12/22/10

कूपहि में इहाँ भांग परी है

क्या आपने कभी सल्वाडोर डाली की वह मशहूर पेंटिंग देखी है, जिसमें उन्होंने पिघलती हुई घड़ी बनाई हैं? इसमें कई घड़ियां पिघल रही हैं, लगभग बहने की हालत में हैं. हालाँकि यह पेंटिंग समय के बारे में है पर आज तो भारतीय मीडिया के बारे में सोचते हुए यही पेंटिंग बारहा याद आ रही है. मीडिया की तमाम छवियां पिघल रही हैं. यथार्थ से अति- यथार्थ की और! जैसे पिघलती हुई घड़ी से सही वक्त की उम्मीद नहीं की जा सकती वैसे ही मीडिया से किसी भी सच्चाई की उम्मीद बेमानी हो गयी है. अब विश्वसनीयता और मीडिया दो ऐसे शब्द लगते हैं मानो इनका कभी आपस में कोई संबंध ही न रहा हो.
पहले मजाक में कहा जाता था कि मीडिया का संबंध गंभीर अध्ययन और विश्लेषण से नहीं, ‘मीडियाक्रिटी’ (सतहीपन) से है. लेकिन तब भी मीडिया का संबंध ‘दलाली’ से है, मजाक में भी नहीं कहा जाता था.
फिलहाल मीडिया ऐसी पिघलती हुई घड़ी है, जिसकी मजबूरी है कि चैबीसों घंटे (24-7) सही वक्त दिखाने का नाटक करे. जाहिर है, वह ऐसा नहीं कर सकती. यह देखने वालों का भोलापन ही कहा जायेगा कि मीडिया द्वारा जो कुछ भी परोसा जा रहा है, उसे सच्चाई मान लें.
कारपोरेट मीडिया की जो शक्ल आज हमारे सामने है, वह नयी नहीं है. फर्क सिर्फ यह है कि पहली बार हम उसे नंगे रूप में देख रहे हैं. जैसे भारत की आजादी का किस्सा 1947 से शुरू होता है, वैसे ही मौजूदा दौर की हर विकृति के पांव पिछली शताब्दी के आखिरी दशक में गड़े हुए देखे जा सकते हैं. चैबीसों घंटे वाले नये-नये तमाम खबरिया चैनलों की जंग में बढ़त हासिल करने के लिए इसी दौर में अंधविश्वासों और स्कैंडलों का बाजार निर्मित किया गया. लेकिन स्वाभाविक तौर पर ये सब भी चैनलों की अनंत भूख को शांत करने के लिये पर्याप्त न थे.
दूसरी तरफ एक दूसरा भारत भी था, जहां खबरें ही खबरें थीं. अकाल था पर चैनलों में अकाल की खबरें न थीं. भूखों मरते और आत्महत्या करते भारत की खबरें नादारद थीं. क्योंकि यह भारत आत्महत्या खुद नहीं कर रहा था, उसे सरकारी नीतियों के जरिये आत्महत्या की ओर धकेल दिया गया था. और ऐसा करने वाले लोग खबरिया चैनलों के मालिकों के साथ गठजोड़ किये हुये थे. इसलिए खबरों में परमाणुशक्ति संपन्न होते भारत का उत्सव था. अपनी सत्तर फीसदी आबादी को बीस रुपये से कम मुहैया करा सकने वाली खोखली महाशक्ति के जैकारे के बीच सच बोलने वाला देशद्रोही होना और कम से कम विकास विरोधी होना था. बहुराष्ट्रीय पूंजी ने इसी दौर में लील लिये पहाड़ के पहाड़ और हांका लगाकर मारे जा रहे थे आदिवासी, लेकिन मीडिया नजर उतारने के रक्षा कवच बेच रहा था. ऐसे ही असुन्दर समय में खबरों के जरिये तैयार किया जा रहा था ऐसा सौन्दर्य, जो विदेशी सौन्दर्य प्रसाधन उद्योग के सामानों को खपाने का बाजार तैयार कर सके. इसीलिए मीडिया के जरिये रची जा रही थीं, विश्वविजेता भारतीय सुन्दरियां. इनमें हर घंटे बलात्कार का शिकार होती महिलाओं की चीख गायब थी. सर्वेश्वर के शब्दों में ‘दुनिया आंसू पसंद करती है/मगर शोख चेहरों के’. इतनी लंबी कहानी इसलिए कि अगर इन पर ध्यान दें तो आज मीडिया के हश्र पर हमें धक्का नहीं लगेगा.
जब खबरों का दायरा बहुत सीमित हो और खबरें चैबीसों घंटे की जरूरत हों तो खबरों को दिखाने वाले खबरों के निर्माता भी बन जाना चाहते हैं. एक समाचार चैनल के पत्रकार ने तो बाकायदा नेपाल से लगे पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाके में अपने लोगों को कपड़ा पहनाकर पुलिस और माओवादी बनाया और उनके बीच की मुठभेड़ रिकार्ड की. खबरों के निर्माण के बीच ही पत्रकारिता के नाम पर लोगों के पास ब्लैकमेल करने की ताकत भी आने लगी. प्रसिद्ध रोंक गायक जिम मारिसन ने कहा था कि ‘मीडिया पर नियंत्रण करने का मतलब है, जनता के जेहन पर नियंत्रण कर लेना’. क्योंकि मीडिया जन-जीवन के तमाम सांस्कृतिक प्रतीकों का इस तरह इस्तेमाल करता है कि लोग शोषण को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा मानने लगें. भारत में कारपोरेट मीडिया ने अपनी इस ताकत को ठीक-ठीक पहचानते हुए इसका भरपूर इस्तेमाल किया और अपने आप को कारपोरेट जगत की सेवा में अर्पित कर दिया.
जो फोन टैप हुए उनके बारे में हमें थोड़ा-बहुत पता चला है, लेकिन ज्यादातर लोगों के फोन तो टैप ही नहीं हुए होंगे, उनके बारे में क्या? यदि सारे चलते-पुर्जे के पत्रकारों के फोन के रिकार्ड हमारे सामने हों तो हमें न जाने कितनी बरखायें, न जाने कितने सांघवी और चावला मिल जायेंगे.
सवाल नैतिकता या पत्रकार-नैतिकता का नहीं, पूंजी के चरित्र का है. बड़ी पूंजी के बड़े खेल में मीडिया का मोहरे की तरह शामिल होना नीतिशास्त्र नहीं राजनीतिक-अर्थशास्त्र का तकाजा था. इसलिये इस पर जार-जार रोने और हाय-हाय करने का बहुत औचित्य नहीं दिखायी पड़ता. इस दौर में उन पत्रकारों के लिए अफसोस जरूर किया जा सकता है, जो ईमानदार रह गए और इसी वजह से बेचारे भी. वे मौजूदा दौर के पत्रकारिता के उसूलों से तालमेल न बिठा सके, इसलिए पिछड़ गए, वैसे आकांक्षा उनमें न रही होगी, अब तो दावे के साथ यह कहना भी मुश्किल ही है.
आइने के बारे में कहा जाता है कि जो कुछ भी उसके सामने हो, ठीक वैसी ही तसवीर वह दिखाता है, लेकिन अगर आइने पर 'तेल लगा' हो तब! तब तसवीर विकृत हो जायेगी. मीडिया के ऊपर कारपोरेट धन स्नेह (तेल) है. वह लालच के कीचड़ में धंसा हुआ है. इसलिये इसमें दिखने वाली हर तसवीर विकृत है. नैतिक आक्रोश से भरा 'सीधी बात' करने का दम भरने वाला पत्रकार झूठा है.

(ये आलेख मेरे मित्र अवधेश का है.)

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