2/5/11

हिन्दी-उर्दू का दोआब (शमशेर की आलोचना दृष्टि पर गोपाल प्रधान)


हमारी ही हिन्दी, हमारी ही उर्दू...

वैसे तो शमशेर का समूचा गद्य आलोचकों का ध्यान आकर्षित करता रहा है लेकिन उसका अधिकांश आलोचनात्मक लेखन ही है। शमशेर जी प्रेमचंद के बाद हिंदी के ऐसे दूसरे बड़े लेखक हैं जिनका गहरा दखल हिंदी के साथ ही उर्दू साहित्य में भी था । उनका अपना विशिष्ट क्षेत्र कविता है इसलिये आलोचना भी ज्यादातर काव्यालोचन है । शमशेर की आलोचना में पहली जो चीज ध्यान खींचती है वह यह कि वे हिंदी और उर्दू के साहित्य को अलग अलग करके देखने की प्रवृत्ति के आम हो जाने से खासे परेशान हैं । इस प्रवृत्ति का वे तरह तरह से विरोध करते हैं । इस द्विभाजन पर उनका क्रोध और बेबसी व्यंग्य का रूप लेकर डायरी की एक टीप में प्रकट हुई है।

वे कहते हैं कि मान लीजिये कि मैं शासक जाति का हूँ और मेरे अधीन तीन चार जातियों, भाषाओं और संस्कृतियों का एक देश है तो मैं यह करूँगा कि... चारों जातियों और भाषाओं को भरसक अलग अलग रखने, एक दूसरे से उदासीन अपने को अलग अलग सबसे श्रेष्ठ समझने और दूसरे को अपने से नीचा, अपनी रूढ़ियों और धार्मिक मान्यताओं में आकंठ डूबे रहने के लिये खूब प्रोत्साहित किया जायेगा ।(कुछ गद्य रचनायें, पृष्ठ 299) यही माहौल हिंदी और उर्दू को लेकर औपनिवेशिक शासकों ने बनाया था। इस बात को शमशेर जी ने दर्द के साथ सुभद्रा कुमारी चौहान पर लिखे लेख 'राष्ट्रीय वसंत की प्रथम कोकिला' में बयान किया है। वे लिखते हैं, "खिलाफ़त वाले सत्याग्रह आंदोलन में हमारे इतिहास और संस्कृति की सभी धारायें मिलकर एक प्रचंड शक्ति का वेग बन गयी थीं । मगर वाह, उस अपराजेयता की बँधी हुई मुट्टी को साम्राज्यवाद की बेमिसाल कूटनीति ने किस तरह मसल मसल कर धीरे धीरे ढीला किया है- तब से आज तक का इतिहास यही है- उसको आज नेताओं की जख्मी उँगलियों की दुखती नसें और जोड़ बंद ही जानते हैं- कलाई से पंजा जैसे अलग हो गया है, और उँगलियाँ आपस में नहीं मिलतीं।"(कुछ गद्य रचनायें, पृष्ठ 43) ध्यान देने की बात यह है कि ऐसा वे गुलाम भारत में नहीं बल्कि आजाद भारत में लिख रहे थे । स्पष्ट है कि स्वतंत्र भारत में भी फूट डालने की नीति जारी है। शमशेर पूरी ताकत से इसके विरुद्ध लड़ते हैं।

उनका कहना है कि किसी भी अच्छे कवि को जिन परंपराओं से प्रेरणा लेनी चाहिये उनमें हिंदी के साथ साथ उर्दू की परंपरा भी शामिल है क्योंकि "हिंदी खड़ी बोली भाषा का एक रूप है । खड़ी बोली भाषा का दूसरा रूप उर्दू है।"( कुछ और गद्य रचनायें, पृष्ठ 253) इसीलिये उनके लेखन में आद्यंत हिंदी के साथ ही साथ उर्दू की साहित्यिक परंपरा का भी आधिकारिक विश्लेषण मिलता है । अनेक लोगों को इसके कारण शमशेर उर्दू की ओर थोड़ा अधिक झुके दिखाई पड़ते हैं । रामविलास शर्मा ने भी यह आरोप उन पर लगाया। 'दोआब' की भूमिका लिखते हुए उन्होंने दर्ज किया, "शमशेर का रागात्मक संबंध उर्दू काव्य से अधिक है, हिंदी काव्य से कम।"( कुछ गद्य रचनायें, पृष्ठ 17) आज इसकी जाँच पड़ताल करने पर रामविलास जी की आपत्तियों में कुछ ज्यादती महसूस होती है।

यह सही है कि शमशेर की आलोचना में कलात्मक सौष्ठव और जनप्रतिबद्धता के बीच गहरी कशमकश है लेकिन इसे उर्दू के प्रति उनके अनुराग में अवस्थित करना समस्या से मुँह मोड़ना होगा। यह द्वंद्व शुरू से ही हिंदी आलोचना में रहा है और प्रत्येक ईमानदार आलोचक ने इसको महसूस और हल किया है। प्रारंभ में यह तनाव संदेश और शैली के बीच सामंजस्य की समस्या के रूप में पेश किया जाता था। प्रगतिशील आलोचना ने संदेश की जगह प्रतिबद्धता का सवाल उठाया और इस मामले में शमशेर प्रगतिशील आलोचना के साथ हैं।

उनकी पसंदीदा कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान हैं। ऊपर उद्धृत लेख के अलावा एक और लेख उन्होंने 'सुभद्रा कुमारी चौहान : एक अध्ययन' शीर्षक से लिखा जो 'कुछ और गद्य रचनायें' में संकलित है। इस लेख में शमशेर का प्रतिबद्ध आलोचक पूरी धार के साथ मौजूद है। सुभद्रा जी की समझ की सीमा बताते हुए शमशेर लिखते हैं, "वह शायद इस बात की कायल नहीं थीं कि हमारी पूँजीवादी दुनिया आज सीधी दो तबकों में बँट गयी है। शायद उनको यह विश्वास पूरी तरह नहीं हुआ था कि आज अमीर-गरीब और ऊँच-नीच का भेद और समाज की सारी विषमताएँ अकेले जनसेवा और सुधार के संघर्षों से ही नहीं मिटाई जा सकतीं।"(कुछ और गद्य रचनायें, पृष्ठ 89-90) शमशेर सुभद्रा जी की आदर्शवादी राजनीतिक समझ को काव्यकला के प्रति उनकी उदासीनता से जोड़ते हैं। अपनी प्रिय कवयित्री के इस दृष्टिकोण से असहमति दर्ज कराते हुए शमशेर लिखते हैं, "दरअसल इस दृष्टिकोण में कला-पक्ष की एकदम उपेक्षा है, और उसके अंदर छुपी हुई है कलाकार को एक चुनौती; वस्तुतः यह उसकी हार है और दार्शनिक की विजय। यह दृष्टिकोण कलाकार और दार्शनिक दोनों का विरोध लिये हुए है, उनकी सच्ची एकता नही, जिसकी शक्ति वह कला की अभिव्यक्ति में प्रकट करता ।" (कुछ और गद्य रचनायें, पृष्ठ 93) कला के प्रति सावधानी उनके तईं कवि की जिम्मेदारी है।

ऐसा नहीं है कि कला और प्रतिबद्धता के बीच का द्वंद्व शमशेर के यहाँ पूरी तरह से हल हो गया है । 'एक बिल्कुल पर्सनल एसे' में उनका यह द्वंद्व खुलकर व्यक्त हुआ है । नागार्जुन, त्रिलोचन और अज्ञेय में फ़र्क बताते हुए वे कहते हैं, "जबकि नागार्जुन और त्रिलोचन मुझे दृष्टि देते हैं, अज्ञेय मुख्यतः 'सच्चे कलाकार की शिल्पगत अनुभूति'...।" दृष्टि और शिल्पगत अनुभूति में वे 'तत्वतः' अपने लिये- सांस्कृति प्रेरणा के लिये- कोई विरोध तो नहीं पाते, मगर 'प्रत्यक्ष' में यह अंतर महत्वपूर्ण समझते हैं। इस अंतर को स्पष्ट करने के लिये मध्यकालीन हिंदी कविता से जो उदाहरण वे ले आते हैं वह दिलचस्प हैं । "अपनी बात को और तरह से स्पष्ट करने के लिये अगर मैं कहूँ कि रामायण में और रहीम के दोहों में 'दृष्टि' और बिहारी के दोहों में 'कला की अनुभूति' है तो शायद मेरा अर्थ स्पष्ट हो।" सारतः "नागार्जुन, त्रिलोचन और केदार के यहाँ 'दार्शनिक' दृष्टिकोण मुख्य है, अज्ञेय के यहाँ कला।" (कुछ और गद्य रचनायें, पृष्ठ 32-33) यह द्वंद्व जब जीवन में ही हल नहीं हुआ है, और जब व्यक्ति समाज में मौजूद विषमता के फलस्वरूप व्यक्तित्व के विभाजन से ग्रस्त है तो स्वभाविक है कि इसकी छाया साहित्य और साहित्यालोचन में भी दिखाई पड़े।

शमशेर इस द्वंद्व से पूरी तरह वाकिफ़ हैं । इसे हल करने के लिये सैद्धांतिक स्तर पर वे कला की सामाजिक धारणा विकसित करते हैं। 'अमूर्त कला' शीर्षक लेख में वे कहते हैं, "कला की अभिव्यक्ति व्यक्ति और समाज की आशाओं- आकांक्षाओं और क्षणिक समर्थताओं का एक सजीव और गतिशील दर्पण है।" इसी लेख में अपनी बात साफ़ करते हुए आगे बताते हैं, "...जिसे हम टेकनीक या कला की अभिव्यक्ति का ढंग- ताल, छंद, तोल, विन्यास का हिसाब रखना कहते हैं- वह सिर्फ़ जीवन की गुंजलक अनुभूतियों की गति का परतौ, उनकी परछाईं, उनका आभास मात्र है।" (कुछ और गद्य रचनायें, पृष्ठ 165) अपनी सोच को यथार्थवाद के भीतर ही कायम रखने की जद्दोजहद करते हुए वे यथार्थवाद की भोंड़ी समझ का विरोध करते हैं, "यथार्थवाद का झंडा उठाने का मतलब अगर सिर्फ़ यह हो जाता है कि प्रतीक, रहस्य या केवल गति के ताल, छंद को व्यक्त करने वाली कला के हम सिरे से विरोधी हैं, तो यह मेरे ख्याल से यथार्थवाद के साथ भी अन्याय होगा ।" इस समझ के साथ वे अपना मत स्थिर करते हुए कहते हैं, "जो चीज हमारे लिये महत्वपूर्ण है, वह केवल यह कि कलाकार अपने विषय के अंदर किन तत्वों, किन विशेषताओं को दिखाना चाहता है और वह कहाँ तक उन्हें दिखाने में सफल होता है । ...शैली का यथार्थवादी या प्रतीकात्मक होना किसी कलाकृति का मूल्य निर्धारित नहीं करता । कोई कलाकृति किसी अनुभूति को कितनी सच्चाई और सफलता से व्यक्त करती है इस पर उसका मूल्य है ।" (कुछ और गद्य रचनायें, पृष्ठ 167)

कलाकृति के मूल्यांकन के लिये शैली को अपर्याप्त बताने के बाद वे कलाकार के दृष्टिकोण को भी इसके लिये नाकाफ़ी बताते हैं, "किसी विशेष दृष्टिकोण के होने से ही कोई- कोई कलाकृति अधिक निर्दोष या दोषपूर्ण नहीं हो जायेगी। कलात्मक अनुभूति की सच्चाई और शक्ति ही शैलीगत दृष्टिकोण की सार्थकता को प्रमाणित करेगी। शैली (अथवा टेकनीक) और विषयवस्तु के संबंध को हम अनुभूति की विशेषता से अलग रखकर नहीं समझ सकते । अगर अनुभूति नहीं है, या कच्ची है, तो टेकनीक भी बेकार है और विषयवस्तु भी ।" ( कुछ और गद्य रचनायें, पृष्ठ 168) कला के बारे में वे एक नया नजरिया अपनाते हैं जब कैफ़ी आजमी के प्रसंग में कहते हैं, "तमाम कला राजनीति है।" लेकिन 'कोरी राजनीति' नहीं - वह 'राजनीति' जिसमें आम आदमी की आशाएँ-आकांक्षाएँ सुलगती हैं। हर सच्चा कलाकार -देखा जाय तो, हर युग में- उसी अग्नि का ताप झेलता है।" ( कुछ और गद्य रचनायें, पृष्ठ 123) कला की इसी समझदारी के साथ शमशेर ने विभिन्न कवियोम पर विचार किया है।

कविता के क्षेत्र में शमशेर की रुचियाँ पर्याप्त विविध थीं । उर्दू उनके लिये घरेलू भाषा की तरह थी । अदबदाकर वे किसी भी प्रसंग में उर्दू कवियों का जिक्र अवश्य करते हैं। मैथिलीशरण गुप्त के साथ हाली का उनका तुलनात्मक विवेचन मशहूर है। इसमें उन्होंने दोनों कवियों की महत्ता को स्वाधीनता की भावना जगाने के प्रसंग में उजागर किया । इसके अलावा इकबाल, गालिब, फ़ैज, कैफ़ी आजमी आदि के अतिरिक्त उर्दू की कवयित्रियों पर विस्तार और अधिकार से लिखा। इसी कारण शमशेर ने आलोचना में हरेक तरीका अपनाया । उनकी आलोचना में एक ओर तो फ्रांसीसी कवि लुई अरागाँ का ऐसा विश्लेषण है जिसमें एक विदेशी कवि को पूरी तन्मयता के साथ उस देश की मिट्टी, जनता और इतिहास में अवस्थित किया गया है तो दूसरी ओर निराला की एक कविता 'बैठ ले कुछ देर / आओ, एक पथ के पथिक से, / प्रिय, अंत और अनंत के / तम-गहन जीवन घेर।' की टी एस इलियट के शब्दों में 'नीबू निचोड़ आलोचना' है । उनका एक मन ऐसे कवियों पर लहालोट है जिन्होंने वर्ण्य विषय को कविता के छंद में साध लिया है तो दूसरी ओर मुक्त छंद की विशेषतायें भी उन्हें आकर्षित करती हैं। गीतों की सफलता उन्हें स्पृहाजनक लगती है। भाषा की चुस्ती और मुहावरेदानी में चूक उनकी नजर में अक्षम्य है। अपने पसंदीदा कवियों को भी उन्होंने कठोरता से इन मानदंडों पर कसा और उनकी चूकों की ओर संकेत किये। यह कठोरता उनमें सिर्फ़ दूसरों के लिये नहीं अपने लिये भी थी। इसीलिए वे अपने आपको कवि मानने में संकोच करते रहे। आलोचक भी उन्होंने अपने को नहीं माना। फिर भी जैसे वे बड़े कवि हैं, उसी तरह एक महत्वपूर्ण आलोचक भी।

अपनी पसंदीदा प्रत्येक कविता को व्याख्यायित करने लायक विश्लेषण के औजार विकसित करने की बेचैनी शमशेर की आलोचना में कदम कदम पर दिखाई पड़ती है। इस वजह से उनकी आलोचना में प्रतिमानों की गहरी कशमकश है । बहरहाल, यह इच्छा भी बड़ी बात है जिसका अभाव कुछ दूर हो सके तो उनके शताब्दी वर्ष की यह भी महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी ।




(गोपाल प्रधान, प्रतिबद्ध आलोचक, समाज विज्ञान की पुस्तकों के बेहतरीन अनुवाद के लिए भी जाने जाते हैं. जन संस्कृति मंच से गहरा जुड़ाव. आजकल अंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में पढ़ा रहे हैं.)

3 comments:

आशुतोष कुमार said...

''यह सही है कि शमशेर की आलोचना में कलात्मक सौष्ठव और जनप्रतिबद्धता के बीच गहरी कशमकश है ...!ऐसा नहीं है कि कला और प्रतिबद्धता के बीच का द्वंद्व शमशेर के यहाँ पूरी तरह से हल हो गया है । ...''
ये वाक्य साही की याद दिलाते हैं क्या ?उन्होंने ही इस फांक का सब से जोर शोर से प्रचार किया था. जब की gopaalji ke इस lekh men ही shamsher की kalaadrishti का jo vishleshan mauzood hai , वही 'साही ऐलान' को ध्वस्त कर देने के लिए काफी है. शताब्दी वर्ष में 'साही समझ' को सही समझ से विस्थापित करना जरूरी है .

ZEAL said...

शमशेर जी निसंदेह एक महान आलोचक एवं कवि हैं।

Rangnath Singh said...

शमशेर के नए-नए पाठों से हिन्दी आलोचना को नयी त्वरा मिलती दिख रही है। लगता है कि साल बीतते-बीतते एक नए ही शमशेर हमारे सामने होंगे। और शमशेर के इस कायाकल्प के हम चश्मदीद होंगे।