9/22/10

मुक्ति की आकांक्षा- सर्वेश्वर

मैं आज सर्वेश्वर की एक कविता पढ़ रहा था 'मुक्ति की आकांक्षा'. इसमें कहा गया कि चिड़िया हर हालत में पिंजरे के बाहर निकलना चाहेगी पर जब चिड़िया बहुत दिनों तक बंद रहे तो वह पिंजरे में ही अनुकूलित कर दी जाती है. आज तो हम और ज्यादा अनुकूलन क़ी स्थितियों में रह रहे हैं. तो क्या यह कविता लिखते हुए सर्वेश्वर जी के मन में यह बात न रही होगी? जरूर ही रही होगी, क्योंकि वे असावधान कवि तो नहीं ही हैं.
फिर क्या वजह है?
पिंजरे में मौजूद यह चिड़िया इंसान या और नजदीक एक औरत हो सकती है. गुलामी व पितृसत्ता के चंगुल में फंसी हुई. पिंजरा न सिर्फ बंधन है बल्कि अनुकूलन भी है. सर्वेश्वर ने अनुकूलन को नहीं बल्कि अनुकूलन के खिलाफ लड़ने वाली आजाद्ख्याली को केंद्र में रखा. याद करिए शेखर जोशी क़ी 'बदबू', जहाँ हाथ से आती किरासिन क़ी बदबू से अनुकूलन अंततः नहीं होता है.
कवि या रचनाकार क़ी प्रतिबद्धता यहाँ उसे एक नया सहारा दे देती है.
बहरहाल कविता ये रही-

मुक्ति की आकांक्षा

चिडि़या को लाख समझाओ
कि पिंजड़े के बाहर
धरती बहुत बड़ी है, निर्मम है,
वहॉं हवा में उन्‍हें
अपने जिस्‍म की गंध तक नहीं मिलेगी।
यूँ तो बाहर समुद्र है, नदी है, झरना है,
पर पानी के लिए भटकना है,
यहॉं कटोरी में भरा जल गटकना है।
बाहर दाने का टोटा है,
यहॉं चुग्‍गा मोटा है।
बाहर बहेलिए का डर है,
यहॉं निर्द्वंद्व कंठ-स्‍वर है।

फिर भी चिडि़या
मुक्ति का गाना गाएगी,
मारे जाने की आशंका से भरे होने पर भी,
पिंजरे में जितना अंग निकल सकेगा, निकालेगी,
हरसूँ ज़ोर लगाएगी
और पिंजड़ा टूट जाने या खुल जाने पर उड़ जाएगी।

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

1 comment:

Anonymous said...

sahara to hai per kab tak? aur kya ye kham khyali aaj ki tareekh me, doosere jyada ajadi ka ahsas dilaane vaale per sanrachana me jyaade khatarnak pinjre ka raasta nahi dikhati?