1/12/11

बिनायक सेन के लिए सात कवियों की कवितायेँ

बीर बिनायक
मृत्युंजय

बीर बिनायक बांके दोस्त !
थको नहीं हम संग तुम्हारे
झेल दुखों को जनता के संग
कान्धा भिड़ता रहे हमेशा
यही भरोसा यही भरोसा
बज्र कठिन कमकर का सीना
मज्जा मांस और रकत पसीना
मिलकर चलो जेल से बोलें
जिनकी काटी गयीं जुबानें
उनके मुंह के ताले खोलें

साथी देखो यही राज है
यही काज है
लोकतंत्र का पूर्ण नाश है
लोकसभा और राज सभा
की नूतन अभिनव बक्क वास है
देखो इनके लेखे पूरा
देश एक मैदाने घास है

देशभक्ति का दंगल देखो
रमन सिंह के छत्तीसगढ़ में
चिदंबरम के राज काज में
वेदांता के रामराज में
उगा हुआ है जंगल देखो
नियमगिरी क़ी नरम खाल से
नोच रहे हैं अभरक देखो

देखो बड़ा नमूना देखो
कैसे लगता चूना देखो
भ्रष्ट ज़ज्ज़ और भ्रष्ट कलेक्टर
सबकुछ अन्दर सबकुछ अन्दर
चूस रहे हैं बीच बाज़ार
नंगे नंगे बीच सड़क पर
खुल्लम खुल्ला खोल खालकर
नाच रहे हैं
देशभक्ति का प्रहसन देखो
टेंसन देखो
अनशन देखो

राडिया वाला टेप देख लो
बरखा जी और बीर सांघवी
नई नवेली खेप देख लो
देखो मिस्टर मनमोहन को
जे पी सी अभिनन्दन देखो
ही ही ही ही दांत चियारे
देखो मिस्टर देशभक्त जी
कौन जगह अब पैसा डारें
घूम रहे हैं मारे मारे
कलमाडी क़ी काली हांडी
देखो
अडवाणी क़ी मूंछ देखो
येदुरप्पा क़ी पूँछ देखो
रेड्डी क़ी करतूत देखो
लोकतंत्र के पूत देखो
भूत देखो

पैसा देखो
भैंसा देखो
ऐसा देखो
वैसा देखो
लाइन से सब देशभक्त हैं
इससे पूरा देश त्रस्त है
देखो

नक्सल देखो
डी जी पी के कुशल दांत में लगा हुआ है बक्कल देखो
सलवा जुडूम बनाने वाले
रक्त काण्ड रचवाने वाले
जल जंगल जमीन के भीतर
महानाश रचवाने वाले
देखो नए दलाल देखो
टमाटरी हैं गाल देखो
पी एम सी एम हाउस भीतर
कोर्ट के भीतर कोर्ट के बाहर
हंडिया भीतर
काली काली दाल देखो
देखो रोज़ कमाल देखो

जान बचाने वाले
लाज रखाने वाले
लड़ भिड जाने वाले
सत्य बोलने वाले
देखो
नए नए है देश दुरोहित
नयी नयी परिभाषा देखो
शासन क़ी अभिलाषा देखो
भाषा देखो
जेल देखो
सेल देखो
खनिज लादकर छत्तीसगढ़ से जाने वाली रेल देखो
जनता के अधिकार देखो
ह्त्या का व्यापार देखो

घी में सनी अंगुलियाँ देखो
हीरे क़ी झिन्गुलिया देखो
बड़े चोर का घाव देखो
विपक्षी का ताव देखो
लगे फिटकरी जियें गडकरी
चेहरा देखो संग मरमरी
कांग्रेस के मंतर देखो
बन्दर देखो
अभी अभी बिल से निकला है जनपथ पर छछुन्दर देखो
माल देखो
ताल देखो
डेमोक्रेसी क़ी टटकी टटकी उतरी है यह खाल देखो

ज़ज्ज़ के घर में नेता बैठा नेता घर अखबार
प्रजातंत्र का विकसित होता नव नव कारोबार

बीर बिनायक तुम जैसों से ही बाकी है देश
भिड़ बैठेंगे आयें जितने बदल-बदल कर भेष

वे हमें अकेला कर देना चाहते हैं
(कामरेड बिनायक सेन के लिए)
संतोष चतुर्वेदी

उन्हें हमारे एकजुट होने से डर लगता है
कहीं हम भीड़ बन कर बेलगाम न हो जाय
कहीं हम पत्थरों को ही न बना लें अपने हथियार
कहीं हम पत्थरों को ही न बना लें अपनी ढाल

खौफनाक अन्दाज वाली उनकी कहानी को
खत्म करते-कराते हुए
उनका अभेद्य दुर्ग ढहाते हुए

इसीलिए वे हमें
हमारे पत्थरों से भी महरूम कर देना चाहते हैं
बिल्कुल अकेला
बिल्कुल निहत्था
बिल्कुल निरूपाय

वे हमें अकेला कर देना चाहते हैं इतना
कि हमारे पैरों में कोई कांटा चुभे तो
हम आह भी न भर पायें
कि अगर कोई अपने हाथों में हमारा हाथ ले कर सहलाए
तो भी मन में प्यार की कोई अनुभूति न जगने पाए
कहीं कोई जख्म हो तो भी
हमारे चेहरे पर कोई शिकन न आने पाए

हमारी किसी भी खुशी, हमारे किसी भी गम पर
जुट न पाए हमारा कोई सगा संबंधी
नात रिश्तेदार भाई दयाद
हमारा दुख घेरे रहे हमें हमेशा
और हमें आसरा दिलाने वाला
कोई न हो दूर दराज तक
हम बीच फंसे रहें मझधार
और हमें बाहर निकालने वाला
कहीं कोई तिनका भी न दिखायी पड़े

जब जब हम उनके रंगीन झांसे में आए
तब तब बदरंग हो हम पछताए
अपना सब कुछ गवाए
उन्होंने रंगीन सपना दिखाया हमें षहर का
और जब अपना घर द्वार गाँव गिरान खेत बधार
छोड़ छाड़ कर हम गये षहर
तमाम चकाचैंध में बिल्कुल अकेले खुद को पाए
शहर जहां अपने अपने कोटरों में कैद लोगों का
कोई पड़ोसी तक नहीं
जहां हम तब्दील होते गये सिर्फ एक पते और एक नंबर में
मसलन क्वाटर और मिल का पता
घर का नंबर गली का नंबर
बस का नंबर कंपनी का हमारा लेबर नंबर
हमारा मोबाइल नंबर
और धीरे धीरे कम होता चला गया
इस जीवन में हमारा हम

हमारे पसीने से पुष्ट अनाजों को
हमारे बखार में जाने से रोक कर
उसे भेज दिया सस्ती कीमतों पर मंडियों में
अपने मनमाफिक दाम पर बेचने के लिए
हमारे रग रग में रची बसी कहानियों कविताओं को
करीने से हमारी स्मृति से किया विलग
हमारा कौड़ा अपने सारे खरपतवार समेत भस्म हो गया
इनकी दमन भट्ठियों में
और तो और
इन्होंने नहीं छोड़ा हमारी रामलीलाओं नौटंकियों
फाग बिरहा चैता सोहर तक को
इनकी महॅगाई से त्रस्त हो
हमें अकेला छोड़ चले गये न जाने कहाँ
हमारे सारे तीज त्यौहार

रोचक अन्दाज में बतलाते हैं वे
हमें अकेलेपन के फायदे
फिर जतन से सिखलाते हैं वे हमें
इससे जुड़े कानून कायदे
वे दार्शनिक अन्दाज में बतलाते हैं
अकेला ही आता है आदमी
और जाता है अकेला ही इस दुनिया से
सूरज अकेले ही अलख जगाता है सुबह की
धान की झूमती बालियां गाती हैं अकेले ही राग जीवन की
चाँद बिखेरता है आसमान में
अकेले ही अपनी चांदनी
और हमारी पृथिवी भी तो
काटती फिरती है चक्कर अकेले ही
फिर बराम जुटाने की क्या जरूरत

अब कौन उन्हें बतलाए
कौन उन्हें समझाए कि समवेत से ही बनता है
हमेषा अधूरा सा लगने वाला यह पूरम्पूर जीवन
सूरज सजा है अपने सौरमंडल से ही
धान पोढ हुआ है खाद पानी और मौसम को पहन ओढ कर ही
चाँद की चांदनी में कहीं न कहीं षामिल है
दूर आसमान में कहीं तड़कता भड़कता सूरज
और अपनी यह खूबसूरत धरती
आदमी आता है किसी की तमाम खुषियों
और अपने तमाम सपनों को पूरा करने की उम्मीद लिए
तमाम संभावनाओं के साथ
और जब जाता है
तो कर जाता है तमाम आँखों को नम
छोड़ जाता है अपने पीछे अछोर यादें

वे कुछ भी नहीं छोड़ना चाहते हमारे पास
जिससे हम बातें कर सकें
और गाहे बगाहे अपना दुखड़ा रो सकें
वे कुछ भी सुनना नहीं चाहते हमारी सलामती के बारे में
फिजूल लगता है उन्हें यह सब
बस हमारा दिमागी वहम
दरअसल वे तो हमसे हमारी परछाई तक छीनने पर आमादा हैं
वे कोई झुरमुट भी नहीं छोड़ना चाहते हमारे लिए
उन्हें डर है कि हम
इसमें छुप कर कर सकते हैं गुरिल्ला लड़ाई
मौका मिलने पर कर सकते हैं पलटवार
इसीलिए वे सब कुछ सपाट कर देना चाहते हैं
वे हमें अकेला कर देना चाहते हैं
इतना अकेला
कि वे जब जो जी में आए कर लें
और हम चूं तक न कर सकें
कि जब वे हमारी गरदन तक मरोड़ें
तब हम उफ तक न कर सकें
बल्कि उनके इस कारनामे पर ताली बजाए
हॅसे और शबासी दें
कि आंसू भी न हो साथ हमारे
जब कभी हम रोये
या जब कभी हम
अपनी किसी खुशी पर पुलकित होए

वे हमें इस कदर कोरा कर देना चाहते हैं कि
जब वे लिखना चाहें मौत
उन्हें तनिक भी असुविधा न हो
उन्हें कोई भी रोकने टोकने वाला न हो
और हम लाख चाहने के बावजूद
न लिख पाए
अपना मनपसन्द शब्द
जीवन.

हमीं तो देश हैं, बाकी जो हैं सब देशद्रोही हैं
(मानवाधिकार कार्यकर्ता और चिकित्सक डॉ. बिनायक सेन की रिहाई के लिए 27 दिसंबर 2010 को
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए धरने से लौटकर)
मुकुल सरल

हमारे राज में
फूलों में खुशबू!
कुफ़्र है ये तो!

हमारे राज में
शम्मां है रौशन!
कुफ़्र है ये तो!

हमारे राज में
कोयल भला ये
कैसे गाती है?
कोई ...जासूस लगती है
किसे ये भेद बताती है?

हमारे राज में
क्यों तारे चमके?
चांद क्यों निकला?
दिलों में रौशनी कैसी!
ये सूरज क्यों भला चमका?

हमारा राज है तो
बस अंधेरा ही रहे कायम
हरेक आंख में आंसू हो
लब पे चुप रहे हरदम

हमारे राज में
तारे बुझा दो
सूरज गुल कर दो
हवा के तेवर तीख़े हैं
हवा पे सांकले धर दो

हमारा लफ़्ज़े-आख़िर है
हमारी ही हुकूमत है
हमारे से जुदा हो सच कोई
ये तो बग़ावत है

हमारे राज में ये कौन साज़िश कर रहा देखो
हमारे राज में ये कौन जुंबिश कर रहा देखो

ये कौन लोग हैं जो आज भी मुस्कुराते हैं
ये कौन लोग हैं जो ज़िंदगी के गीत गाते हैं

ये कौन लोग हैं मरते नहीं जो मौत के भी बाद
ये कौन लोग हैं हक़ की सदा करते हैं ज़िंदाबाद

ज़रा तुम ढूंढ कर लाओ हमारे ऐ सिपाहियो
इन्हे जेलों में डालो और खूब यातनाएं दो
अगर फिर भी न माने तो इन्हे फांसी चढ़ा दो तुम
इन्हे ज़िंदा जला दो तुम, समंदर में बहा दो तुम

हमारा राज है आख़िर
किसी का सर उठा क्यों हो
ये इतनी फौज क्यों रखी है
ज़रा तो डर किसी को हो

हमारी लूट पर बोले कोई
ये किसकी जुर्रत है
हमें झूठा कहे कोई
सरासर ये हिमाक़त है

ये कौन जनता के वकील हैं
जनता के डाक्टर
ये कौन सच के कलमकार हैं
दीवाने मास्टर

हमारे से अलग सोचे जो वो सब राजद्रोही हैं
हमीं तो देश हैं, बाकी जो हैं सब देशद्रोही हैं


जिन पंखों के बारे में हमें क्लास में बताया गया था
गौरव सोलंकी

साँस आने के रास्ते में ही
इतनी बेहिसाब रोशनी है भाईसाहब
कि मुझे जीते हुए सब देखते हैं
सब देखते हैं मुझे नमक खाते हुए
आयोडीन की कमी से घेंघा न होते हुए

मेरे सामने खरीदी गई हैं सब पिस्तौलें
सब लड्डुओं को मेरे सामने तौला गया है
कोई बेईमानी नहीं कहीं
यह आपका प्रताप है
हमारे महाराणा प्रताप
सब सफेद है जिसमें, आसमान भी
और मैंने अपनी आवाज़ के पिछले अपमान को भूलते हुए
दिल की नोक पर
कोई प्यार का गीत गाने का फ़ैसला किया है
जिसके ख़िलाफ़ अपील होगी
जिसमें मैं मुस्कुराने, खाते रहने की फ़िराक़ में
जीते हुए आपको रोशनी में दिखाई दूँगा,
जीतते हुए नहीं।
ऐसे में आप रोएँ नहीं,
माना कि समय बहुत मेहरबान नहीं
पर दिल को न भर आने दें टंकी की तरह
इतना भी कूड़ा नहीं कानून
जेल में लोग खाते हैं अभी रोटी, बोलते हैं भाषा
अभी बहुत से लोग और होंगे तमाशे
बहुत सी कहानियाँ होंगी, जिनके बीच से उठकर भागेंगे हम
हम अपने बच्चों को देंगे सेब सा ग्लोब
यह उन्होंने तय किया है
इसलिए सेब और ग्लोब,
दोनों के दुश्मनों को पहले पहचानने का समय दो सरकार को
जबकि उसके पास बहुत से काम हैं,
उसे मूँगफली चबाने के पैसे नहीं मिलते तुम्हारी तरह,
उसे जंगल छानने हैं आटे की तरह
माँजने हैं तुम्हारे दिमाग जबकि तुम मूर्खों की तरह दूर भागते हो
उसे बताना है जजों को कि
किसकी आँखों में तेज़ाब डालना है
किस ओर से मँगाना है सूरज
किस ओर बुझाना है

और किसी दरवाज़े पर हम अपने सामान की चौकीदारी की नौकरी करते हुए
सो जाएँगे, पकड़े जाएँगे
बर्ख़ास्तगी तो मोम सी कोमल है मेरी जान
हम तो इसलिए माफ़ी माँगते हैं कि
अपने असली हाथों को हिलाते हुए
अपने पैरों पर लौट सकें
अपने घर, जिसके पते में हम केयर ऑफ उनके होंगे

अँधेरों के रंग
मुझसे पूछकर नहीं बदले गए साहब
हाँ, परदे ज़रूर मैंने खरीदवाए थे
मैं किताबों के खोने के बारे में
जानना तो चाहता था, लेकिन कुछ जानता नहीं माँ कसम,
इससे पिछली बार जब मैंने यह जानना चाहा था कि
बाघ क्यों बचाए जा रहे हैं,
तब मुझे एक खराब सपने में फेंक दिया गया था
जिसमें बच्चे चुन-चुनकर मारे जा रहे थे

मैं जो आख़िरी चीज जानता था
वह किसी झंडे पर नहीं लिखी थी
लेकिन अपने बदतमीज़ लहजे के लिए मुझे माफ़ कीजिए
कि हर बार उसे आज़ादी की तरह बताता हूँ
पछताता हूँ

जिन पंखों के बारे में हमें क्लास में बताया गया था सर,
वे हमारे बदन पर नहीं थे कभी भी
जबकि हम भी पैदा हुए थे

कचरे से नहीं उग आता कोई पूरा आदमी।


बिनायक सेन की शान में एक गीत
अशोक कुमार पाण्डेय

सुना है हाकिम सारे दीवाने अब ज़िंदां के हवाले होगे
सारे जिनकी आँख ख़ुली है
सारे जिनके लब ख़ुलते हैं
सारे जिनको सच से प्यार
सारे जिनको मुल्क़ से प्यार
और वे सारे जिनके हाथों में सपनों के हथियार
सब ज़िंदां के हवाले होंगे!

ज़ुर्म को अब जो ज़ुर्म कहेंगे
देख के सब जो चुप न रहेगें
जो इस अंधी दौड़ से बाहर
बिन पैसों के काम करेंगे
और दिखायेंगे जो पूंजी के चेहरे के पीछे का चेहरा
सब ज़िंदां के हवाले होंगे

जिनके सीनों में आग बची है
जिन होठों में फरियाद बची है
इन काले घने अंधेरों में भी
इक उजियारे की आस बची है
और सभी जिनके ख़्वाबों में इंक़लाब की बात बची है
सब ज़िंदां के हवाले होंगे

आओ हाकिम आगे आओ
पुलिस, फौज, हथियार लिये
पूंजी की ताक़त ख़ूंखार
और धर्म की धार लिये
हम दीवाने तैयार यहां है हर ज़ुर्म तुम्हारा सहने को
इस ज़िंदां में कितनी जगह है!

कितने जिंदां हम दीवानों के
ख़ौफ़ से डरकर बिखर गये
कितने मुसोलिनी, कितने हिटलर
देखो तो सारे किधर गये
और तुम्हें भी जाना वहीं हैं वक़्त भले ही लग जाये
फिर तुम ही ज़िंदां में होगे


जाने कितने विनायक सेन और चाहिए
प्रतिभा कटियार

हमें फख्र है
तुम्हारे चुनाव पर साथी
कि तुमने चुनी
ऊबड़-खाबड़
पथरीली राह.

हमें खुशी है कि
तुमने नहीं मानी हार
और किया वही,
जो जरूरी था
किया जाना.

तुम्हें सजा देने के बहाने
एक बार फिर
बेनकाब हुई
न्यायव्यवस्था.
जागी एक उम्मीद कि
शायद इस बार
जाग ही जाएं
सोती हुई आत्माएं.

तुम्हें दु:ख नहीं है सजा का
जानते हैं हम,
तुमने तो जानबूझकर
चुना था यही जीवन.
दु:ख हमें भी नहीं है
क्योंकि जानते हैं हम भी
सच बोलने का
क्या होता रहा है अंजाम
सुकरात और ईसा के जमाने से.

हमें तो आती है शर्म
कि लोकतंत्र में
जहां जनता ही है असल ताकत
जनता ही कितनी बेपरवाह है
इस सबसे.

न जाने कितने बलिदान
मांगती है जनता
एकजुट होने के लिए,
एक स्वर में
निरंकुश सत्ता के खिलाफ
बिगुल बजाने के लिए,
खोलने के लिए मोर्चा
न जाने कितने विनायक सेन
अभी और चाहिए.


बिनायक सेन के लिए
मुन्ना के पांडेय

बिनायक ! क्यों सोचते हो अधिक?
किसने कहा था कि स्वर्ण मृग के पीछे भागो,
तुम्हे पता था कि वह 'वह' नहीं,फिर भी!
यहाँ जबकि 'गुलगुली गिल्मों और
गलीचों के बीच सुरा,सुराही और जनता
के साथ खेला जाता है,यहाँ |
तुम्हारा हश्र तो यही होना था,

भुगतना था यही,जाओ और खड़े होवो आ-दि-वा-सि-यों के साथ
अरे डाक्टर साब !कैसे भूल गए आप?
कैसे गलती कर बैठे कि यह वह वनचरों का ज़माना ,युग नहीं
यह इक्कीसवीं सदी है और नैतिकता का पाठ यहाँ,
पान की गिलौरी है .

8 comments:

राजेश उत्‍साही said...

हर कविता कहती है कि बिनायक सेन हम तुम्‍हारे साथ हैं।

मनोज पटेल said...

बहुत बढ़िया और जरूरी पोस्ट. आपको धन्यवाद इस प्रयास के लिए.

ASHOK said...

Tum akele nahi ho BINAYAK SEN!..

अशोक कुमार पाण्डेय said...

एक बेहद ज़रूरी पोस्ट…हम सब उनके साथ हैं!

santosh chandan said...

un tamam shabdon ko salaam ko jo binayak sen ke liye hamari awaz hain.

आशुतोष पार्थेश्वर said...

एक सार्थक पोस्ट ! विनायक अकेले नहीं हैं !

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA said...

बिनायक सेन के नाम के संग चले आते हैं वो सारे कर्म जो मानवता के हित में हैं, पर मज़े से गद्दी कि नरमाहट नापती सत्ता के हित में नहीं . . ग़जब लोकतंत्र है . . सब कविताएँ जम के कुरेदती हैं अन्दर दबी पड़ी भावनाओं को, बहुत बहुत आभार आपका!

रामाज्ञा शशिधर said...

मूलगामी हस्तक्षेप.