1/28/11

मेरे सपनों का भारत : एक कम्युनिस्ट की निगाह से

मेरे सपनों का भारत

समाज क़ी जटिलताओं क़ी अभिव्यक्ति क़ी माध्यम राजनीति के अलावा मेरी दिलचस्पी का इलाका खगोलशास्त्र (कास्मोलोजी) है. जहां ब्रह्माण्ड अनंत दिक्काल में प्रकट होता है ; जहां आकाशगंगाएं ब्रह्माण्ड क़ी सतत विलुप्त होती सरहदों में एक दूसरे से तेजी से दूर चली जाती हैं ; जहां तारे अस्तित्व में आते हैं, चमकते हैं और विस्फोट के साथ मृत्यु का वरण करते हैं और जहां एकदम सटीक रूप से गति, पदार्थ के अस्तित्व क़ी प्रणाली है.

गति, अर्थात परिवर्तन और रूपांतर. हमेशा नीचे से ऊपर क़ी ओर. यही इंसानी अस्तित्व की भी प्रणाली है. कोई विचार अंतिम नहीं होता, कोई समाज पूर्ण नहीं होता. जब-जब किसी समाज को किसी अंतिम विचार का मूर्तरूप माना गया, तब तब गहराईयों से उठे भूकंप के झटकों ने उस समाज क़ी बुनियाद को झकझोर कर रख दिया. और तब, चहुँओर पसरी निराशा के घुप्प अँधेरे के बीच नए सपने खिलखिला उठे. कुछ सपने कभी सच नहीं होते, क्योंकि वे इंसानी दिमाग मात्र (in itself) क़ी बेलगाम मौज होते हैं. जो थोड़े से सपने साकार होते हैं वे मूलतः इंसानी दिमाग की 'अपने लिए' (for itself) गढ़ी गयी निरपेक्ष कृतियाँ होते हैं.

मेरे सपनों का भारत निश्चय ही एक अखंड भारत है जहां एक पाकिस्तानी मुसलमान को अपनी जड़ें तलाशने के लिए किसी वीजा क़ी जरूरत न होगी. ऐसे ही किसी भारतीय के लिए महान सिन्धु घाटी सभ्यता विदेश नहीं रहेगी. जहां बंगाली हिन्दू शरणार्थी आखिरकार ढाका क़ी कड़वी याददाश्त के आंसू पोंछ लेंगे और बांग्लादेशी मुसलामानों को विदेशी कहकर चूहों क़ी तरह खदेड़ा नहीं जाएगा.

क्या मेरी आवाज भा ज पा से मिलती जुलती लग रही है? पर भा ज पा तो भारत के मुस्लिम पाकिस्तान और हिन्दू भारत, हालांकि यह उतना 'विशुद्ध' नहीं, के महा-बंटवारे पर फली-फूली. चूंकि भा ज पा इस बंटवारे को विनाशकारी नतीजों के साथ चरम तक ले जा रही है, ठीक इसीलिये इन तीनों देशों में यकीनन ऐसे महान विचारक पैदा होंगें जो इन तीनों देशों के बन्धुत्वपूर्ण एकीकरण के लिए जनमत तैयार करेंगे. खैर रखिये, वो दिन भाजपा जैसी ताकतों के लिए क़यामत का दिन होगा.

मेरे सपनों के भारत में गंगा औए कावेरी तथा ब्रह्मपुत्र तथा सिन्धु एक दूसरे से मुक्त मन मिलेंगी और सुबह क़ी रोशनी में महान भारतीय संगीत क़ी जुगलबंदी के साथ छा जायेंगी. और तब, कोई नायक अपने विवरणों को 'भारत क़ी पुनर्खोज' में संकलित करेगा.

मेरे सपनों का भारत राष्ट्रों के समुदाय में एक ऐसे देश के रूप में उभरेगा जिससे कमजोर से कमजोर पड़ोसी को भी डर नहीं लगेगा और जिसे दुनिया का ताकतवर से ताकतवर मुल्क भी धमका नहीं सकेगा और न ही ब्लैकमेल कर सकेगा. चाहे आर्थिक ताकत के मामले हों य ओलम्पिक पदक के, मेरा देश दुनिया के अव्वल पांच देशों में होगा.

मेरे सपनों का भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य होगा, जिसकी आधारशिला 'सर्वधर्म समभाव' क़ी जगह 'सर्वधर्म विवर्जिते' के वसूल पर टिकी होगी. किसी क़ी व्यक्तिगत धार्मिक आस्थाओं में हस्तक्षेप किये बगैर राज्य वैज्ञानिक और तार्किक विश्व दृष्टिकोण को बढ़ावा देगा.

यह कहना बिलकुल माकूल है क़ि धर्म, अपने परिवेश के सामने इंसान क़ी लाचारी क़ी अभिव्यक्ति है. लिहाजा इसका उन्मूलन भौतिक और आध्यात्मिक जीवन दशाओं में आमूल तब्दीली क़ी मांग करता है, जहां इंसान परिवेश को अपने वश में करने के लिए खडा हो सके. भारत में जब कभी अनुदार दार्शनिक विचार प्रणालियाँ अवाम पर पहाड़ क़ी तरह लद गयीं, तब-तब यहाँ सुधार आंदोलनों का जन्म हुआ है. ऐसे ही, मैं वैज्ञानिक विचारों के पुनरुत्थान का सपना देखता हूं, जहां भगवान के रूप में पराई बन गयी आदमीयत को इंसान फिर से हासिल कर सकेगा. इंसानी दिमाग के इस महान रूपांतरण के साथ-साथ एक सामाजिक क्रान्ति होगी, जहां संपत्ति के उत्पादक, अपने उत्पादों के मालिक भी होंगें.

मेरे सपनों के भारत में अछूतों को हरिजन कहकर गौरवान्वित करने का अंत हो जाएगा और दलित नाम क़ी श्रेणी नहीं रहेगी. जातियां विघटित होकर वर्गों का रूप ले लेंगीं और उनके हर सदस्य क़ी अपनी व्यक्तिगत पहचान होगी.

मेरे सपनों के देश भारत के हर शहर में एक कोंफी हाउस होगा जहां ठंढी कोंफी क़ी घूंटों के साथ बुद्धिजीवी गर्मागर्म बहस करेंगे. वहां कुछ विरही जन धुएं के छल्लों में अपनी प्यारियों के अक्स तलाशेंगे तो कई अतृप्त ह्रदय कला और साहित्य क़ी विविध रचनाओं से मंत्रमुग्ध हो उठेंगे. तब कला और साहित्य क़ी किसी रचना पर राज्य क़ी ओर से कोई सेंसर न होगा. तमाम सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान सख्ती से मना होगा- बेशक- कोंफी हाउसों को छोड़कर.

शुरुआती बात पर लौटते हुए कहूँ तो मेरा सपना है क़ि भारतीय अंतरिक्ष यान गहरे आकाश को भेदता हुआ उड़ेगा और भारतीय वैज्ञानिक-गणितज्ञ प्रकृति क़ी मौलिक शक्तिओं को एक अखंड में समेटने के समीकरण हल करेंगें.

अंततः, मेरे सपनों क़ी मां मातृभूमि है, जिसके हर नागरिक क़ी राजनीतिक मुक्ति सबसे ज्यादा कीमती होगी. वहां असहमति क़ी वैधता होगी और थ्येन आमेन चौक जैसी घटनाओं को नैतिक रूप से शक्तिशाली नेता और जनमिलीशिया क़ी निहत्थी शक्तियां निपटाएंगी.

मेरे सपनों का भारत भारतीय समाज में कार्यरत बुनियादी प्रक्रियाओं पर आधारित है जिसे साकार करने के लिए मेरे जैसे बहुतेरे लोगों ने अपने खून क़ी आखिरी बूँद तक बहाने क़ी शपथ ले रखी है.





कॉमरेड विनोद मिश्र, (1947 -1998), प्रखर मार्क्सवादी चिन्तक और पूर्व महासचिव, भारत क़ी कम्युनिस्ट पार्टी (माले)

6 comments:

krishnakant said...

काश ऐसा हो सकता!

उत्‍तमराव क्षीरसागर said...

मूल्‍यवान सोच...साकार की प्रतीक्षा है...

Sumit said...

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Raghu said...

मैं किसी 'इज्म' में विश्वास नहीं रखता हूँ, और यह मानता हूँ की ह्यूमनिज्म ही मायने रखती है. इस लिए, काफी हिचकिचाहट के साथ आपके इस पन्ने पर आया. यकीन मानिये, आपने हमारा दिल जीत लिया. ऐसी ही तो स्वराज्य की ज़रुरत है. और, उस से आगे, ऐसा ही एक सपना इस संसार के लिए भी है. क्या खूबसूरत चिंतन है. खासकर आपके ये वाक्य बहुत ही भाये -- "मेरे सपनों का भारत राष्ट्रों के समुदाय में एक ऐसे देश के रूप में उभरेगा जिससे कमजोर से कमजोर पड़ोसी को भी डर नहीं लगेगा और जिसे दुनिया का ताकतवर से ताकतवर मुल्क भी धमका नहीं सकेगा और न ही ब्लैकमेल कर सकेगा." हमारे समुदाय में भी ऐसा ही एक परिवर्तन की ज़रुरत है -- कमज़ोर से कमज़ोर नागरिक भी समाज की मदद से ताक़तवर महसूस करेगा, और ताक़तवर नागरिक अपनी ताक़त को कमजोरों की हित में इस्तेमाल करेगा...

Suman said...

nice
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