9/29/10

बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाये- उस्ताद भीमसेन जोशी

डर के इस आलम में अपनी गंगा-जमुनी तहजीब की गोद की सुरक्षा में रहने का मन कर रहा है.
आज इस पोस्ट को लगते वक्त मेरे जेहन में कल के तनाव घूम रहे हैं.
कल क्या होगा? लोग एक दूसरे से डरे हुए हैं और कुछ लोग दूसरों से ज्यादा डरे हुए हैं!मैं डर रहा हूँ और जोशी जी को सुन रहा हूँ!

सुनिए आप भी-
उस्ताद भीमसेन जोशी की आवाज़ में-
'बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाये'

ये नवाब वाजिद अली शाह की लिखी हुई भैरवी ठुमरी है.

2 comments:

आयोजक said...

Shukriya Mrityuanjay. Aanand aa raha tumahri lagaaye poston ko sunkar.
sanjay joshi

Arvind Mishra said...

इस महान गायक को नमन !