1/18/10

रंग-बिरंगे सपने










मैं रंग-बिरंगे सपनों के
नीले दर्पण में
लाल-हरे मस्तूलों वाली
मटमैली सी नाव संभाले
याद तुम्हारी झिलमिल करती श्याम देह
केसर क़ी आभा से
गीला है घर बार
मार कर मन बैठा हूँ
ख़ाली मन की ख़ाली बातें
रातें हैं बिलकुल खामोश
डर लगता है.

मृत्युंजय

महबूब के तिलों से प्यारे हैं तिल के लड्डू
















जाड़े के लिहाज़ से
नजीर क़ी यह कविता पेशे-खिदमत है,
उम्मीद है काम आएगी!

                तिल के लड्डू                     


जाड़े में फिर खुदा ने खिलवाये तिल के लड्डू
हर एक खोमचे में दिखलाये तिल के लड्डू
कूचे गली में हर जा बिकवाये तिल के लड्डू

हमको भी हैंगे दिल से खुश आये तिल के लड्डू
जीते रहें तो यारो फिर खाए तिल के लड्डू!

उम्दों ने सौ तरह की याकूतियाँ बनाई
लोंगों में दालचीनी शक्कर भी ले मिलाई
सर्दी में दौलतों क़ी सौ गर्म चीजें खाईं
औरों ने डाल मिश्री गर पेड़ियाँ बनाईं
हमने भी गुड़ मंगाकर बंधवाये तिल के लड्डू!

रख खोमचे को सर पर पैकार यूँ पुकारा
बादाम भूना चाबो और कुरकुरा छुहारा
जाड़ा लगे तो इसका करता हूँ मैं इजारा
जिसका कलेजा यारों सर्दी ने होवे मारा
नौ दाम के वह मुझसे ले जाए तिल के लड्डू!

जाड़ा तो अपने दिल में था पहलवां झंझाडा
पर एक तिल ने उसको रग रग से है उखाड़ा
जिस दम दिलो जिगर को सर्दी ने आ लताड़ा
ख़म ठोंक हमने वोंही जाड़े को धर पछाड़ा
तन फेर ऐसा भभका जब खाए तिल के लड्डू!

कल यार से अपने मिलने के तैं गए हम
कुछ पेडे उसकी खातिर खाने को ले गए हम
महबूब हंस के बोला हैरत में हो रहे हम
पेड़ों को देख दिल में ऐसे खुशी हुए हम
गोया हमारी खातिर तुम लाये तिल के लड्डू!

जब उस सनम के मुझको जाड़े पे ध्यान आया
सब सौदा थोडा थोडा बाज़ार से मंगाया
आगे जो लाके रक्खा कुछ उसको खुश न आया
चीजें तो वह बहुत थीं पर उसने कुछ न खाया
जब खुश हुआ वह उसने जब पाए तिल के लड्डू!

जाड़ों में जिसको हर दम पेशाब है सताता
उट्ठे तो जाड़ा लिपटे नहीं पेशाब निकला जाता
उनकी दवा भी कोई पूछो हकीम से जा
बतलाये कितने नुस्खे पर एक बन न आया
आखिर इलाज उसका ठहराए तिल के लड्डू!

जाड़े में अब जो यारो ये तिल गए हैं भूने
महबूबों के भी तिल से इनके मज़े हैं दूने
दिल ले लिया हमारा तिल शकरियों क़ि रू ने
यह भी 'नजीर' लड्डू ऐसे बनाए तूने
सुन सुन के जिसकी लज्ज़त घबराये तिल के लड्डू!

1/15/10

कबीर

नाहीं धर्मी नाहीं अधर्मी, ना मैं जती न कामी हो,
ना मैं कहता ना मैं सुनता, ना मैं सेवक स्वामी हो !
ना मैं बंधा ना मैं मुक्ता ना मैं बिरत न रंगी हो,
ना काहू से न्यारा हुआ ना काहू का संगी हो !
ना हम सरग लोक को जाते ना हम नरक सिधारे हो,
सब ही कर्म हमारा कीया हम कर्मन ते न्यारा हो !
या मत को कोई बिरला बूझे सो अटर हो बैठे हो,
मत कबीर काहू को थापे मत काहू को मेटे हो !

कबीर