1/17/11

खुसरो क़ी गली में

अमीर खुसरो एक अद्भुत कवि थे. शास्त्र को लोक में बदलते हुए अपनी कविताओं में उन्होंने इतना संगीत भर दिया कि लगातार गायकों के लिए वे चुनौती बने रहे और हैं. कहते हैं कि खुसरो का कुछ भी प्रमाणिक नहीं मिलता है पर जिन्हें हम किम्वदंतियां कहते हैं, क्या वे भी इस लायक नहीं कि उन्हें किसी भी बड़ी कविता के सामने रखा जा सके?
आखिर किसी कवि का यह तो अधिकतम सौभाग्य है न कि उसकी कवितायें लोक में इस कदर घुल मिल जाएँ कि उसको लोकगीत से अलगा पाना नामुमकिन सा हो जाए.
एक सवाल यह भी कि क्या प्रक्षिप्त को हमेशा दोयम दर्जे का माना जाना चाहिए?
वे कवि कितने सौभाग्यशाली थे जिनकी कविता के संग प्रक्षिप्त जुड़ते थे.

सुनिए 1985 के अमीर खुसरो नाम के अल्बम से
एक बंदिश, कुछ दोहे और मुकरियाँ
बंदिश की गायक हैं सुधा मल्होत्रा और उनके साथ
कृष्ण कल्ले, पुष्पा व धीरज कुमार
दोहे उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान से
और मुकरियाँ कृष्ण कल्ले व वानी जयराम से



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