12/27/10

मैं नहीं मानता... हबीब जालिब

जहां बिनायक जैसे देशद्रोही और नीरा राडिया व राजा जैसे देशभक्त हैं, जहां ये दस्तूर है कि इंसानियत की बात करने वाले को हथकड़ी मिलती है, जहां न्याय आकाश कुसुम है, बालू का तेल है , जहां संतरी से लेकर मंतरी तक, कोर्ट से लेकर मीडिया तक अखंड भ्रष्टाचार व्याप्त है, जहां नदियों से जल, वृक्षों से फल और जमीन से उसका आँचल छीन लिया गया है, उस देश को मेरा नमस्कार!
और हिन्दुस्तान-पाकिस्तान, दोनों मुल्कों में यही हालात हैं. फहमीदा रियाज़ ने ठीक ही लिखा था- तुम बिलकुल हम जैसे निकले, अब तक कहाँ छुपे थे भाई....

सुनिए हबीब जालिब से ये नज़्म, जो दोनों मुल्कों के हुक्मरानों के लिए मौजूं है. ऐसे दस्तूर को, सुब्हे बेनूर को, मैं नहीं मानता...

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