3/19/11

होली- 2 (गुलाम मुस्तफा खान,बेगम अख्तर और छन्नूलाल मिश्र)














क़ातिल जो मेरा ओढ़े एक सुर्ख शाल आया
खा खा के पान जालिम कर होठ लाल आया
गोया निकल शफक से बदरे कमाल आया
जब मुंह में वो परीरू मल कर गुलाल आया

एक दम तो देख उसको होली को हाल आया.

खालिस कहीं से ताज़ी एक जाफरां मंगाकर
मुश्को गुलाब में भी मल कर उसे बसाकर
शीशे में भर के निकला चुपके लगा छुपाकर
मुद्दत से आरज़ू थी एक दम अकेला पाकर

एक दिन सनम पे जाकर मैं रंग डाल आया.

नजीर अकबराबादी की इस नज़्म के दो बन्दों के साथ

सुनिए तीन उस्तादों से होरी

पिया संग खेलूँ होरी (गुलाम मुस्तफा खान)
होरी खेलन कैसे जाऊं (बेगम अख्तर)
बरजोरी करो न मोसे होरी में (छन्नूलाल मिश्र)



4 comments:

आशुतोष कुमार said...

शुकराना.

वंदना शुक्ला said...

गुलाम मुस्तफा साहब को तानसेन समारोह के बाद सुना है ...लाज़वाब

मनोज पटेल said...

Thanks Partner !!

सिद्धान्त said...

fir se anootha sanklan...lekin is baar thoda khaantipan se alag hatate hue. in teenon men, Begum Akhtar wala geet sabse adhik priy.