12/28/10

लोकतंत्र को उम्रकैद- प्रणय कृष्ण

'देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की'
(बिनायक सेन की गिरफ्तारी के पीछे की हकीकतें और सबक )

'नई आज़ादी के योद्धा' बिनायक सेन की गिरफ्तारी के पीछे की राजनीति और संकट की जरूरी पड़ताल करता, जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण का यह लेख मुझे मिला. पढ़िए, और आईये, बिनायक जी के साथ हर संभव तरीके से मजबूती से खड़े हों.

25 दिसम्बर, २०१०

ये मातम की भी घडी है और इंसाफ की एक बडी लडाई छेडने की भी. मातम इस देश में बचे-खुचे लोकतंत्र का गला घोंटने पर और लडाई- न पाए गए इंसाफ के लिए जो यहां के हर नागरिक का अधिकार है. छत्तीसगढ की निचली अदालत ने विख्यात मानवाधिकारवादी, जन-चिकित्सक और एक खूबसूरत इंसान डा. बिनायक सेन को भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी और धारा 124-ए, छत्तीसगढ विशेष जन सुरक्षा कानून की धारा 8(1),(2),(3) और (5) तथा गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक कानून की धारा 39(2) के तहत राजद्रोह और राज्य के खिलाफ युद्ध छेडने की साज़िश करने के आरोप में 24 दिसम्बर के दिन उम्रकैद की सज़ा सुना दी.

यहां कहने का अवकाश नहीं कि कैसे ये सारे कानून ही कानून की बुनियाद के खिलाफ हैं. डा. सेन को इन आरोपों में 24 मई, 2007 को गिरफ्तार किया गया और सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से पूरे दो साल साधारण कैदियों से भी कुछ मामलों में बदतर स्थितिओं में जेल में रहने के बाद, उन्हें ज़मानत दी गई. मुकादमा उनपर सितम्बर 2008 से चलना शुरु हुआ. सर्वोच्च न्यायालय ने यदि उन्हें ज़मानत देते हुए यह न कहा होता कि इस मुकदमे का निपटारा जनवरी 2011 तक कर दिया जाए, तो छत्तीसगढ सरकार की योजना थी कि मुकदमा दसियों साल चलता रहे और जेल में ही बिनायक सेन बगैर किसी सज़ा के दसियों साल काट दें. बहरहाल जब यह सज़िश नाकाम हुई और मजबूरन मुकदमें की जल्दी-जल्दी सुनवाई में सरकार को पेश होना पडा, तो उसने पूरा दम लगाकर उनके खिलाफ फर्ज़ी साक्ष्य जुटाने शुरु किए.

डा. बिनायक पर आरोप था कि वे माओंवादी नेता नारायण सान्याल से जेल में 33 बार 26 मई से 30 जून, 2007 के बीच मिले. सुनवाई के दौरान साफ हुआ कि नारायण सान्याल के इलाज के सिलसिले में ये मुलाकातें जेल अधिकारियों की अनुमति से, जेलर की उपस्थिति में हुईं. डा. सेन पर मुख्य आरोप यह था कि उन्होंने नारायण सान्याल से चिट्ठियां लेकर उनके माओंवादी साथियों तक उन्हें पहुंचाने में मदद की. पुलिस ने कहा कि ये चिट्ठियां उसे पीयुष गुहा नामक एक कलकत्ता के व्यापारी से मिलीं जिसतक उसे डा. सेन ने पहुंचाया था. गुहा को पुलिस ने 6 मई,2007 को रायपुर में गिरफ्तार किया. गुहा ने अदालत में बताया कि वह 1 मई को गिरफ्तार हुए. बहरहाल ये पत्र कथित रूप से गुहा से ही मिले, इसकी तस्दीक महज एक आदमी अ़निल सिंह ने की जो कि एक कपडा व्यापारी है और पुलिस के गवाह के बतौर उसने कहा कि गुहा की गिरफ्तरी के समय वह मौजूद था. इन चिट्ठियों पर न कोई नाम है, न तारीख, न हस्ताक्षर, न ही इनमें लिखी किसी बात से डा. सेन से इनके सम्बंधों पर कोई प्रकाश पडता है. पुलिस आजतक भी गुहा और डा़. सेन के बीच किसी पत्र-व्यवहार, किसी फ़ोन-काल,किसी मुलाकात का कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाई. एक के बाद एक पुलिस के गवाह जिरह के दौरान टूटते गए.

पुलिस ने डा.सेन के घर से मार्क्सवादी साहित्य और तमाम कम्यूनिस्ट पार्टियों के दस्तावेज़, मानवाधिकार रिपोर्टें, सी.डी़ तथा उनके कम्प्यूटर से तमाम फाइलें बरामद कीं. इनमें से कोई चीज़ ऐसी न थी जो किसी भी सामान्य पढे लिखे, जागरूक आदमी को प्राप्त नहीं हो सकतीं. घबराहट में पुलिस ने भाकपा (माओंवादी) की केंद्रीय कमेटी का एक पत्र पेश किया जो उसके अनुसार डा. सेन के घर से मिला था. मज़े की बात है कि इस पत्र पर भी भेजने वाले के दस्तखत नहीं हैं. दूसरे, पुलिस ने इस पत्र का ज़िक्र उनके घर से प्राप्त वस्तुओं की लिस्ट में न तो चार्जशीट में किया था, न ”सर्च मेमों” में. घर से प्राप्त हर चीज़ पर पुलिस द्वारा डा. बिनायक के हस्ताक्षर लिए गए थे. लेकिन इस पत्र पर उनके दस्तखत भी नहीं हैं. ज़ाहिर है कि यह पत्र फर्ज़ी है. साक्ष्य के अभाव में पुलिस की बौखलाहट तब और हास्यास्पद हो उठी जब उसने पिछली 19 तारीख को डा.सेन की पत्नी इलिना सेन द्वारा वाल्टर फर्नांडीज़, पूर्व निदेशक, इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट ( आई.एस. आई.),को लिखे एक ई-मेल को पकिस्तानी आई.एस. आई. से जोडकर खुद को हंसी का पात्र बनाया. मुनव्वर राना का शेर याद आता है-

“बस इतनी बात पर उसने हमें बलवाई लिक्खा है
हमारे घर के बरतन पे आई.एस.आई लिक्खा है”

इस ई-मेल में लिखे एक जुमले ”चिम्पांज़ी इन द व्हाइट हाउस” की पुलिसिया व्याख्या में उसे कोडवर्ड बताया गया.(आखिर मेरे सहित तमाम लोग इतने दिनॉं से मानते ही रहे हैं कि ओंबामा से पहले वाइट हाउस में एक बडा चिंम्पांज़ी ही रहा करता था.) पुलिस की दयनीयता इस बात से भी ज़ाहिर है कि डा.सेन के घर से मिले एक दस्तावेज़ के आधार पर उन्हें शहरों में माओंवादी नेटवर्क फैलाने वाला बताया गया. यह दस्तावेज़ सर्वसुलभ है. यह दस्तावेज़ सुदीप चक्रवर्ती की पुस्तक, ”रेड सन- ट्रैवेल्स इन नक्सलाइट कंट्री” में परिशिष्ट के रूप में मौजूद है. कोई भी चाहे इसे देख सकता है. कुल मिलाकर अदालत में और बाहर भी पुलिस के एक एक झूठ का पर्दाफाश होता गया. लेकिन नतीजा क्या हुआ? अदालत में नतीजा वही हुआ जो आजकल आम बात है. भोपाल गैस कांड् पर अदालती फैसले को याद कीजिए. याद कीजिए अयोध्या पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को. क्या कारण हे कि बहुतेरे लोगों को तब बिलकुल आश्चर्य नहीं होता जब इस देश के सारे भ्रश्टाचारी, गुंडे, बदमाश और बलात्कारी टी.वी. पर यह कहते पाए जाते हैं कि वे न्यायपालिका का बहुत सम्मान करते हैं?

याद ये भी करना चाहिए कि भारतीय दंड संहिता में राजद्रोह की धाराएं कब की हैं. राजद्रोह की धारा 124 -ए जिसमें डा. सेन को दोषी करार दिया गया है, 1870 में लाई गई. जिसके तहत सरकार के खिलाफ "घृणा फैलाना", "अवमानना करना" और "असंतोष पैदा" करना राजद्रोह है. क्या ऐसी सरकारें घृणित नहीं है जिनके अधीन 80 फीसदी हिंदुस्तानी 20 रुपए रोज़ पर गुज़ारा करते हैं? क्या ऐसी सरकारें अवमानना के काबिल नहीं जिनके मंत्रिमंडल राडिया, टाटा, अम्बानी, वीर संघवी, बरखा दत्त और प्रभु चावला की बातचीत से निर्धारित होते हैं? क्या ऐसी सरकारों के प्रति हम और आप असंतोष नहीं रखते जो आदिवसियों के खिलाफ "सलवा जुडूम" चलाती हैं, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और अमरीका के हाथ इस देश की सम्पदा को दुहे जाने का रास्ता प्रशस्त करती हैं. अगर यही राजद्रोह की परिभाषा है जिसे गोरे अंग्रेजों ने बनाया था और काले अंग्रेजों ने कायम रखा, तो हममे से कम ही ऐसे बचेंगे जो राजद्रोही न हों. याद रहे कि इसी धारा के तहत अंग्रेजों ने लम्बे समय तक बाल गंगाधर तिलक को कैद रखा.

डा. बिनायक और उनकी शरीके-हयात इलीना सेन देश के उच्चतम शिक्षा संस्थानॉं से पढकर आज के छत्तीसगढ में आदिवसियों के जीवन में रच बस गए. बिनायक ने पी.यू.सी.एल के सचिव के बतौर छत्तीसगढ सरकार को फर्ज़ी मुठभेड़ों पर बेनकाब किया, सलवा-जुडूम की ज़्यादतियों पर घेरा, उन्होंने सवाल उठाया कि जो इलाके नक्सल प्रभावित नहीं हैं, वहां क्यों इतनी गरीबी,बेकारी, कुपोषण और भुखमरी है? एक बच्चों के डाक्टर को इससे बडी तक्लीफ क्या हो सकती है कि वह अपने सामने नौनिहालों को तडपकर मरते देखे?

इस तक्लीफकुन बात के बीच एक रोचक बात यह है कि साक्ष्य न मिलने की हताशा में पुलिस ने डा. सेन के घर से कथित रूप से बरामद माओंवादियों की चिट्ठी में उन्हें ”कामरेड” संबोधित किए जाने पर कहा कि "कामरेड उसी को कहा जाता है, जो माओंवादी होता है". तो आप में से जो भी कामरेड संबोधित किए जाते हों (हों भले ही न), सावधान रहिए. कभी गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कबीर के सौ पदों का अनुवाद किया था. कबीर की पंक्ति थी, ”निसि दिन खेलत रही सखियन संग”. गुरुदेव ने अनुवाद किया, ”Day and night, I played with my comrades' मुझे इंतज़ार है कि कामरेड शब्द के इस्तेमाल के लिए गुरुदेव या कबीर पर कब मुकदमा चलाया जाएगा?

अकारण नहीं है कि जिस छत्तीसगढ में कामरेड शंकर गुहा नियोगी के हत्यारे कानून के दायरे से महफूज़ रहे, उसी छत्तीसगढ में नियोगी के ही एक देशभक्त, मानवतावादी, प्यारे और निर्दोष चिकित्सक शिष्य को उम्र कैद दी गई है. 1948 में शंकर शैलेंद्र ने लिखा था-

“भगतसिंह ! इस बार न लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की !

यदि जनता की बात करोगे, तुम गद्दार कहाओगे--
बंब संब की छोड़ो, भाषण दिया कि पकड़े जाओगे !
निकला है कानून नया, चुटकी बजते बँध जाओगे,
न्याय अदालत की मत पूछो, सीधे मुक्ति पाओगे,
कांग्रेस का हुक्म; जरूरत क्या वारंट तलाशी की ! “

ऊपर की पंक्तियों में ब़स कांग्रेस के साथ भाजपा और जोड़ लीजिए.

आश्चर्य है कि साक्ष्य होने पर भी कश्मीर में शोंपिया बलात्कार और हत्याकांड के दोषी, निर्दोष नौजवानॉं को आतंकवादी बताकर मार देने के दोषी सैनिक अधिकारी खुले घूम रहे हैं और अदालत उनका कुछ नहीं कर सकती क्योंकि वे ए.एफ.एस. पी.ए. नामक कानून से संरक्षित हैं, जबकि साक्ष्य न होने पर भी डा. बिनायक को उम्र कैद मिलती है.

मित्रों मैं यही चाहता हूं कि जहां जिस किस्म से हो, जितनी दूर तक हो, हम डा. बिनायक सेन जैसे मानवरत्न के लिए आवाज़ उठाएं ताकि इस देश में लोग उस दूसरी गुलामी से सचेत हों जिसके खिलाफ नई आज़ादी के एक योद्धा हैं डा. बिनायक सेन.

18 comments:

इलाहाबादी अडडा said...

यह विनायक सेन को सजा नहीं बल्कि सत्‍ता की बौखलहाट का इकरारनामा है

मनीषा पांडे said...

मैं बिनायक सेन के साथ हूं और कॉमरेड भी हूं।

Ravi prakash said...

मिस्टर पि.चिदम्बरम
मैं कामरेड भी हूँ ,माओ से सहमत भी हूँ , और मेरे रूम पर पर्याप्त माओ का साहित्य भी है...

राजेश उत्‍साही said...

य‍ह लड़ाई अन्‍याय के खिलाफ है।

मनोज पटेल said...

जरूरी आलेख, आपका आभार इसे यहाँ साझा करने के लिए. कितना आश्चर्यजनक है कि नारायण सान्याल से जेल में बिनायक सेन की यह मुलाकातें इलाज के सिलसिले में हुआ करती थीं, जो जेल अधिकारियों की अनुमति और उनकी मौजूदगी में संपन्न होती थीं फिर भी उनको सजा सूना दी गई. यह भी जानना जरूरी है कि जब रायपुर की अदालत में यह फैसला सुनाया जा रहा था, लगभग उसी समय असम सरकार ने अदालत में उल्फा के नेताओं की जमानत का विरोध न करने का फैसला किया. सिर्फ पत्रवाहक होने के आरोप में राजद्रोह का मुकदमा और उम्रकैद ज्यादती है. इसी तरह के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट पंजाब के शिक्षा विभाग के दो अधिकारियों के खिलाफ राजद्रोह के आरोप को निरस्त कर चुका है. उनपर आरोप था कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उन्होंने चंडीगढ़ के एक सिनेमा हाल के पास भीड़ भरी जगह पर, "खालिस्तान जिंदाबाद" और "राज करेगा खालसा" जैसे उत्तेजक नारे लगाए. इस मामले में निचली अदालत से सिर्फ एक साल की सजा हुई थी और यह भी सुप्रीम कोर्ट में टिक न सकी. सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि ये नारे सिख समुदाय को किसी भड़कीली प्रतिक्रया के लिए नहीं उकसा पाए. इसी तरह बिनायक सेन के मामले में भी यह जरूर देखा जाना चाहिए था कि यदि अभियोजन के आरोप को सच भी मान लिया जाए तो क्या सेन द्वारा पहुंचाए गए पत्रों की प्रतिक्रया में या उसके उकसावे में कोई हिंसात्मक या अन्यथा गतिविधि हुई.

मनोज पटेल said...
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सागर said...

हर जगह एक ही बात कहर फिर रहा हूँ... हमारे पास सचमुच अब दो ही रास्ते बचे हैं... और कोई रास्ता नहीं, इसी विषय पर अपूर्व का भी लेख देखें http://bairang.blogspot.com/2010/12/blog-post_28.html

सागर said...

और काफिला पर यह
http://kafila.org/2010/12/29/silence-as-sedition/

Dr. shyam gupta said...

-----वैसे तो अगली कोर्ट का फ़ैसला वास्तविकता बतायेगा...परन्तु एक चिकित्सक इतनी बार क्यों मिलने गया जेल में नारायण सान्याल से..वे क्यों नहीं उनके साथी हो सकते.. चिकित्सक के रूप में भी नहीं जा सकता...वहां जेल का चिकित्सक ही इलाज करता है...?
----बाकी तो जो भी आपने कहानी लिखी है इस पोस्ट में सब महज़ भावुकता है, तथ्यों के देश, काल,स्थिति के असम्बद्ध संदर्भ के जिसका कोई भी अर्थ नहीं...
----आखिर आप के कहे हुए तथ्यों को कोर्ट मे मान्यता क्यों नहीं मिल पाई...
----अभी अगली कोर्ट मौज़ूद है सुप्रीम कोर्ट भी...आप लोग क्यों चिल्ला रहे हैं क्या आपको सुप्रीम कोर्ट पर भरोषा नहां...या आगे की कोर्ट पर दबाव बनाने के लिये यह सब.....

shashank said...

dr shyam gupta .....................
shayad aaap garrebo ki ladai nahi samajhte

kanoon apna kaam karega...........
per ek "admi" hone ka ilzaam desh se gaddari ka nahi diya jaa sakta......bus is liye hum chiilllaaa rahe hai.

awadhesh said...

दैनिक भास्कर में वेद प्रताप वैदिक ने विनायक सेन को मिली सजा को जायज ठहराया है. उन्हें कामरेडों द्वारा इस सजा का विरोध करना उचित नहीं लग रहा. वैदिक जैसे हाफ पैंटीए से पूछा जाना चाहिए कि क्या अमर्त्य सेन और राम जेठमलानी भी कम्युनिस्ट हैं, जिन्होंने न्याय के इस कत्लेआम का विरोध किया है. भारत के पूर्व मुख्य न्यायधीश अहमदी और उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश वी.एन. खरे ने भी इस फैसले का विरोध किया है. क्या वे भी कम्युनिस्ट हैं? अगर सच के साथ खड़े होने का मतलब कम्युनिस्ट होना है, तो मुझे अफ़सोस है कि ऐसे लोग हमारे समाज में बहुत कम हैं.

rakesh said...

bahut dino tak 1857 ka pahla swatantrata sangram gadar raha,bahut dino tak BHAGATSINGH aur CHANDRASHEKHAR AZAD atankvadee kahlaye,vinayak is parampara ke hamari peerhi ke chamakte sitare hain,hame un par naz hai,ham sabhi unke sath hain.rakesh

vikrant said...

डॉ . श्याम गुप्ता अगर पुलिस के तथ्यों पर इतना भरोसा करते हैं तो या तो उन्हें बहुत भोला कहा जा सकता है या बेहद चालक . क्या उनका इस देश की पुलिस और कोर्ट से कभी पाला पड़ा है या नहीं ? सवाल सर्वोच्च न्यायलय में जाने या उस पर आखिरी उम्मीद टिकाने का नहीं है . असलियत कोर्ट के फैसलों से प्रायः तय नहीं होती . अगर ऐसा होता तो कई लोग जो कानून , देश और लोक्तान्तंत्र के ठेकेदार बने ही हैं उनकी वास्तिवकता उन्हें फांसी के फंदों तक ले जाती . सवाल माओवादियों के साथ होने या न होने का नहीं है , बल्कि जिस तरह विनायक सेन को राजनीतिक दुराग्रह के कारण कानून का गलत इस्तेमाल करके सजा दी गयी है , वैसा सरकारों के आड़े आने वाले किसी व्यक्ति या संगठन के साथ हो सकता है .इसलिए डॉ . विनायक सेन के पक्ष में खड़ा होना लोकतंत्र के पक्ष में खड़ा होना है . निरंतर फासिस्ट होती इस देश की सरकारों के खिलाफ यह जरूरी मुहिम है . अदालतों पर भी लोकतान्त्रिक लोगों का दबाव बने तो इसमें गलत क्या है . कोई भी अदालत जनता के लोकतान्त्रिक हक़ से बड़ी नहीं हो सकती . वैसे डॉ . विनायक सेन पर किसी देश और समाज को नाज नहीं होगा तो किस पर होगा , डॉ . श्याम गुप्ता साहेब ? लोकतंत्र , जन सेवा , बेहतर व्यवस्था के सपनों और संघर्षों के प्रति संवेदनशील तो होना ही चाहिएय , इसे भावुकता न कहिए , इस संवेदशीलता की बहुत जरूरत है .

ravikant said...

बिनायक सेन की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक लड़ी जा सके इसके लिए कम मात्रा में ज्यादा से ज्यादा लोगों से चंदा लिया जाना चाहिए....

shiva said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.
नव वर्ष 2011 की हार्दिक शुभकामनायें ...स्वीकार करें

kabhi samay mile to yahan //shiva12877.blogspot.com per bhe aayen.

S.N said...

Shyam Gupta ko court par itana bharosha hai! abhi-2 Supreme Court ne UP High Court par tatha ek fomer law minister ne sC ke judjes par jo tippani ki hai,uske baad bhi yah aastha unke rajnaitik paksh ko na chahate hue bhi bata rahi hai.Vinayak Sen ko umrakaid dekar bhi koi satta ke khilaf sangharsh ko nahi rok payega.kitane ko jail me daloge?mai is faisale ke khilaf,Vinayak Sen ke saath hoon.

akash said...

Democracy pr rajy prayojit hmla hai .

geetesh said...

lekh uplabdh karane k lie dhanyavad