12/1/10

कानून - गोरख पाण्डेय

अरुंधति रॉय के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की घटना ने एक हिन्दुस्तानी के बतौर हमारा सिर शर्म से झुका दिया है. सरकार की परिभाषाओ के हिसाब से आज तीन चौथाई से ज्यादा देश राजद्रोह का अपराधी ठहरेगा. नैतिक उच्चासन पर बैठ कर पूरे देश को देशभक्ति का प्रमाणपत्र देने वाले मीडिया के भीतर की सडान्ध का बहुत थोडा हिस्सा सामने आया है. जजों का भ्रष्टाचार अब पुरानी बात हो चुकी है.
कवि गोरख पाण्डेय की कविता 'कानून'1980 में लिखी गयी थी, भारतीय राष्ट्र के दमनकारी रुख को साफ़ बेनकाब करती है.

कानून

लोहे के पैरों में भारी बूट
कन्धो से लटकती बन्दूक
कानून अपना रास्ता पकड़ेगा
हथकड़ियाँ डालकर हाथों में
तमाम ताकत से उन्हें
जेलों की ओर खींचता हुआ
गुजरेगा विचार और श्रम के बीच से
श्रम से फल को अलग करता
रखता हुआ चीजों को
पहले से तय की हुई
जगहों पर
मसलन अपराधी को
न्यायधीश की, ग़लत को सही की
और पूँजी के दलाल को
शासक की जगह पर
रखता हुआ
चलेगा
मजदूरों पर गोली की रफ्तार से
भुखमरी की रफ्तार से किसानों पर
विरोध की जुबान पर
चाकू की तरह चलेगा
व्याख्या नहीं देगा
बहते हुए ख़ून की
कानून व्याख्या से परे कहा जायेगा
देखते-देखते
वह हमारी निगाहों और सपनों में
खौफ बनकर समा जायेगा
देश के नाम पर
जनता को गिरफ्तार करेगा
जनता के नाम पर
बेच देगा देश
सुरक्षा के नाम पर
असुरक्षित करेगा
अगर कभी वह आधी रात को
आपका दरवाजा खटखटायेगा
तो फिर समझिये कि आपका
पता नहीं चल पायेगा
खबरों से इसे मुठभेड़ कहा जायेगा


पैदा होकर मिल्कियत की कोख से
बहसा जायेगा
संसद में और कचहरियों में
झूठ की सुनहली पालिश से
चमकाकर
तब तक लोहे के पैरों
चलाया जायेगा कानून
जब तक तमाम ताकत से
तोड़ा नहीं जायेगा।

- गोरख पाण्डेय

4 comments:

Mrs. Asha Joglekar said...

Kanoon ke so called rakhwale to aise hee hain. Iseese bahar ke deshon men jahan log police se madad mangte hain humare desh men janata police se daratee hai.

Rangnath Singh said...

कई पोस्टें पढ़ीं,बहुत अच्छा चयन है।

मनोज पटेल said...

अच्छी कविता और प्रासंगिक भी.

awadhesh said...

वह कहता है सबके साथ चलेगा
शोषण पर टिकी व्यवस्था को बदलेगा
आओ देशभक्त जल्लादों
पूँजी के विश्वस्त पियादों
उसको फांसी दे दो.
- गोरख