4/6/11

भोजपुरी जन के दरवाजे पर

प्रकाश उदय की तीन कवितायें

(प्रकाश उदय की दो कवितायें आप यहीं पहले भी पढ़ चुके हैं. भोजपुरी एक समृद्ध बोली/भाषा का नाम है जो आजकल बाज़ार की नज़ारे-इनायत से मलबूस है. इसे बेचने वाले हमारे-आपके बीच के गद्दार हैं और खरीदने वाले यहाँ से लेकर बिलायत तक चहुँओर बिलबिलाये हुए हैं. और तो और चामे के बेर्हा की रखवारी कुक्कुर साहब कर रहे हैं. क्या होगा इसका! खुदा खैर करे. पर नज़र न लगे इस बोली को, आज भी इसमें प्रकाश उदय हैं, अष्टभुजा शुक्ल हैं और इसके लोकगीत हैं. बाल न बांका कर सके, जो जग बैरी होय!
पर अभी तो छोड़िये इन मसाइल को, फिर कभी के लिए. और पढ़िए ये तीन कवितायें.)

















आहो आहो
रोपनी के रऊँदल देहिया, संझही निनाला तनि जगइह पिया
जनि छोडि़ के सुतलके सुति जईह पिया
आहो आहो
हर के हकासल देहिया, सांझही निनाला तनि जगइह धनी
जनि छोडि़ के सुतलके सुति जईह धनी
आहो आहो
चुल्हा से चऊकिया तकले, देवरू ननदिया तकले
दिनवा त दुनिया भरके, रतिये हऊवे आपन जनि गंवईह पिया
धईके बहिंया प माथ, बतिअइह पिया
आहो आहो
घर से बधरिया तकले, भइया भउजईया तकले
दिनवा त दुनिया भरके, रतिये हऊवे आपन जनि गंवईह धनी
धईके बहिंया प माथ, बतिअइह धनी
आहो आहो
दुखवा दुहरवला बिना, सुखवा सुहरवला बिना
रहिये ना जाला कि ना, कईसन दो त लागे जनि संतईह पिया
कहियो रुसियो फुलियो जाईं, त मनइह पिया
आहो आहो
काल्हु के फिकिरिये निनिया, उडि़ जाये जो आंखिन किरिया
आ के पलकन के भिरिया, सपनन में अँझुरइह-सझुरइह धनी
जनि छोडि़ के जगलके सुति जइह धनी
जनि छोडि़ के जगलके सुति जइह पिया
जनि छोडि़ के जगलके सुति जइह धनी


















नेवता - हकारी
आजु तिलक में छौड़ा के, कल छौड़ी के बरियात में
दिनभर मंड़वाने-भतवाने जबरन जगरम रात में

नेवता पर नेवता पर नेवता एक लगन में चरि चरि गो
एने लूक लहरिया मारे रोके पत पीपर-बर हो
ए चाचा तू ओहिजा होल, ए बाचा तू होहिजा में
दिनभर मंड़वाने-भतवाने....

ओइजा नेवता नगद चलेला, होइजा धोती आ साड़ी
हो हितई त चहुँपावे के बाटे दही भरल हांड़ी
छूटे मत हिल हिंड़ा न जाये भुला न जाए बात में
दिनभर मंड़वाने-भतवाने....

पाँच बजियवा बस के सट्टा, सात बजियवा बिगड़ल बा
आठ बजियवा दस पर पहुँचल, चवा-चूल ले ठकचल बा
जिपिया मांगे एबरी-दोबरी दे द जिउआ जाँत के
हब उहँवा नस्ता संपरा के, हुंहवा पहुँचब पाँत में

लागल खोंच नया कुत्र्ता में, फाटल गंजी झांकत बा
कवन सफाई लंगड़इला के, मांगल पनही काटत बा
ई सुख का जाने जे सरवा, खेलत बा अफरात में
दिनभर मंड़वाने-भतवाने....

















पंचर के दुकान
हैण्डिल पैडिल टायर चक्का
दुकान हटे पंचर के पक्का

ना कवनो पोस्टर ना कवनो पलानी
काठे के बाक्सा बा नादे में पानी
लागे के दुई-चार टक्का
दुकान हटे पंचर के पक्का

ओ से भरइब चवन्नी लगइब
अपने से भरब त उहो बचइब
पंप बदे भइल धरमधक्का
दुकान हटे पंचर के पक्का

डकटर वकील अफसर हीरो भा नेता
लाखन करोड़न में लेता आ देता
सुनियो के खाय ना सनक्का
दुकान हटे पंचर के पक्का

दुइ चेला एक भैने एगो भतीजा
तनी-तनी गलती प नौ-नौ नतीजा
बुढ़वा लगी मम्मा कक्का
दुकान हटे पंचर के पक्का

देसवा बंटा देले नेतवा अभागा
एके में बान्हे इ धन्धा के धागा
दिल्ली लाहौर चाहे ढक्का
दुकान हटे पंचर के पक्का

2 comments:

आशुतोष कुमार said...

आहो को अपनी आवाज़ में सुनवा दो न यार , तरन्नुम में.

Anonymous said...

आहो आहो को पढ़के, सुनने का मन तो करता ही है, इलाहबाद की बैठकी भी बेतरह याद आती है.