9/13/10

अकबर इलाहाबादी

अकबर इलाहाबादी की शायरी को मज़ाक और हल्केपन के साथ लिया जाता रहा है. इसका एक मुजाहिरा 'कविता कोश' ने तब किया जब उन्होंने अकबर के निम्नांकित शेर हास्य रस में डाले. मैं हास्य रस का विरोधी नहीं हूँ. पर अव्वल तो ये शेर सिर्फ हास्य के पैमाने से देखे नहीं जा सकते क्योंकि इनमें एक ख़ास व्यंग्य है.
दूसरे उस जमाने को याद करिए जब गांधी जी हिंद स्वराज लिख रहे थे. हिंद स्वराज में भी बहुतेरी 'पिछड़ी' बातें हैं, पर किसी की क्या मजाल की उस पर हंस सके! अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब हिंद स्वराज पर क्विंटलों सामग्री साया हुई है.
अंगरेजी उपनिवेशवाद से लड़ते झगड़ते अकबर कौम की बात करते हैं, जिसे पिछड़ा कहा जाता है. पर अंग्रेजों ने जो हमें दिया, वह सब बहुत अगड़ा है क्या? और खुद पूंजीवादी देशों में जो व्यवस्था राज कर रही है वह कितनी अगड़ी है, यह अबू गरेब और ग्वंतामालो के बाद आईने की तरह साफ़ ही है.
कहने का मतलब सिर्फ यह कि अकबर अपने हिसाब से अंगरेजी उपनिवेशवाद का विरोध कर रहे थे, जरूरी नहीं कि उनका 'पिछड़ापन' महत्त्व की रोशनी से जगमगा न रहा हो.
सो अकबर की शायरी पर वैसे ही सोचना होगा जैसे गांधी के हिंद स्वराज पर.

पेश हैं यहाँ उनके कुछ शेर
जो दिखाते सीधे हैं पर उपनिवेशवाद के हिन्दुस्तानी दलालों को काफी खराब लगते रहे होंगे-



तमाशा देखिये बिजली का मग़रिब और मशरिक़ में
कलों में है वहाँ दाख़िल, यहाँ मज़हब पे गिरती है

मग़रबी ज़ौक़ है और वज़ह की पाबन्दी भी
ऊँट पे चढ़ के थियेटर को चले हैं हज़रत

हम ऐसी कुल किताबें क़ाबिले-ज़ब्ती समझते हैं
कि जिनको पढ़ के बच्चे बापको ख़ब्ती समझते हैं

पाकर ख़िताब नाच का भी ज़ौक़ हो गया
‘सर’ हो गये, तो ‘बाल’ का भी शौक़ हो गया

ख़ुदा की राह में अब रेल चल गई ‘अकबर’!
जो जान देना हो अंजन से कट मरो इक दिन.

क्या ग़नीमत नहीं ये आज़ादी
साँस लेते हैं बात करते हैं!

मेरी नसीहतों को सुन कर वो शोख़ बोला-
"नेटिव की क्या सनद है साहब कहे तो मानूँ"


बेपर्दा नज़र आईं जो चन्द बीवियाँ
‘अकबर’ ज़मीं में ग़ैरते क़ौमी से गड़ गया
पूछा जो उनसे -‘आपका पर्दा कहाँ गया?’
कहने लगीं कि अक़्ल पे मर्दों की पड़ गया.

फिरंगी से कहा, पेंशन भी ले कर बस यहाँ रहिये
कहा-जीने को आए हैं,यहाँ मरने नहीं आये

बर्क़ के लैम्प से आँखों को बचाए अल्लाह
रौशनी आती है, और नूर चला जाता है

क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ
रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ

9/5/10

कुमार गन्धर्व पर सर्वेश्वर

कुमार गन्धर्व एक अनूठे संगीतकार हैं. अपनी लोक सम्पृक्ति और आवेग भरी आवाज़ के साथ वे हमसे तादात्म्य कायम करते हैं. हिन्दी कवियों और रचनाकारों की एक पूरी पीढी उनसे गहरे प्रभावित रही है. पर सब ऐसा नहीं मानते. एक बार लगभग अनौपचारिक सी बातचीत में वरिष्ठ आलोचक शिव कुमार मिश्र ने सवाल खड़ा किया कि "कुमार साहब ने गाने के लिए कबीर के आध्यात्मिक पद ही चुने हैं. दूसरे किस्म के पद वहां नहीं हैं." और यह बात तथ्य के नहीं वरन आरोप की शक्ल में थी. हाँ, यह सच है, पर क्या गायन को हम सिर्फ उसके बोल के लिए सुनने जाते हैं? इसके लिए छपे हुए शब्द ही पढ़ लेना बेहतर होता. गायक गाने को कैसा निभाता है यह भी मानीखेज चीज है. गायन के रूप का कथ्य खोजने की बजाय इतने स्थूल रूप से उसके उपरी ढांचे को छू कर लौट आना मुझे विचित्र और आश्चर्यजनक, दोनों लगा. और जहाँ तक मोटा-मोटी ढांचे की भी बात है, कबीर को तो ऐसे पदों के लिए आध्यात्मिक नहीं कहा जाता. कुमार साहब पर यह इनायत क्यों? जवाब संभव हैं पर इसकी यहाँ जगह नहीं.

कुमार साहब की गायकी की ताकत को शब्दों में ढाल पाना बेहद मुश्किल काम है पर ये चुनौती निभाई सर्वेश्वर जी ने.इस अद्भुत कविता को हम सब तो पढ़ ही रहे हैं, शिवकुमार जी को जरूर ही इसे पढ़ना चाहिए!
आज वही कविता-

सुरों के सहारे

दूर-दूर तक
सोयी पड़ी थी पहाड़ियां
अचानक टीले करवट बदलने लगे
जैसे नींद में उठ चलने लगे.

एक अदृश्य विराट हाथ बादलों-सा बढ़ा
पत्थरों को निचोड़ने लगा
निर्झर फूट पड़े
फिर घूमकर सब कुछ रेगिस्तान में बदल गया.

शांत धरती से
अचानक आकाश चूमते
धूल भरे बवंडर उठे
फिर रंगीन किरणों में बदल
धरती पर बरसकर शांत हो गए.

तभी किसी
बांस के वन में आग लग गयी
पीली लपटें उठने लगीं,
फिर धीरे-धीरे हरी होकर
पत्तियों से लिपट गयीं.

पूरा वन असंख्य बांसुरियों में बज उठा,
पत्तियां नाच-नाचकर
पेड़ों से अलग हो
हरे तोते बन उड़ गयीं.

लेकिन भीतर कहीं बहुत गहरे
शाखों में फंसा
बेचैन छटपटाता रहा
एक बारासिंहा.

सारा जंगल कांपता हिलता रहा.

लो वह मुक्त हो
चौकड़ी भरता
शून्य में विलीन हो गया
जो धमनियों से
अनंत तक फैला हुआ है.


(कुमार गन्धर्व का गायन सुनते हुए)
-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना)

और इसी कविता के साथ सुनिए कबीर का 'अवधू! कुदरत की गति न्यारी',
जहां कबीर और कुमार साहब मिलकर अवधू लोगों का मज़ा ले रहे हैं!