9/29/10

बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाये- उस्ताद भीमसेन जोशी

डर के इस आलम में अपनी गंगा-जमुनी तहजीब की गोद की सुरक्षा में रहने का मन कर रहा है.
आज इस पोस्ट को लगते वक्त मेरे जेहन में कल के तनाव घूम रहे हैं.
कल क्या होगा? लोग एक दूसरे से डरे हुए हैं और कुछ लोग दूसरों से ज्यादा डरे हुए हैं!मैं डर रहा हूँ और जोशी जी को सुन रहा हूँ!

सुनिए आप भी-
उस्ताद भीमसेन जोशी की आवाज़ में-
'बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाये'

ये नवाब वाजिद अली शाह की लिखी हुई भैरवी ठुमरी है.

9/27/10

मधुप मुद्गल- कबीर


कबीर को कुमार गन्धर्व से सुनना एक अनुभव है, पर कबीर को इतने उस्तादों ने गाया है कि हर बार अलहदा व्याख्या होती चलती है. फिर अपने-अपने फ़न का भी मामला है!

आज सुनिए कुमार गन्धर्व के शिष्य रहे मधुप मुद्गल से कबीर को!

मधुप जी संगीत की एकेडमिक्स में गहरे रमे हुए हैं,सिर्फ यह कहना उनको बहुत कम करके आंकना है!उनकी आवाज़ लोक की आवाज़ के काफी नजदीक है.और मेरे हिसाब से ऐसे उस्तादों की थोड़ी कमी हुई है.

कबीर की एक 'उलटबांसी' (?) और एक पद मधुप साहब की आवाज़ में ये रहे-


9/25/10

निराला, गुंडेचा और ध्रुपद

हिंदी में संगीत और काव्य का रिश्ता भक्तिकाल में बेहद मज़बूत था. आज भी भक्त कवियों की लिखी बंदिशें हम उस्तादों से सुनते ही रहते हैं, सूर हों या कबीर, मीरा हों या सुन्दरदास. रीतिकाल में भी यह रिश्ता मज़बूत रहा.पर जाने क्यों, आधुनिक होते ही हमने कविता से संगीत के रिश्ते को भुला दिया. अगर भुला न दिया तो कम जरूर होता गया यह बंधन!कारणों का विश्लेषण आलिम करें, अपन का तो सिर्फ ये रोना है कि यह नहीं है.
पर निराला ऐसे कवि न थे,
उन्होंने एक कविता लिखी -" ताक कमसिन वारि "
विद्वानों की समझ में कविता न आनी थी, सो न आयी. इसे निराला की विक्षिप्तावस्था से जोड़ दिया गया. ईश्वर, गर कहीं हो, तो इन्हें माफ़ करे क्यों कि ये नहीं जानते कि इन्होने क्या किया!

खैर, ध्रुपद सुनने में अपेक्षित धैर्य के साथ आज सुनिए निराला की यही बंदिश-
रमाकांत और उमाकांत गुंडेचा से.

9/22/10

मुक्ति की आकांक्षा- सर्वेश्वर

मैं आज सर्वेश्वर की एक कविता पढ़ रहा था 'मुक्ति की आकांक्षा'. इसमें कहा गया कि चिड़िया हर हालत में पिंजरे के बाहर निकलना चाहेगी पर जब चिड़िया बहुत दिनों तक बंद रहे तो वह पिंजरे में ही अनुकूलित कर दी जाती है. आज तो हम और ज्यादा अनुकूलन क़ी स्थितियों में रह रहे हैं. तो क्या यह कविता लिखते हुए सर्वेश्वर जी के मन में यह बात न रही होगी? जरूर ही रही होगी, क्योंकि वे असावधान कवि तो नहीं ही हैं.
फिर क्या वजह है?
पिंजरे में मौजूद यह चिड़िया इंसान या और नजदीक एक औरत हो सकती है. गुलामी व पितृसत्ता के चंगुल में फंसी हुई. पिंजरा न सिर्फ बंधन है बल्कि अनुकूलन भी है. सर्वेश्वर ने अनुकूलन को नहीं बल्कि अनुकूलन के खिलाफ लड़ने वाली आजाद्ख्याली को केंद्र में रखा. याद करिए शेखर जोशी क़ी 'बदबू', जहाँ हाथ से आती किरासिन क़ी बदबू से अनुकूलन अंततः नहीं होता है.
कवि या रचनाकार क़ी प्रतिबद्धता यहाँ उसे एक नया सहारा दे देती है.
बहरहाल कविता ये रही-

मुक्ति की आकांक्षा

चिडि़या को लाख समझाओ
कि पिंजड़े के बाहर
धरती बहुत बड़ी है, निर्मम है,
वहॉं हवा में उन्‍हें
अपने जिस्‍म की गंध तक नहीं मिलेगी।
यूँ तो बाहर समुद्र है, नदी है, झरना है,
पर पानी के लिए भटकना है,
यहॉं कटोरी में भरा जल गटकना है।
बाहर दाने का टोटा है,
यहॉं चुग्‍गा मोटा है।
बाहर बहेलिए का डर है,
यहॉं निर्द्वंद्व कंठ-स्‍वर है।

फिर भी चिडि़या
मुक्ति का गाना गाएगी,
मारे जाने की आशंका से भरे होने पर भी,
पिंजरे में जितना अंग निकल सकेगा, निकालेगी,
हरसूँ ज़ोर लगाएगी
और पिंजड़ा टूट जाने या खुल जाने पर उड़ जाएगी।

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

9/20/10

उस्ताद बिस्मिल्ला खान: इंटरव्यू, शहनाई के बीच- बाकी किस्तें

दो तीन दिन क़ी गैर हाजिरी के बाद हर्जाने के लिहाज़ से
अब सुनिए बिस्मिल्ला खान साहब के इंटरव्यू क़ी बाकी किस्तें!

9/16/10

उसने खुशबू की तरह मेरी पज़ीराई की -मेंहदी हसन/ आबिदा


कू ब कू फ़ैल गयी बात शनासाई की
उसनें खुशबू की तरह मेरी पज़ीराई की...
परवीन शाकिर की चर्चित ग़ज़ल को कई बड़े गायकों ने स्वर दिए हैं.
इस ग़ज़ल की खूबसूरती मेरी समझ में यह है कि एक औरत के दुःख इसमें लिरिकल हो गए हैं.
लिरिकल से सरल का नहीं बल्कि मैं विस्तार का अर्थ ले रहा हूँ. इसीलिये ग़ज़ल की गति मंथर हो उठी है. मेंहदी हसन की अदायगी में यह बात महसूस की जा सकती है. वे इस ग़ज़ल को और भौतिक बना देते हैं. पर आबिदा की आवाज़ और अदायगी का रहस्य उसके ऊपर से आने में है, इसी नाते ग़ज़ल को निभाते हुए वे उसे गहराई की बजाय ऊंचाई का आयाम अता कर देती हैं.
एक ही ग़ज़ल जब दो गायक गा रहे हों तो तुलना करने का मन करने ही लगता है. पर इस तुलना को छोड़, आइये सुना जाये परवीन शाकिर की इस ग़ज़ल को-

9/15/10

उस्ताद बिस्मिल्ला खान: इंटरव्यू, शहनाई के बीच- 2

छुटपन में मेरे अपने गाँव में विदा होते वक्त लडकियां रोते-रोते रोने के कारणों को भी बताती जाती थीं. मतलब कि रोने के राग में वे अपने गद्यात्मक दुखों को पिरो देतीं थीं. उस्ताद के इंटरव्यू का यह भाग रोने और राग के बीच के अद्भुत रिश्ते को हमारे लिए और खोल देता है. हाल की अवस्था और क्या है सिवाय इसके कि हमारे दुःख और हमारी प्रार्थनाएं राग में घुल जाएँ.
अब सुनिए इस इंटरव्यू का यह दूसरा भाग, जिसमें उस्ताद इशारा कर रहे हैं कि मनुष्य की ज्यादातर प्रार्थनाएं राग का रूप लेकर ही आती हैं. आदिम काल से संगीत मनुष्य की अभिव्यक्ति का जबरदस्त जरिया रहा है. संगीत की यह आदिमता उसे मनुष्य की सबसे भीतरी और मूल दुनिया तक ले जाती है और इसका रास्ता हमारे दुखों से होकर ही गुज़रता है.

9/14/10

उस्ताद बिस्मिल्ला खान: इंटरव्यू, शहनाई के बीच- 1

उस्ताद बिस्मिल्ला खान को कौन नहीं जानता! वे शहनाई के बादशाह थे, सुर उनके पीछे खिंचे आते थे, वे संत थे. उनमें पूरा बनारस बोलता था. सुनिए उनका एक बहुत जबरदस्त इंटरव्यू, जो उनके शहनाई वादन से गुंथा है.
यह इंटरव्यू २० भागों में है. ज्यों ज्यों आप इसे सुनते जाते हैं, संगीत की, नम्रता की, मौज की, बराबरी की, बनारस की एक दिलकश दुनिया आपके सामने खुलती जाती है. यहाँ शहनाई और उस्ताद, दोनों एकमेक हो गए हैं. बारी बारी से मैं इसे आपको सुनवाता रहूँगा.
आज इस पोस्ट में सुनिए उसके दो भाग-

छोटी सी उमर परनाई ओ बबा सा- नुसरत, शोभा गुर्टू

'छोटी सी उमर, परनाई ओ बबा सा'
आज ये गीत सुनिए दो बड़े उस्तादों,
शोभा गुर्टू और नुसरत साहब की आवाज़ में!

इस गीत के भीतर इतनी गहरी बेचैनी भरी है, और इसे इतना प्रभावी गाया गया है कि शब्द सचमुच साथ छोड़ देते हैं.

9/13/10

अकबर इलाहाबादी

अकबर इलाहाबादी की शायरी को मज़ाक और हल्केपन के साथ लिया जाता रहा है. इसका एक मुजाहिरा 'कविता कोश' ने तब किया जब उन्होंने अकबर के निम्नांकित शेर हास्य रस में डाले. मैं हास्य रस का विरोधी नहीं हूँ. पर अव्वल तो ये शेर सिर्फ हास्य के पैमाने से देखे नहीं जा सकते क्योंकि इनमें एक ख़ास व्यंग्य है.
दूसरे उस जमाने को याद करिए जब गांधी जी हिंद स्वराज लिख रहे थे. हिंद स्वराज में भी बहुतेरी 'पिछड़ी' बातें हैं, पर किसी की क्या मजाल की उस पर हंस सके! अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब हिंद स्वराज पर क्विंटलों सामग्री साया हुई है.
अंगरेजी उपनिवेशवाद से लड़ते झगड़ते अकबर कौम की बात करते हैं, जिसे पिछड़ा कहा जाता है. पर अंग्रेजों ने जो हमें दिया, वह सब बहुत अगड़ा है क्या? और खुद पूंजीवादी देशों में जो व्यवस्था राज कर रही है वह कितनी अगड़ी है, यह अबू गरेब और ग्वंतामालो के बाद आईने की तरह साफ़ ही है.
कहने का मतलब सिर्फ यह कि अकबर अपने हिसाब से अंगरेजी उपनिवेशवाद का विरोध कर रहे थे, जरूरी नहीं कि उनका 'पिछड़ापन' महत्त्व की रोशनी से जगमगा न रहा हो.
सो अकबर की शायरी पर वैसे ही सोचना होगा जैसे गांधी के हिंद स्वराज पर.

पेश हैं यहाँ उनके कुछ शेर
जो दिखाते सीधे हैं पर उपनिवेशवाद के हिन्दुस्तानी दलालों को काफी खराब लगते रहे होंगे-



तमाशा देखिये बिजली का मग़रिब और मशरिक़ में
कलों में है वहाँ दाख़िल, यहाँ मज़हब पे गिरती है

मग़रबी ज़ौक़ है और वज़ह की पाबन्दी भी
ऊँट पे चढ़ के थियेटर को चले हैं हज़रत

हम ऐसी कुल किताबें क़ाबिले-ज़ब्ती समझते हैं
कि जिनको पढ़ के बच्चे बापको ख़ब्ती समझते हैं

पाकर ख़िताब नाच का भी ज़ौक़ हो गया
‘सर’ हो गये, तो ‘बाल’ का भी शौक़ हो गया

ख़ुदा की राह में अब रेल चल गई ‘अकबर’!
जो जान देना हो अंजन से कट मरो इक दिन.

क्या ग़नीमत नहीं ये आज़ादी
साँस लेते हैं बात करते हैं!

मेरी नसीहतों को सुन कर वो शोख़ बोला-
"नेटिव की क्या सनद है साहब कहे तो मानूँ"


बेपर्दा नज़र आईं जो चन्द बीवियाँ
‘अकबर’ ज़मीं में ग़ैरते क़ौमी से गड़ गया
पूछा जो उनसे -‘आपका पर्दा कहाँ गया?’
कहने लगीं कि अक़्ल पे मर्दों की पड़ गया.

फिरंगी से कहा, पेंशन भी ले कर बस यहाँ रहिये
कहा-जीने को आए हैं,यहाँ मरने नहीं आये

बर्क़ के लैम्प से आँखों को बचाए अल्लाह
रौशनी आती है, और नूर चला जाता है

क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ
रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ

मुकुल शिवपुत्र की गाई दो और बंदिशें

मुकुल शिवपुत्र की दिमागी हालत खराब बताने वालों की कमी नहीं, पर ऐसे 'चतुर-सुजानों' के दिवालियेपन का किया भी क्या जा सकता है! ये एक लाईलाज बीमारी है.
एक ऐसा आदमी जो इस दुनिया को थोड़ी अलग तरह से देखने की कोशिश करे, इसमें फिट होने से इनकार कर दे, उसको विक्षिप्त बताना कोइ नयी बात नहीं. निराला को याद करिए और सोचिये!

इस समाज में अपने से अलग किसी भी इंसान को बर्दाश्त करने की संवेदनशीलता का खात्मा हो गया है, अब यहाँ एक ही तरह के लोग रहेंगे, जो अलग होगा उसे काट छांटकर अपने में शामिल कर लिया जाएगा. यह भी ख़ास तरह का भूमंडलीकरण है. मुकुल शिवपुत्र की कला इसके प्रतिवाद में खड़ी है.

मुकुल शिवपुत्र पर लगाई गयी पिछली पोस्ट में सुभ्रमनियम जी ने फरमाईश की थी कि मुकुल साहब की गाई कुछ और बंदिशें पेश की जाएँ, सो उनके गए दो छोटे कम्पोजीशन ये रहे-


9/12/10

मिले सुर मेरा तुम्हारा- भीमसेन जोशी


जब अभी नए गायकों कलाकारों से देश की एकता बताने के लिए 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' गवाया गया तो लगा कि संगीत के क्षेत्र में हिन्दुस्तानी शासक वर्ग की समझ लगातार बदतर होती जा रही है. अगर कहीं आप इसका वीडिओ देख लें तो फिर खुदा भी पता नहीं आपकी खैर कर पायेगा या नहीं! सौंदर्यशास्त्र के नए पैमाने उन्हीं को मुबारक! इसे ही मुक्तिबोध जड़ीभूत सौंदर्यशास्त्र कहा करते थे.
इसी के साथ याद आना ही था पुराना 'मिले सुर मेरा तुम्हारा', पंडित भीमसेन जोशी की मेघ मंद्र आवाज़ में.
आज सुनिए पुराना 'मिले सुर मेरा तुम्हारा'

9/6/10

वसुंधरा कोमकली

वसुंधरा कोमकली की आवाज़ को अक्सर कुमार गन्धर्व के साथ जोड़ कर देखा जाता है. मगर उनकी आवाज़ का जादू अलग ही है.सुनिए उनकी आवाज़ में राग मंद. इससे पहले आप कुमार साहब की आवाज़ में यही राग सुन चके हैं. बंदिश का शीर्षक है 'मृगनयनी'

मुकुल शिवपुत्र

आज सुनिए मुकुल शिवपुत्र से,
'जाओ वहीं तुम श्याम' बंदिश
बेहद प्रतिभाशाली, फक्कड़ और मौजी संगीतकार मुकुल कि आवाज़ में एक ख़ास खसखसापन है, अनगढ़पन है जो सुनने वाले को अपनी और बुलाता भी है और बहुत नजदीक भी आने नहीं देता. उनकी गायकी इस परिचय की मुहताज नहीं कि वे कुमार गन्धर्व के बेटे हैं. प्रतिभाशाली लोगो के पुत्र भी प्रतिभाशाली हों, अमूमन तो ऐसा नहीं होता. अव्वल तो वे वह रास्ता नहीं लेते जिनपर उनके पिता चले और दूसरे अगर ऐसा कर भी लिया तो ता-जिन्दगी पिता की छाया से मुक्त नहीं हो पाते. इस सबसे मुकुल बहुत अलग हैं, हाँ, उनकी गायकी में कुमार साहब की गायकी का गहरा असर जरूर महसूस कर सकते हैं.

9/5/10

कुमार गंधर्व: अद्भुत जुगल

कुमार गन्धर्व के गायन में आप सब को 'त्रिवेणी' नाम का अल्बम याद ही होगा. सूर, कबीर और मीरा के गीतों से रचे इस संसार को गायकी के लिहाज़ से सुनना तो जबरदस्त है ही, सबसे अद्भुत है वसुंधरा कोमकली के साथ उनकी युगनद्ध आवाज़! प्रेम का यह जबरदस्त आत्मिक-व्यवहारिक आख्यान अकेले पड़ते जाने की इस दुनिया में हमें संवेदनाओं की दुनिया में ले जाता है. खासकर जब वे दोनों मीरा को गाते हैं तो देश-काल से बिंधकर हम करुणा के संसार में डुबो दिए जाते हैं.
सुनिए कुमार साहब और वसुंधरा जी का गाया हुआ मीरां का एक भजन
'पियाजी, म्हारे नैना आगे रह्यो जी'

कुमार गन्धर्व पर सर्वेश्वर

कुमार गन्धर्व एक अनूठे संगीतकार हैं. अपनी लोक सम्पृक्ति और आवेग भरी आवाज़ के साथ वे हमसे तादात्म्य कायम करते हैं. हिन्दी कवियों और रचनाकारों की एक पूरी पीढी उनसे गहरे प्रभावित रही है. पर सब ऐसा नहीं मानते. एक बार लगभग अनौपचारिक सी बातचीत में वरिष्ठ आलोचक शिव कुमार मिश्र ने सवाल खड़ा किया कि "कुमार साहब ने गाने के लिए कबीर के आध्यात्मिक पद ही चुने हैं. दूसरे किस्म के पद वहां नहीं हैं." और यह बात तथ्य के नहीं वरन आरोप की शक्ल में थी. हाँ, यह सच है, पर क्या गायन को हम सिर्फ उसके बोल के लिए सुनने जाते हैं? इसके लिए छपे हुए शब्द ही पढ़ लेना बेहतर होता. गायक गाने को कैसा निभाता है यह भी मानीखेज चीज है. गायन के रूप का कथ्य खोजने की बजाय इतने स्थूल रूप से उसके उपरी ढांचे को छू कर लौट आना मुझे विचित्र और आश्चर्यजनक, दोनों लगा. और जहाँ तक मोटा-मोटी ढांचे की भी बात है, कबीर को तो ऐसे पदों के लिए आध्यात्मिक नहीं कहा जाता. कुमार साहब पर यह इनायत क्यों? जवाब संभव हैं पर इसकी यहाँ जगह नहीं.

कुमार साहब की गायकी की ताकत को शब्दों में ढाल पाना बेहद मुश्किल काम है पर ये चुनौती निभाई सर्वेश्वर जी ने.इस अद्भुत कविता को हम सब तो पढ़ ही रहे हैं, शिवकुमार जी को जरूर ही इसे पढ़ना चाहिए!
आज वही कविता-

सुरों के सहारे

दूर-दूर तक
सोयी पड़ी थी पहाड़ियां
अचानक टीले करवट बदलने लगे
जैसे नींद में उठ चलने लगे.

एक अदृश्य विराट हाथ बादलों-सा बढ़ा
पत्थरों को निचोड़ने लगा
निर्झर फूट पड़े
फिर घूमकर सब कुछ रेगिस्तान में बदल गया.

शांत धरती से
अचानक आकाश चूमते
धूल भरे बवंडर उठे
फिर रंगीन किरणों में बदल
धरती पर बरसकर शांत हो गए.

तभी किसी
बांस के वन में आग लग गयी
पीली लपटें उठने लगीं,
फिर धीरे-धीरे हरी होकर
पत्तियों से लिपट गयीं.

पूरा वन असंख्य बांसुरियों में बज उठा,
पत्तियां नाच-नाचकर
पेड़ों से अलग हो
हरे तोते बन उड़ गयीं.

लेकिन भीतर कहीं बहुत गहरे
शाखों में फंसा
बेचैन छटपटाता रहा
एक बारासिंहा.

सारा जंगल कांपता हिलता रहा.

लो वह मुक्त हो
चौकड़ी भरता
शून्य में विलीन हो गया
जो धमनियों से
अनंत तक फैला हुआ है.


(कुमार गन्धर्व का गायन सुनते हुए)
-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना)

और इसी कविता के साथ सुनिए कबीर का 'अवधू! कुदरत की गति न्यारी',
जहां कबीर और कुमार साहब मिलकर अवधू लोगों का मज़ा ले रहे हैं!

9/3/10

कुमार गन्धर्व: बिरह के बोल

कुमार साहब के स्वरों में एक अ क्लासिक उदात्तत्ता है। ये हमें क्लासिक के आधारों क़ी तरफ ले जाती है। कुमार साहब ने एक बार हिन्दी साहित्य सम्मलेन क़ी पत्रिका के लिए लेख लिखा था जिसमें उन्होंने लोक को सारे शास्त्रीय संगीत का आधार बताया था, और किसी भी नयी खोज के लिए संगीतकारों को उस दिशा में जाने क़ी सलाह दी थी। औरों क़ी छोडिये, कुमार साहब खुद ता-जिन्दगी इसी रास्ते से गुजर कर रचते रहे।

आज सुनिए उनका एक गीत जो मध्यकालीन स्त्री क़ी आवाज़ को अभिव्यक्ति देता है। अगर आपको जायसी के पद्मावत क़ी रानी नागमती और उनके वियोग क़ी याद हो तो कुमार क़ी इस रचना का अर्थ और खुलने लगता है।
"हौं बिन नाह मंदिर को छावा", जिस पर रामचंद्र शुक्ल से मर्यादावादी भी रीझ गए थे.