9/25/10

निराला, गुंडेचा और ध्रुपद

हिंदी में संगीत और काव्य का रिश्ता भक्तिकाल में बेहद मज़बूत था. आज भी भक्त कवियों की लिखी बंदिशें हम उस्तादों से सुनते ही रहते हैं, सूर हों या कबीर, मीरा हों या सुन्दरदास. रीतिकाल में भी यह रिश्ता मज़बूत रहा.पर जाने क्यों, आधुनिक होते ही हमने कविता से संगीत के रिश्ते को भुला दिया. अगर भुला न दिया तो कम जरूर होता गया यह बंधन!कारणों का विश्लेषण आलिम करें, अपन का तो सिर्फ ये रोना है कि यह नहीं है.
पर निराला ऐसे कवि न थे,
उन्होंने एक कविता लिखी -" ताक कमसिन वारि "
विद्वानों की समझ में कविता न आनी थी, सो न आयी. इसे निराला की विक्षिप्तावस्था से जोड़ दिया गया. ईश्वर, गर कहीं हो, तो इन्हें माफ़ करे क्यों कि ये नहीं जानते कि इन्होने क्या किया!

खैर, ध्रुपद सुनने में अपेक्षित धैर्य के साथ आज सुनिए निराला की यही बंदिश-
रमाकांत और उमाकांत गुंडेचा से.

4 comments:

दीपा पाठक said...

आपका ब्लॉग बहुत बढ़िया है। पढ़ने सुनने के लिए बहुत उम्दा सामग्री है।

Anonymous said...

kamal hai bhai.apka blog ek sampoorna susankrit vyakti ke sanskaron ko zahir karta hai.

Anonymous said...

gundecha brothers ko abhi haal mein do baar sunne ka mouka mila-sept 14 aur 17 ko.nirala ki ye rachana meri farmaish par unhone pesh ki thi 14 ko.

Anonymous said...

apke blog se mera rishta kudbakhud ban jata hai.us bismilla khan sahab ko kai bar suna.Unke akhri (?)stage prog ka mein gawah hun.wo baja nahi paye the.
mukul shivputra ka bhi khoob sath mila.
Ghalib mere favourite shair hain.