3/13/11

अब नहीं आती पुलिस पर प्रियतमा

अब नहीं आती पुलिस पर प्रियतमा

कभी कभी रोचक प्रूफ की गड़बड़ियां जब निगाह के सामने से गुजरती हैं तो दिल झूम उठता है.
कुछ बानगियाँ पेश हैं. बी ए के दिनों में जब हम हिंदी विभाग, इलाहाबाद में पढ़ा करते थे तो सेलेबस मिला करता था. इस सेलेबस में कई नमूनेदार गलतियाँ होती थीं. मसलन हिंदी काव्यशास्त्र के एक विद्वान, जिनका नाम था तारक नाथ बाली, उनकी किताब पढने योग्य किताबों की सूची में शामिल की गयी थी. खैर किताब का नाम तो सही था पर खुद लेखक का नाम जो छपा था वह आज तक भूल नहीं पाया. नाम था- तार कनात बल्ली. मानो पढ़ने की नहीं घर बनवाने के सामानों की लिस्ट हो. उसी विभाग की एक और याद है. हमारे बी ए के पाठ्यक्रम में निराला की एक कविता शामिल थी-
स्नेह निर्झर बह गया है
रेत ज्यों तन रह गया है
इसी कविता में एक पंक्ति आती है- अब नहीं आती पुलिन पर प्रियतमा. पुलिन माने किनारा. विभाग के साहेबान की मेहरबानी देखिये कि यह पंक्ति कुछ यूं छपी- अब नहीं आती पुलिस पर प्रियतमा. अब इसका भाष्य हम दोस्त अलग-अलग विरामचिन्ह लगा कर किया करते. या तो यह पंक्ति एक ऐसे पुलिस वाले के लिए हो सकती है जिसकी महबूबा अब उसके पास नहीं आती या फिर कैम्पस के उन प्रेमी युगलों के लिए यह पंक्ति खुशी का सबब होगी जो बेचारे इत उत पुलिस और उससके चचा प्राक्टर से बचते घूमते हैं.

खैर, इस लिहाज़ से आपको जुजे सारामागो का उपन्यास जरूर पढ़ना चाहिए. उपन्यास का नाम है 'लिस्बन की घेरेबंदी का इतिहास'. प्रूफरीडर राईमुंदु डि सिल्वा एक गुनी प्रूफरीडर है. एक रोज़ उसके पास लिस्बन की घेरेबंदी पर आधारित इतिहास की एक पुस्तक का प्रूफ पढ़ने को आता है. प्रूफ पढ़ते पढ़ते राईमुंदु अचानक एक जगह ठहरते हैं. और एक नहीं को उड़ा देते हैं. इस तरह एक प्रूफ रीडर इतिहास के भीतर की घटनाओं की असंगति को भांपता ही चला जाता है और आखिरकार लिस्बन की घेरेबंदी का नया इतिहास लिख देता है. उम्मीद करता हूँ कि आप की किताबें ऐसे ही प्रूफ रीडरों के सामने से ही किताबें गुजरें. आमीन !

3 comments:

Arvind Mishra said...

हा हा हा ..इसे यूं भी पढ़कर देखें -
अब नहीं आती पुलिस , पर प्रियतमा
एक चोर जो सद्य प्रेमी है दूसरे चोर से :
हे मित्र अब एक अच्छी बात यह हुयी है कि पुलिस का आना अब कम हो गया है -हाँ अब प्रेमिका ने उसकी जगहं ले ली है ...

अनूप शुक्ल said...

रोचक बात! शीर्षक देखकर हम तो आपको टोंकने वाले थे - पुलिस नहीं बाबा, पुलिन। लेकिन पढ़ा तो माजरा मजेदार लगा और टोंकना भूल गये। :)

kranti said...

bhai...khoob yaad dilaya ye kissa...