1/27/11

सीताकांत महापात्र - शब्द के आकाश में

सीताकांत महापात्र उड़िया के नामचीन कवि हैं. उनकी कविताओं में समय और मृत्यु के अनगिन अद्भुत बिम्ब हैं. उड़ीसा की प्रकृति का गहरा राग और मिथकों को परिभाषित करने की आदिम ललक उनकी कविता के केंद्र में है. पेश है उनकी कविता 'मुर्गा लड़ाई'. युद्ध की त्रासद विडम्बना को खोलती यह कविता अंत में एक गहरी व्यथा से हमारा साबका करवाती है. ऐसे दृश्य हमने सभ्यता के फलक पर देखे हैं- जब हंसी के लिए युद्ध आयोजित किये गए, युद्ध में मारे गए अनजान- नासमझ योद्धा किसी के काम आये और अंततः कुछ भी नहीं बदला. बच गयी सिर्फ एक उदासी.

मुर्गा लड़ाई

आमने सामने दो वीर
अस्त्र-शस्त्र सज्जित सर से पैर तक
अनजाने क्रोध से फूल उठती है पतली गर्दन
रण-दुन्दुभी का उदघोष : सम्मुख है समर.

अब कीचड़ में
कीड़े-मकोड़े नहीं ढूँढना है ;
भूखी बिल्ली और उससे भी भूखे
मनुष्य की लालच से
खुद को बचाकर
इधर-उधर छुपने की भी जरूरत नहीं
पूरी शताब्दी की नामर्दी को पीछे छोड़
सारा गाँव, युद्ध की हुंकार,
रिरियाहट, चीत्कार से काँप उठता है.
कुरुक्षेत्र छिड़ जाता है मेदिनी दहलाकर.

दोनों वीर कुछ नहीं समझते
क्यों है इस रण की सजावट, कौन है शत्रु
क्यों है यह घमासान युद्ध
किस कारण इस शांत धरती पर
छलकता है यह समुद्र गर्जन !

अस्त्र स्नायु को खींचता है, गर्दन फूल उठती है
खून में लगती है आग
लगता है पंख सारे उड़ जायेंगे
मांस की पकड़ से
क्रोध-द्वेष समा जाता है रग-रग में
पल भर में महायुद्ध
मारना मरना ही है अंत
सांझ उतर आती है धीरे-धीरे
खून से धुले पश्चिमी आकाश में.

वह भी पल-भर के लिए
उसके बाद सब कुछ समाप्त
गोधूलि का रंग मिट जाता है
आसमान में मंडराता है अन्धेरा
खून टपकता है,
रंग टपकता है
दिन बीत जाता है.

हाथ में लिए मांस का खामोश लोथड़ा
सारा गाँव चुपचाप लौट आता है
अभिशप्त शिशु सा
चारो और खामोशी,
गहरी साँसें .

2 comments:

सुनील गज्जाणी said...

नमस्कार !
आदरनीय सीता राम जी को पढना अच्छा लगा . आप कि कलाम से आप कि लेखनी के नए लिखारो को एक नयी दिशा ही प्राप्त होती है , जिस पे हम पानी प्रतिक्रियाओं में ये ही कह सकते है कि हमे कुच फिर कुच नया सीखा है !
साधु वाद !
आभार !

अनूप शुक्ल said...

बहुत अच्छा लगा इस कविता को पढ़ना!