12/14/10

बेगम साहिबा- ग़ालिब- भाग दो

बेगम अख्तर से ग़ालिब को सुनना हमेशा बेहतर लगता है, ऐसा क्यों है?
मेरे ख्याल से ग़ालिब अपनी शायरी में एक ऐसे जमाने की नुमाईंदगी करते हैं, जो क्लासिक नहीं है. मीर और उनकी शायरी में यही फरक है. भयानक उथल-पुथल भरे एक जमाने में ग़ालिब की शायरी ध्वस्त हो रहे मुगलिया जमाने की आवाज़ है. 'न गुल ए नगमा हूँ न पर्द ए साज़/ मैं हूँ अपनी शिकश्त की आवाज़'. जबकि मीर उसके समूचे वैभव के शायर हैं. मीर क्लासिक कवि हैं, ग़ालिब उस मामले में क्लासिक नहीं हैं. ग़ालिब आधुनिक कवि हैं.
क्लासिक और आधुनिक के अंतर्विरोध को यहीं छोड़ें तो कह सकते हैं कि लगभग हमेशा ही मीर, मेहदी हसन की आवाज़ ओ अदायगी में बेहतर होते हैं, और ग़ालिब बेगम साहिबा के. तो क्या यह नहीं है कि मेहदी हसन बेगम साहिबा से जियादा क्लासिकल हैं?

अपनी किसी बातचीत में मेहदी साहब ने कहा था कि जिस ग़ज़ल को बेगम साहिबा ने गा दिया, उसे छोड़ ही देना अच्छा.
मेहदी हसन की इस महान सिफारिश के बाद और कहने को क्या रह जाता है!!
सुनिए ग़ालिब की कही दो और गज़लें, बेगम अख्तर की आवाज़ में-


3 comments:

सागर said...

Bahut Bahut... Dhanyavaad

सागर said...

YEH MUJHE MAIL KAR SAKTE HAIN ? Aapka shukrguzar rahung sir !

sksaagartheocean@gmail.com

Amiya chatterjee said...

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