1/7/11

मल्लिकार्जुन मंसूर क़ी जन्मशती पर

मल्लिकार्जुन भीमरायप्पा मंसूर का जन्म 1910 में धारवाड़, कर्नाटक में हुआ, उसी कर्नाटक में, जिसने हिन्दुस्तान के शास्त्रीय संगीत को बहुतेरी नेमतें बख्शीं. बचपने में वे थियेटर के कलाकारों के लिए गाया करते थे. उस्ताद अलाउद्दीन खान के बेटे उस्ताद माजी खान उनके गुरु थे. सादगी और सहजता उन्होंने इस घर से ही सीखी. अपने जीवन में बेहद सरल और आडम्बर रहित इस कलाकार के बारे में कहते हैं क़ि संगीत सभाओं में वह अपने अद्भुत गायन से श्रोताओं को सराबोर कर देता था. 1930 के आसपास आये उनके रिकार्डों ने संगीत पर काफी असर छोड़ा. जयपुर घराने के बीच अपनी शास्त्रीय संगीत क़ी तालीम हासिल करने पाले मंसूर कर्नाटक, हिन्दुस्तानी ख़याल और ध्रुपद, तीनों शैलियों के जानकार थे. उनकी संगीत अदायगी में एक अद्भुत तत्व है 'धैर्य'. अपनी देशी मसृण आवाज में उनकी आवाज़ भूले हुए संतों क़ी याद दिला देती है. भूले बिसरे और आमतौर पर न गए सुने जाने वाले रागों को गाते हुए. चमक दमक से दूर.
संगीत को पूरी तरह समर्पित इस हस्ती का अंत कैंसर से जूझते हुए 1992 में बंगलुरु के एक अस्पताल में हुआ. अपने अंतिम वक्त तक वे संगीत से बेतरह गुंथे रहे. ऐसे इंसान आजकल कम होते हैं या नहीं होते.
उन्होंने कन्नड़ में अपनी आत्मकथा भी लिखी- 'नन्ना रसयात्रा ', जिसका अनुवाद उनके बेटे और उनकी शैली को आगे ले जाने वाले गायक राजशेखर मंसूर ने 'माई जर्नी इन म्यूजिक' नाम से किया है.

यह उनका जन्म-शताब्दी वर्ष है.
आईये, सुनें, उनके गाए राग बिहारी और शुद्ध नट -


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