3/18/11

होली के रंग - 1 (गिरिजा जी)














गिरिजा देवी भोजपुरी की उस ज़बरदस्त परम्परा की अगुवा रही हैं और हैं, जो आजकल भडैती और अपसंस्कृति के उपभोक्तावादी जहान में लुप्त सी हो चली है. भोजपुरी की फूहड़ छवि पोतने वाले ऐरे-गैरे गिरिजा जी के सामने भुनगे से कुछ ज्यादा नहीं. वे भले ही टी वी और मीडिया में लपर-झपर करते मटकते रहें, भोजपुरी जुबान के रस से उनकी भेंट नहीं है. भोजपुरी के अद्भुत लोकगीतों को जब गिरिजा जी का जादुई स्पर्श मिलता है तो वे दुगुनी ताकत से बोल उठाते हैं. ऊपर से बनारस घराने की, पूरब अंग की ठुमक लोकधुनों को और निखार देती है. इसे ही मणिकांचन योग कहते हैं. एक भाषा (बोली) की रचनात्मक ताकत आपको यहाँ देखने को मिलेगी.

आइये, होली के सगुन में सुनते हैं गिरिजा जी से
उड़त अबीर गुलाल
और
चढ़ल चईत चित लागेला हो रामा


3 comments:

deepak said...

Vah guru maja aagya... Dhanybad

सिद्धान्त said...

holi aur bhojpuri ka jo vartmaan sanyojit swroop hmaare saamne hai wah itna foohad hai, ki acche aur sadhe gayak sachmuch kho jaate hain, kyonki ek bada jansmooh is foohadtaa ko poojta deekhta hai.
banaras gharaane kee hori-faguaa abhi in sab cheezon se bache hue hain.
dhanyvaad Mrityunjay bhai, renewal ke liye.

Anonymous said...

लोक अपने तद्भव और अस्तव्यस्त में कितना शिष्ट और सभ्य हो सकता है .................नायाब प्रस्तुति