10/1/10

फ़ैज़- आइये हाथ उठाएं हम भी- इकबाल बानो

फैसला आ गया. वीरेन डंगवाल के शब्दों में
"जो नहीं होना था, वही सब हुआं हुआं, इधर गहरा खड्ड था, उधर गहरा कुआं"
ये कैसी जम्हूरियत है जहां एक सामान्य न्याय की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए लाखों लाख पुलिस तैनात की गयी?
और लोग किससे डर रहे हैं? नेताओं को सुनकर तो ऐसा लग रहा है कि हिन्दुस्तान की मुकम्मल आबादी सांप्रदायिक है, और नेता जन सेकुलर,जबकि बात उल्टी है. अगर इस मुद्दे पर राजनीति बंद कर दी जाये तो अवाम अपने मसले खुद हल कर लेगी.

आज सुनिए फ़ैज़ की प्रार्थना, इकबाल बानो की आवाज़ में-

1 comment:

prkant said...

राजनीति बंद करेगा कौन? मज़े की उम्मीद तो सभी राजनीतिकों को है .