10/13/10

मैं ख्याल हूँ किसी और का- मेहदी हसन

आज सुनिए मेहदी हसन साहब की आवाज़ में सलीम कौसर की कही हुई ग़ज़ल.
ग़ज़ल ये रही-

मैं ख्याल हूँ किसी और का, मुझे सोचता कोई और है,
सरे आइना मेरा अक्स है,पसे आइना कोई और है.

मैं किसी के दस्ते तलब में हूँ तो किसी के हर्फे दुआ में हूँ
मैं नसीब हूँ किसी और का मुझे मांगता कोई और है

अज़ब ऐतबारों पे ऐतबार के दरमियान है ज़िंदगी
मैं करीब हूँ किसी और के मुझे जानता कोई और है

तुझे दुश्मनों की खबर न थी मुझे दोस्तों का पता नहीं
तेरी दास्तां कोई और थी मेरा वाकया कोई और है

वही मुन्सिफों की रिवायतें वही फैसलों की इबारतें
मेरा जुर्म तो कोई और था ये मेरी सजा कोई और है

जो मेरी रियाज़ते नीम शब को सलीम सुबहो न मिल सके
तो फिर इसके माने तो ये हुए की यहाँ खुदा कोई और है.

इस ग़ज़ल को जब भी मैं सुनता हूँ तो लगता है की वक्त खुद अपनी गवाही पेश कर रहा है, वह भी पूरी इंसानी कायनात के सामने. विडंबनाओं को बहुत ही गहरे भरे हुए इस सभ्यता के रहस्यों को यह ग़ज़ल जितने आसान लफ़्ज़ों में बयां करती है वही कला का चरम है.
ऊपर से मेहदी साहब की गायकी, जिन्होंने इस ग़ज़ल में राग ऐसे पिरोये हैं कि ग़ालिब याद आ गए-
'पुर हूँ शिकवे से राग से जैसे बाजा'

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