1/18/11

बिनायक सेन के लिए एक गीत व एक और कविता


(यू-ट्यूब से साभार )

हमें जो तय करना है
सुधीर सुमन

इतने स्वप्न-दुःस्वप्न
इतने अगर-मगर
आजादी और विकास की
किस्म-किस्म की परिभाषाएं
गोल-गोल चक्करदार भाषाएं
आदमी होने के हक में खड़े
किसी झंडे से बड़ा
विराट मध्यवर्ग का अपना अहं
विशाल-सर्प सा फन काढ़े
विकास की रेस में सरपट भागता
अपनी रीढे़ गंवाकर।

ऐसे में जो भी आती आवाज सीधी
अपनी संवेदना के लिए
कोई भी कीमत चुकाने को तैयार
गलत को गलत कहने की ताकत
कहीं किसी अलंकार-उपमा की नहीं जरूरत
तो मानो कोई गहरा अर्थ मिलता है
जिंदगी का आदिम रोमांच लौटता है।

संशय है दोस्त
गहरा संशय
यहां सब कुछ बिक रहा है
हर चीज की कीमत लग रही है
सब कुछ खुला है
गोकि रंगीन फैशनेबल पर्दों की है भरमार
बुराइयां भी शान से बिकती हैं आज
आत्मसुरक्षा के नाम पर।

फिर तुम इतने संवेदनशील क्यों हो
क्यों तुम्हारी सहानुभूति इतनी गहरी
क्यों गहरा इस कदर तुम्हारा प्यार
क्यों उनके कायदे नहीं मानते
क्यों उनकी तहजीब नहीं मानते
क्यों डूबते सितारों से उम्मीद लगाए हो
क्यों उजड़ते लोगों को देखते हो
क्यों विकास और उद्धार के
इस सर्वव्यापी नाटक में
कोई चमकदार चेहरा बन
चुप्पी साध नहीं लेते?

एक भीषण क्रूर-मनमोहक खेल है
हम भी हैं जिसमें मौजूद।
किसके नाम पर हो रहा
हरियाली का शिकार
किसका जंगल छिनकर
किसे धकेला जा रहा सामानों के जंगल में
किसके बल पर बन रही बहुमंजिला इमारतें
एक दूसरे से होड़ लेती,
क्या हमारी लालसाओं की ईंटें
नहीं लगी उसमें?

ये रिलाइंस, ये वेदांता
ये आधुनिक इंद्र
सभ्यता के ठेकेदार
आज भी जिंदगियों से खेल रहे
ये जितना बोलते हैं
उससे ज्यादा चुप रहते हैं
और अपनी चुप्पियों में लगातार
साजिशें रचते रहते हैं।
हमारे लिए ही सुविधाएं जुटाने के नाम पर
हमारे स्वामी बनते जाते हैं
हमारे विवेक पर जड़के मजबूत ताला
हमारे दिलों पर काबिज हो
हमारी जबानें हमसे छिन लेते हैं।

हममें कितने हैं
जिन्होंने खुद अपनी जबानों पे
चाबुक नहीं चलाए
अंधेरे को आलोक कहते
पल भर भी सकुचाए?
लोहे के खतरनाक जूतों के
चांदी से चमकते एजेंट
हर ओर फिर रहे
वे हमें अकेला ही नहीं करते
हमसे ही हमको चुराके
किसी और समूह में
कर देते हैं शामिल
सलवा जुडूम बनाते हैं।

कत्ल के कई तरीके हैं उनके पास
मत कहिए कि फूल, रोशनी, कर्णप्रिय आवाजें
उन्हें पसंद नहीं,
उनकी कई किस्में लाए हैं वे
जिनसे सजे हैं बाजार,
हमारे घर-बार,
वे फूल से फूल को रौंदते हैं
रोशनी से रोशनी का कत्ल करते हैं
मधुरता से मधुरता को मिटाते हैं
उन्हें पता है कि
क्या है सुंदर और सुखद,
वे उसके पैकेज हमें भेंट करते हैं
और उसकी बड़ी कीमत वसूलते हैं
हमारे मन की सख्ती को गलाते हैं

वे चुनी हुई स्मृतियां फेंकते हैं
हमारे दामन में
बड़े गुणग्राही बनते वे
पर्व-त्योहार, रिवाज की रक्षा के लिए
हरदम हरवक्त वे रहते तैयार,
बस इतना चाहते हैं
लय-ताल उन्हीं का हो।
उनका उल्लास, उनकी मुस्कुराहटें
उनकी मस्ती, उनका आनंद
जादू की तरह पहुंचता है हम तक।

वे चाहते हैं
कानून का राज चले
उनके कानून का
जो जनता के लिए नहीं हो
बल्कि उसके लिए जनता हो
वे हिदायत देते कि
उनके कानून की नजाकत का हम रखें ख्याल
शिकायत करें, पर जरा कायदे से
कोई बयान तक न दें ऐसा
जिससे उसकी सेहत पर पर आए आंच।

इंकलाब की हर संभावना, हर कोशिश को
महज एक सनसनी में तब्दील कर
सूचना की विश्वव्यापी पालतू मशीन की खुराक बना
तत्पर हैं वे करने को हजम
चाहतें हैं विरोध की हर आवाज
हो जाए दफन।

मेरे प्यारे डाक्टर,
दवा के नाम पर देते हैं वे
कई तरह के नशे
कि जब दर्द हो
आदमी रोए नहीं
कहकहे लगाए।

खुशी उनका एक प्रचार है
उनके हित में कारोबार है
आनंद की गठरी लिए
उनके दरबारी हर कतार में हैं
भूखे से जबरन कहते कि
कहो, पेट भरा है।
मौत का जाल रचते और
कहते- यह लो जिंदगी
मौज करो।
कोई फरियाद नहीं सुनते,
कहिए कि हम तो ऐसे ही ठीक हैं, जी
जाइए हमें हमारे हाल पे छोड़िए
जाइए यहां से जाइए,
तो कहते हैं-
इतनी बेमिसाल जिंदगी दे रहे
यह भी नहीं संभलती
मूर्ख, असभ्य, पिछड़े।

वे बताते हैं
हम सबकी औकात
जैसे हम यूं ही बेजरूरत आवारा
आसमान से टपक आए हों
और सारी धरती, सारा इल्म, सारी संस्कृति
उनके बाप-दादाओं की जागीर हो।
उनके सिपहसलार घुमते हैं
हाथों में संस्कृति का धारदार हथियार लिए
चाहते हैं सब हो जाएं न्यौछावर
उनके चारण बन गाएं बस उनके गीत

संस्कृति और संस्कृति में
हरियाली और हरियाली में
फूल और फूल में
खुशी और खुशी में
संवेदना और संवेदना में
देश और देश में
फर्क है,
यह फर्क और गहरा होना चाहिए,।

हमने फिर यह जाना है
प्यारे विनायक सेन
कि सच और न्याय पर अड़ा
हर आदमी इनके लिए खतरनाक है
और यह कितनी अच्छी बात है कि
तुम अकेले नहीं हो।
हमें तो यही तय करना है बार-बार
सत्य, संवेदना और इंसाफ की खातिर
हम क्या और कितना खोने को तैयार
कितना मजबूत हमारा इनकार।

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