4/25/11

‘बावरे अहेरी’ का महाप्रयाण -महेश्वर

आजकल अज्ञेय जन्मशताब्दी के बहाने लगातार उनके जीवन और साहित्य पर बहसें गरम हैं. जनसत्ता और समयांतर में इस पर लगातार लिखा जा रहा है. इन बहसों में कोई अज्ञेय को सी आई ए का एजेंट बता रहा है तो कोई उन्हें अभूतपूर्व क्रांतिकारी. किसी कृतिकार के जीवन पर रोशनी डालने की छीछालेदर पद्धति से अलग उसके व्यक्तित्व और कृतित्व की उलझनों की पड़ताल करने का माद्दा इस बहस में बार-बार हाशिये पर पहुँच जा रहा है. इस रोशनी में महेश्वर का यह पुराना आलेख फिर से पढ़े जाने की मांग करता है जो अज्ञेय के रचनाकर्म और जीवन के रेशे खोलता है. यह टिप्पणी समकालीन जनमत, 12-18 अप्रैल, 1987 से ली गयी है.


‘बावरे अहेरी’ का महाप्रयाण












जितनी स्फीति इयत्ता मेरी दिखलाती है
उतना ही मैं प्रेत हूं
जितना रूपाकार-सारमय दीख रहा हूं-
रेत हूं.

कभी उन्होंने कहा था. और अब........ अब वह नहीं हैं. राष्ट्रीय मुक्ति के क्रांतिकारी आदर्शों से ‘स्वयं की खोज’ तक, स्वयं की खोज से ‘निस्सारता’ के दर्शन तक, और निस्सारता के दर्शन से ‘निजता के विस्तार’ तक एक ‘‘बावरे अहेरी’’ की तरह ‘सत्य का शोध’ करनेवाले कवि ‘अज्ञेय’ अब नहीं हैं. एक लंबी काव्य-यात्रा का समापन करते हुए गत 4 अप्रील को उन्होंने दुनिया से विदा ले ली.

‘अज्ञेय’ का अवसान एक युग का अवसान है. इस युग को खुद उन्होंने अपनी अंतरात्मा की व्याकुलता से गढ़ा था। इस व्याकुलता में सामाजिक अनुशासन की ‘विवशता’ से पीडि़त ‘व्यक्ति’ का आर्तनाद था और उसकी ‘लघुता के गर्व’ का घोषणापत्र भी. जब देश में 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन, 1946 के नौसेना-विद्रोह और तेभागा-तेलंगाना-आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी, तब उन्होंने ‘अपने’ नए युग की शिनाख्त करते हुए कहा था- ‘‘यह युग संदेह, अस्वीकार, कुंठा और अनास्था का युग है. किसी भी नयी-पुरानी विचारधारा को मानना और किसी भी नये-पुराने जीवन-मूल्य से संबद्ध होना अब हास्यास्पद हो गया है. तमाम टूटन, विघटन और आस्थाहीनता से उत्पन्न निराधारता और निस्सारता को देखकर लोग अपने ‘स्वयं’ की खोज कर रहे हैं.’’ आज तक की काव्य-यात्रा में ‘अज्ञेय’ ने जो ‘युग-सत्य’ हमारे सामने पेश किया है, उसकी बुनियाद अंत-अंत तक इसी मान्यता पर दृढ़ता से टिकी रही. दरअसल, इसी दृढ़ता से उन्हें लंबे समय तक आधुनिकतावादी काव्य-आंदोलन का मसीहा बनाए रखा. आधुनिक हिंदी कविता के सुप्रसिद्ध तीन ‘सप्तक’ उनका इस मसीहाई भूमिका के प्रमाण हैं.

साहित्य-रचना के क्षेत्र में वह यायावर थे. अपने व्यक्तित्व की शोध-यात्रा में उन्होंने ‘रेतपन’ के एहसास से लेकर ‘जो मेरा है वही ममेतर है’ के बोध तक- ‘कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम’ के आयातित आधुनिकता से लेकर ‘राम-जानकी शोध-अभियान’ के पंरपरावाद तक- पहुंचने में उन्होंने जितने पड़ाव डाले, उनकी साहित्यिक कृतियां उन पड़ावों के भव्य स्मारक हैं. वे सब उनके ‘आत्मचैतन्य’ और उनकी निजी संवेदनात्मक समृद्धि के दस्तावेज हैं. इन दस्तावेजों में सामाजिक यथार्थ की विषमताओं और जटिलताओं का कड़वा शोर-शराबा नहीं मिलेगा, अपनी निजता के प्रभामंडल में डूबे वैयक्तिक सन्नाटे का ‘सौंदर्य’ मिलेगा. चाहे चरम व्यक्तिवाद, बंधनमुक्त निरानंद प्रेम तथा अलगाव, त्रास और वरण की अस्वतंत्रता के तनाव से भरे काव्य-ग्रन्थ हों, चाहे निजी संवेदनाओं की छटा से दमकते विश्व-भ्रमण के सजीव वृत्तांत हों- हर जगह ‘अज्ञेय’ का यह विशिष्ट सौंदर्य-बोध मौजूद है. सन्नाटे का यही सौंदर्य-बोध शायद उनके जीवन-मूल्य का वास्तविक स्रोत रहा है.

उन्होंने अपने इस सौंदर्य-बोध का पत्रकारिता के क्षेत्र में एक हद तक सामाजीकरण किया था. ‘दिनमान’ के प्रथम संपादक के रूप में उन्होंने न केवल हिंदी की, बल्कि समस्त भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता को एक नया आयाम दिया. उन्होंने पत्रकारिता की एक ऐसी शैली विकसित की, जिसमें साधारण-से दिखने वाले समाचार भी खबरों के अंदर छुपी अर्थ की परतों को खोलने का जरिया बन गए और लेखक की मानवीय प्रतिक्रियाएं उसका जरूरी हिस्सा बन गयीं.

‘अज्ञेय’ के बहुमुखी जीवन में अच्छाई-बुराई से भरा एक पूरा इतिहास निहित है. और इतिहास को आंसुओं से धुंधला नहीं किया जाता, उससे सबक सीखा जाता है. आइये, हम इस दिवंगत ‘इतिहास-पुरुष’ को श्रद्धांजलि देते हुए मैक्सिम गोर्की का यह कथन दुहरायें: ‘‘ हमें प्रकृति की अक्लमंदी का शुक्रगुजार होना चाहिए कि निजी या व्यक्तिगत किस्म का अमरत्व नहीं होता. हम सभी अनिवार्यतः मर जाएंगे, ताकि इस पृथ्वी पर हमसे अधिक बलवान, हमसे अधिक सुंदर और हमसे ज्यादा ईमानदार लोग हमारा स्थान ले सकें- ऐसे लोग जो एक नयी और शानदार जिंदगी का निर्माण करेंगे और जो समष्टि के संयुक्त संकल्पों से मृत्यु की शक्तियों पर विजय प्राप्त करेंगे।’’

2 comments:

आशुतोष कुमार said...

chatur puraataatwik ho , miyaan , saajhaa kar rahaa hoon.

S.N said...

kya tab Ajaiji JSM me nahi the kya!