12/4/10

बारो घी के दिए ना (कव्वाली) - ज़फर हुसैन बंदायूनी और मंडली

ज़फर हुसैन बंदायूनी पुरानी शैली के कौवाली गायक हैं. वहां उस शैली में इतनी तड़क भड़क नहीं होती. कौवाली, जो की गायन की सबसे लोकतान्त्रिक विधा है, का असली रूप इसी शैली में निखर कर आता है. आजकल कुछ कौवाली गाने वाले ढेरों वाद्य यंत्रों और सुव्यवस्थित टीम के साथ गाते हैं. सुव्यवस्थित टीम माने लगभग कोरस जैसा. संगी गायकों की हालात इस शैली में कोरस गायकों जैसी होती है. जबकी कौवाली की मूल प्रकृति में ही यह बात नहीं है. संगी गायक इस विधा में मूल गायक से बंधा होकर भी अपनी स्वतंत्र हैसियत रखता है. अगुवा गायक को भी उनके लिए जगह छोड़नी पड़ती है.ज़फर साहब और उनके संगी इसी शैली के गायक हैं.

सुनिए इस मंडली से एक बहुचर्चित कौवाली 'बारो घी के दिए ना '. यह मोहम्मद साहब के जन्म पर सोहर है. हमारी साझी परम्परा और संस्कृति का वाहक.