12/6/10

6 दिसंबर की रात को - नैय्यरा नूर की आवाज़ में फ़ैज़

आज 6 दिसंबर की रात है. इसी तारीख को हिन्दुस्तान में जम्हूरियत के आख़िरी विरसे को जमींदोज किया गया था, बाबरी मस्जिद ढहाई गयी थी. एक पूरी विरासत को तफ़रके की सलाखों से बींध दिया गया. ये तुम थे दोस्त, जो ढहाए गए, मारे गए, तोड़ दिए गए, जमींदोज़ हुए. मुक्तिबोध के शब्दों में - जम गए, जाम हुए, अपने ही कीचड़ में धंस गए, फंस गए/ ... विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में!!

और अब तो फैसला भी आ गया.

ये एक गुनाह ऐसा है जिसमें इस मुल्क के साहबजादों से लेकर हरामजादों तक, सभी शामिल हैं. और ये मुल्क, ख़ुदा ख़ैर करे, ये किसका है! इस देश की अवाम का या इसके हुक्मरानों का? या अवाम की जुबान बोल रही सत्ता का? या उनका जिन्हें इस बात का हासिल है कि उन्होंने अवाम को इस बात के लिए तैयार किया!

आज सुनिए फ़ैज़ की वह ग़ज़ल, जिसे उन्होंने ढाका से लौटकर कहा था. इन दोनों कौमों के भीतर इससे बेहतर और क्या हो कि ये ग़ज़ल सुनी जाये, और कहा जाये कि 'तुम बिल्कुल हम जैसे निकले, अब तक कहाँ छुपे थे भाई!'

ग़ज़ल के बोल ये रहे-

हम के ठहरे अजनबी इतने मदारातों के बाद
फिर बनेंगे आशना कितनी मुलाकातों के बाद

कब नज़र में आयेगी बेदाग़ सब्जे की बहार
खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद

दिल तो चाहा पर शिकस्त-ए-दिल ने मोहलत ही न दी
कुछ गिल-ए-शिकवे भी कर लेते मुनाजातों के बाद

हम के ठहरे अजनबी ...

थे बहुत बेदर्द लम्हें ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क के
थीं बहुत बेमेहर सुबहें मेहरबां रातों के बाद

हम के ठहरे अजनबी...

उन से जो कहने गए थे फैज़ जां सदका किये
अनकही ही रह गई वो बात सब बातों केन बाद

हम के ठहरे अजनबी...

2 comments:

miracle5169@gmail.com said...

"Ye Koshish" jindabad.

सोनरूपा विशाल said...

कब नज़र में आयेगी बेदाग़ सब्जे की बहार
खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद..................है कोई जो इन सवालों को ही जमीदोज कर दे !