8/30/10

शमशेर की दो कविताएं

शमशेर क़ी जन्म शताब्दी चल रही है। कुछ कुछ लिखा पढ़ा जा रहा है। उन पर पढ़ने लायक पुराने कामों में साही का शमशेर क़ी काव्यानुभूति क़ी बनावट और बुनावट नाम का लेख है, आप उससे सहमत हों या नहीं। इस लेख में साही शमशेर को शुद्ध कवि बताते हैं। दूसरा लेख नामवर जी का है जो उन्होंने शमशेर प्रतिनिधि क़ी भूमिका के तौर पर लिखा था। इस लेख में शमशेर के काव्य मर्म को छूते हुए टिप्पणी क़ी गयी है पर फिर वही 'कवियों के कवि' वाली बात। तीसरा लेख रामविलास जी का है जो क़ि शमशेर के गद्य पर है। लेख अच्छा है पर वह सिर्फ गद्य पर है। अभी सुना क़ि रचना समय का कोई अंक उनपर केन्द्रित कर के निकला गया है। विशेष अंक तो मैंने एक और देखा था पर ऐसा कुछ ख़ास देखने को नहीं मिला।
अभी तक सिर्फ गजानन माधव मुक्तिबोध का लेख है जो शमशेर को पढ़ने में मदद करता है। किसी आलोचक का लेख हमारी मदद नहीं कर पाता, जितना मैंने पढ़ा है। खासकर उन कविताओं को जिनमें शमशेर जी का चित्रकार भी शरीक होता है उनके कवि के साथ।
जो हो, उनकी दो कवियायें पेश हैं,
जो
अभी तक उनके विवेचको के लिए चुनौती ही बनी हुई है-

शिला का खून पीती थी

शिला का खून पीती थी
वह जड़
जो क़ि पत्थर थी स्वयं।

सीढियां थीं बादलों क़ी झूलतीं,
टहनियों-सी

और वह पक्का चबूतरा,
ढाल में चिकना :
सुतल था
आत्मा के कल्पतरु का?


सींग और नाखून

सींग और नाखून
लोहे के बख्तर कन्धों पर।

सीने में सूराख हड्डी का।
आँखों में : घास क़ाई क़ी नमी।

एक मुर्दा हाथ
पाँव पर टिका
उलटी कलम थामे।

तीन तसलों में कमर का घाव सड़ चुका है।

जड़ों का भी कड़ा जाल
हो चुका पत्थर।

8/20/10

काश्मीर क़ी घाटी


काश्मीर की घाटी



काली माई ने अबकी हो!
किसका खून पिया है?
यह विशाल नरमेध यज्ञ हो!
बाकी कौन जिया है?



जी मार दिए नव तरुण-तरुणियाँ
मार दिए बागान

जी
मार दिए केसर के महमह खेत
संगीनों से रेत-रेत कर हत्या कर दी है
हंसी-खेल में मुल्क हुआ शमसान

एक तो मारेंगें
दूसरे रोने न देंगे,
गर कहीं पत्थर उठाया
तीसरे वे गोलियों से भून देंगें.
चार खूंटे ठोंक कर,
जीना बना देंगे कठिन
जटिल कर देंगे हवा में सांस लेना वे,
पोखरों में जहर घोलेंगे
औ आँखें फोड़ देंगे
औ कहेंगे हम तुम्हारी ही हैं करते बात!

कौन है वह राष्ट्र, वह धृत राष्ट्र
जहाँ अंधी नाचती है योगमाया,
अपनों ने भी कसर कहाँ बाकी रक्खी है,
कुटिल भुजंगिनी भारत क़ी सरकार-
एक समूची सभ्य जाति क़ी बलि लेकर भी
दांत दिखाती, लालकिले से करती जाये टनों मसखरी.
ज़री-काम करती भाषण में,
चाक करे है दिल दिमाग.

सस्ती मौत, सस्ती मौत
बेहद सस्ती मौत!
गोली से लाठी से चाकू-संगीनों से
आंसू गैस से बम से
छर्रों से वाटर पाईप से
तन से मन से धन से
मारो, मारो मारो
लालकिले से
मारो
भूख गरीबी महंगाई सब चंडूखाने क़ी गप्पें हैं!
मारो, इस्लामाबाद से मारो
घर में घुस कर मारो
गली गली में मारो
बाढ़ लगी है
घर-दुआर औ पशू-परानी, गल्ला-गेहूं, छाता-जूता नाश हो गए!
जनता को यह चिल्लाने दो !

मार पाई क्या इराकी जनता को सेना,
मार पाई क्या क्लस्टर बम से मन ?
बित्ते भर क़ी भगतसिंह क़ी पार्टी को क्या मार पाए थे अंगरेजी हुक्काम ?
मार सकी क्या भूमिहीन मजदूरों के जन आन्दोलन को
कोई भी सरकार ?
मर सकती क्या आज़ादी क़ी आग?

अभी बर्फ जब जम जाएगी
जभी हिमालय जिन्दा होगा
खून के थक्के बन जाएँगे
जिन्दा-दिल हथियार
प्रतिरोधी कश्मीरी जनता
रक्त पिपासु काली के हाथों का खप्पर तब छीनेगी
इब्लीशों का नाश करेगी
उठा पटक देगी सरकारों का कंकाली ढांचा
असली डेमोक्रेसी अपने लिए बुनेगी
अपने मन से अपने तन से जोड़ेगी
नए नए उद्योग
और अपने बल से अपनी जन्नत को फिर
हासिल कर ही लेगी
धीरज रक्खो!

मृत्युंजय/ बंगलुरु

8/19/10

शमशेर

शमशेर हिंदी के ही नहीं, संसार के अप्रतिम कवियों में एक हैं। वे प्रेम को उसकी द्वंद्वात्मकता में महसूस करते हैं। तो दया, सहानुभूति के चक्कर और ही दाता का भाव। माशूक के लिए कुर्बान होने क़ी जिद क़ी बजाय वे ग़ालिब के
ज्यादा नजदीक हैं। ' तो फिर संगे-दिल तेरा ही संगे-आस्तां क्यूं हो' वाले ग़ालिब क़ी अगली कड़ी हिन्दुस्तानी कविता में तब हाथ लगती है जब शमशेर
लिखते हैं- 'हाँ, तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं, जिनमें वे फंसने नहीं आतीं' एंगेल्स रचना में विचारधारा को छुपा हुआ मानने के हिमायती थे। शमशेर क़ी कविताएँ इसी चुनौती के साथ लुभाती हैं। उसको
समझने के लिए मुक्तिबोध का सूत्र मेरे तो काफी काम आया-
"अंधियाली मिट्टी क़ी गीली-गीली परतों
में डूबो, डूबो, गड़ो, और गल जाओ"
दो कविताएँ पेश हैं, शमशेर जी को याद करते हुए-


लेकर सीधा नारा


लेकर सीधा नारा
कौन पुकारा
अंतिम आशाओं क़ी संध्याओं से?

पलकें डूबी ही-सी थीं -
पर अभी नहीं;
कोई सुनाता-सा था मुझे
कहीं;
फिर किसने यह, सतो सागर के पार
एकाकीपन से ही, मानो-हार,
एकाकी हो मुझे पुकारा
कई बार?

मैं समाज तो नहीं; मैं कुल
जीवन;
कण-समूह में हूँ मैं केवल
एक कण।

कौन सहारा !
मेरा कौन सहारा !

(1941)



चुका भी हूँ मैं नहीं !


चुका भी हूँ मैं नहीं
कहाँ किया मैंने प्रेम
अभी।

जब करूंगा प्रेम
पिघल उठेंगे
युगों के भूधर
उफान उठेंगे
सात सागर।
किन्तु मैं हूँ मौन आज
कहाँ सजे मैंने साज़
अभी।

सरल से भी गूढ़, गूढ़तर
तत्त्व निकालेंगे
अमित विषमय
जब मथेगा प्रेम सागर
ह्रदय।

निकटतम सबकी
अपर शौर्यों क़ी
तुम

तब बनोगी एक
गहन मायामय
प्राप्त सुख


तुम बनोगी तब
प्राप्य जाय !

(1941)


शमशेर बहादुर सिंह

रोना

मैं रोना चाहता हूँ!

आंसू भरे हुए दिमाग पर जोर डाल रहा हूँ
कि बूँद भर भी नहीं निकलेगा आंसू

रोना तो हमेशा किसी के सामने चाहिए

अपने ही सामने बैठ कर रोना
हमेशा की तरफ इस बार भी कम टिका

जब कि मैं चाहता हूँ खूब रोऊँ

इधर उधर देख कर रोना भी
अंततः अपनी तरफ देख कर रोना बन जाता है

इसमें सोने की तुक मिला दूँ क्या?
या फिर खोने का?

(ये पेंटिंग मेरे एक प्रतिभाशाली बेरोजगार दोस्त अनुपम की है.)

मृत्युंजय/बंगलुरु

8/18/10

रोज़गार की बेरोजगारी

बेरोजगारी के जमाने में पक्का बेरोजगार होना काफी मुश्किल है!
क्योंकि इसका मतलब होगा बेरोजगारी का रोज़गार.

वैसे हर रोज़गार रोज रोज किसी ग़ार में जाने से कम नहीं
और 'बे' साहब का यह तखल्लुस भी काफी जमता है उनपर
फिर भी दिल है के फुर्सत के बहाने ढूँढने के लिए राजी ही नहीं होता .

फरेब की छोडिये, अमरीकियों और उनके चेलों चपाटों के लिए
मैं तो राजी हूँ कि -मानदारी बरतूंगा
एफ-एक्टिविस्ट भी बनूँगा
डी-कंस्ट्रक्ट हो जाऊंगा
पर जिम्मा तो ले कोई
रोज़गार की बेरोजगारी का

मृत्युंजय/बंगलुरु

8/15/10

पास रहो ! -मुक्तिबोध

मुक्तिबोध को एकबार एक आलोचक साब ने पौरुष का कवि घोषित किया,चलिए ये तो फिर भी भला पर बाद उसके, कहा उन्होंने, कि उनकी कविताओं में प्रेम और स्त्री, दोनों गायब हैं.उनके बिम्ब प्रतीक सब पौरुष वाले हैं.
भले मानुष की बात का जवाब क्या देना और नाम में क्या रखा है, पर बात की बात में यह
कविता याद आई, देखिये
और देखते रह जाइए-




तुम चाहे जो हो
नारी, या देश या विश्व
बालक या युवा अश्व
सर्वोत्तम जो भी है-
फुश्पा या चुम्बन या लक्ष्य
श्रेष्ठतम स्वप्नों के कक्ष
वह तुम हो!!
और जो भी है मेरे पास
मन-भीतर
आग या रस
बेबस ह्रदय का बस
सब तुम्हें देने को
उमड़ता है जी!!
और ये, सब देकर
जो कुछ शेष
जैसे दुःख के दारिद्र्य के लत्तर
कमजोरी के बुरे-बुरे रूप स्वरुप बुरे बुरे वेश
उन सबसे
अपने को छिनना भिन्न करने का लक्ष
अभिन्न नहोना है
यानी तुम्हे पाना है
अपने अकेले में न जाने कबसे
लड़ते रहने का कार्य
यह सब स्वीकार्य
बशर्ते कि तुम रहो पास
सहास!!

8/11/10

गेहूं दो, चावल दो !



1967 में लिखी नागार्जुन की यह कविता पेश है.
कविता में बाबा ने हिन्दुस्तानी दलालों को लक्ष्य बनाया है.
सबसे जोरदार है अंदाज़े बयां -


गेहूं
दो, चावल दो !


गेहूं दो, चावल दो !
इतना दिया, और दो, पुष्कल दो !
गंगा बेकार है, हडसन का जल दो !
चारा दो, फल दो !
हिलेगी कैसे, दुम में बल दो !
गेहूं दो, चावल दो !!

जीत हम जाएँ, सवालों का हल दो !
बटोर लिए हैं राजा-रानी, मोर पंख झल दो !
धोखा खा जाएँ पड़ोसी, ऐसी अकल दो !
उगे हैं बगावत के अंकुए, उनको मसल दो !
रंगी हैं तरुण निगाहें, जादुई काजल दो !

जपे हैं नाम बहुत, उसका फल दो !
फिलहाल गेहूं दो, चावल दो !
और दो, अधिक दो, पुष्कल दो !
कानो को भले बराबर मल दो !
हिलेगी खूब, दुम में बल दो !

8/9/10

मैं कुछ न कुछ बच जाता था

मौत से तकसीम होने (बँट जाने)की यह अदा अफ़ज़ाल के शायर की
तल्खी है जो उर्दू शायरी की बहु स्तरीय अर्थ परंपरा का बखूबी निर्वाह कराती है.
अगर मौत अनंत है तो शायर भी अनंत हुआ और अगर वह सिफ़र है तो
शायर भी सिफ़र हुआ. अलग अलग वजहों से इंसान को तकसीम करने वाली
व्यवस्था जब डर जाती है इंसानी जिजीविषा से तो अंत में मौत की सहायता से
इंसानी वजूद को तकसीम करती है. पर इस तकसीम से दोनों रस्ते खुलते हैं-
सिफ़र का भी और अनंत का भी. या कहिये तो मौत के भी अलग अलग रूप
हो सकते हैं और उससे आगे की बात बदल सकती है.
जो हो, अफ़ज़ाल की शायरी के यही तो मज़े हैं-

मैं कुछ न कुछ बच जाता था

मुझे फाकों से तकसीम किया गया
मैं कुछ न कुछ बच गया

मुझे तौहीन से तकसीम किया गया
मैं कुछ न कुछ बच गया

मुझे न इंसाफी से तकसीम किया गया
मैं कुछ न कुछ बच गया

मुझे मौत से तकसीम किया गया
मैं पूरा पूरा तकसीम हो गया

...
अफ़ज़ाल अहमद सैयद

8/6/10

ग़ालिब : चंद अशआर

बहुत दिनों बाद अचानक यह ग़ज़ल नज़र से गुज़री
सोचा इसके कुछ शेर हज़रात के सामने पेश करूं.
इसको पढ़ते ही फिराक़ साहब का वो शेर याद आता है-
"पास रहना किसी का रात की रात
मेहमानी भी, मेजबानी भी"
खैर, ग़ालिब की ग़ज़ल के कुछ शेर यूं हैं -




मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए
जोशे कदह से बज़्म चरागाँ किये हुए

करता हूँ जमा फिर जिगरे लख्त लख्त को
अरसा हुआ है दावते मिश्गां किये हुए

फिर चाहता हूँ नाम ए दिलदार खोलना
जां नजरे दिल फरेबिए उन्वां किये हुए

मांगे है फिर किसी को लब ए बाम पर हवस
जुल्फे सियाह रुख प परीशां किये हुए

दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन
बैठे रहें तसव्वुरे जाना किये हुए

8/4/10

प्रार्थना

एक कविता ऐसी जो बचपन में
सुनी थी, हमारे गाँव के एक
पुजारी जी थे, जीवन भर सिर्फ
एक ही प्रार्थना क़ी।
अन्य शास्त्र आदि उनसे साबका
न रख पाए.

आप भी उनकी प्रार्थना सुनिए-

जय जगदीश, जय जगदीश
गाय दा बीस भैंस दा तीस
रहरी के दाल जड़हने क भात
गलगल नेबुआ औ घिव तात
जय जगदीश!

कवि की झुंझलाहट




यह कविता ऐसे तो
सामान्य
रूप में काव्य क्षेत्र के भीतर
एकाधिकार
को प्रतिष्ठित करती है
पर
एक झुंझलाए हुए कवि
सुन्दर
की हालत तो देखिये!





बोलिए तौ तब जब बोलिबे की बुद्धि होय,
ना तो मुख मौन गहि चुप ह्वै रहिये!!
जोरिये तो तब जब जोरिबे की रीति जानै,
तुक, छंद, अर्थ अनूप जामे लहिये!!
गाइए तो तब जब गाइबे को कंठ होय,
श्रवन के सुनतही मनै जाय गहिये!!
तुकभंग, छ्न्दभंग, अर्थ मिलै न कछू,
सुन्दर कहत ऐसी बानी नहीं कहिये!!

जिससे मोहब्बत हो


जिससे मोहब्बत हो
उसे निकाल ले जाना चाहिए
आख़िरी कश्ती पर
एक मादूम होते शहर से बाहर

उसके साथ
पार करना चाहिए
गिराए जाने की सजा पाया हुआ एक पुल

उसे हमेशा मुख़्तसर नाम से पुकारना चाहिए

उसे ले जाना चाहिए
जिंदा आतिशफसानों से भरे
एक ज़जीरे पर

उसका पहला बोसा लेना चाहिए
नमक की कान में
एक अज़ीयत देने की कोठरी के
अन्दर

जिससे मोहब्बत हो
उसके साथ टाइप करनी चाहिए
दुनिया की तमाम नाइंसाफियों के खिलाफ
एक अर्ज़दाश्त

जिसके सफ़हात
उदा देने चाहिए
सुबह
होटल के कमरे की खिड़की से
स्वीमिंग पूल की तरफ


अफजाल अहमद



"मादूम-गायब, नष्ट
आतिश फ़साना- ज्वालामुखी
ज़जीरा- द्वीप
कान-खदान
अज़ीयत-यातना"