हो
चौकड़ी भरता
शून्य में विलीन हो गया
जो धमनियों से
अनंत तक फैला हुआ है.


(कुमार गन्धर्व का गायन सुनते हुए)
-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना)

और इसी कविता के साथ सुनिए कबीर का 'अवधू! कुदरत की गति न्यारी',
जहां कबीर और कुमार साहब मिलकर अवधू लोगों का मज़ा ले रहे हैं!

1 comment:

miracle5169@gmail.com said...

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