12/22/10

झूठ और लूट की संस्कृति के खिलाफ

आजकल भ्रष्टाचार पर जिसे देखिये, वही कुछ न कुछ बोले जा रहा है. कांग्रेस वाले भाजपा को बड़ा घूसखोर बता रहे हैं, भाजपा वाले कांग्रेस को. और दोनों मिलकर एक ऐसा हिन्दुस्तान बना रहे हैं जहाँ लुटेरों की चांदी है. कुछ खुद लूटें, कुछ लुटवा दें. और तो और सुश्री नीरा राडिया न्याय पालिका के भ्रष्टाचार पर अचरज व्यक्त कर रही हैं. तो लीजिये साहेबान, भारत का दरवाजा फिर खुल गया है. लुटेरे आ रहे हैं, बुलाये जा रहे हैं. गाँव की एक कहावत के मुताबिक़ "चामे के बेर्हा है, और कुकुर की रखवारी".
मुझे लगता है कि कोई नया तरीका जब तक नहीं निकलता तब तक पुराने से ही लड़ना होगा, क्यूंकि नया तरीका भी तो आखिरकार लड़ने से ही निकलेगा. जबकि कुछ लोग तो नए तरीके के नाम पर अमूर्त विरोध में संलग्न हैं.


पढ़िए अवधेश प्रधान की कविता जो गा कर पढ़ने पर और ही बढ़िया बन पड़ेगी-

कइसा खुला दरवाजा, लुटेरा झुंड-झुंड आवें...
भारत का बज गया बाजा, लुटेरा झुंड-झुंड चलि आवें...

गैस निकालें, तेल निकालें
कोयला भरि भरि रेल निकालें
बेचि बेचि भए राजा, लुटेरा झुंड-झुंड चलि आवें...

भूमि हमारी, ई गांव हमारा
जंगल परबत ठांव हमारा
हमहीं से कहें अब- ‘‘जा, जा’’, लुटेरा झुंड-झुंड चलि आवें...

पुलिस बोलावें, मलेटरी बोलावें
दन दन दन बंदूक चलावें
बाजे विकास के बाजा, लुटेरा झुंड-झुंड चलि आवें...

जमींदार जुलुमी, दलाल पुंजीपतिया
बहरा से आपन बोलाके संघतिया
मिलि-जुलि मार तान माजा, लुटेरा झुंड-झुंड चलि आवें...

आव गरीबवा मजूर किसनवा
औरत-मरद सब बूढ़-जवनवा
छेड़ लड़इया तू साझा, लुटेरा झुंड-झुंड चलि आवें...

अब सब मिलि आवाज उठाव
ई अनेत के राज मेटाव
ईहे बखत के तकाजा, लुटेरा झुंड-झुंड चलि आवें...

1 comment:

नीरज बसलियाल said...

कुछ कहा नहीं जाता, इसलिए नहीं कि इतना दर्द पैदा हो गया है, बल्कि इसलिए कि अब ये सब भी बोलीवुड की ३ घंटे वाली पिक्चर की तरह हो गया है | देखते जाओ, बोल के भी क्या मिलेगा |