2/9/11

वसंत बरास्ते विद्यापति - नागार्जुन



सरस बसंत समय भल पाओल दखिन पवन बह धीरे.
सपनहुं रूप बचन एक भाखिए मुख सओं दुरि करि चीरे..

तोहर बदन सम चाँद होअथि नहीं जईओ जतन बिहि देला.
कए बेरि काटि बनाओल नव कए तईओ तुलित नहीं भेला..

लोचन तूल कमल नहीं भए सक से जग के नहीं जाने.
से फेरि जाए नुकाएल जल भये पंकज निज अपमाने..

भनइ विद्यापति सुनु बर जौबति ई सभ लछमी समाने.
राजा सिबसिंग रूपनराएन लखिमा देहि रमाने..


सुन्दरी! तुम्हारा रूप मेरे लिए सपना हो गया है. घूंघट हटा लो, अपने श्रीमुख से एकाध बोल निकालो न! मैं कब से तरस रहा हूँ.

यह कितना अच्छा अवसर मिला है! रसमय बसंत सामने है. दक्षिण पवन हौले-हौले बह रहा है. घूंघट हटा लो न!

विधाता ने बड़ी तरकीब भिडाई, बड़े यत्न किये. फिर भी चाँद को तुम्हारे मुंह की तरह नहीं बना पाया! कई बार उसने चाँद की काट-छांट की, नए सिरे से कई बार उसने चाँद को गढ़ा, फिर भी चाँद तुम्हारे मुख की तुलना में पूरा नहीं उतरा!

कौन नहीं जानता की कमल तुम्हारी आँखों की बराबरी नहीं कर पाया? बेचारे कमल को ऐसी ग्लानि हुई कि जाकर पानी के अन्दर छुप गया.

विद्यापति ने कहा- सुन्दरी, मेरी बात सुनो. तुम साक्षात लक्ष्मी हो. रूपनारायण राजा शिवसिंह और रानी लखिमा देवी प्रसन्न रहें.

(पद विद्यापति पदावली से और अनुवाद बाबा नागार्जुन द्वारा)

1 comment:

kranti said...

ek premi ki saadh ko anuvaad me baba ne bharpoor bhara hai...anunaya ka tone hindi khadi boli mein zara mushkil hai...