4/20/11

उदय प्रकाश की कहानी मोहनदास की नाट्य प्रस्तुति


एक ऐसे समय में जब आम आदमी के विकास और न्यायपूर्ण सोशल इंजीनियरिंग के खूब सरकारी दावे किए जा रहे हैं, बिहार की चर्चित नाट्य संस्था ‘हिरावल’ ने अपनी नवीनतम नाट्य प्रस्तुति ‘मोहनदास’ के जरिए इस तरह के शासकवर्गीय पाखंड का पर्दाफाश किया और समाज में मौजूद अन्याय, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी की हकीकत को बड़े ही मार्मिक तरीके से उजागर किया। कांग्रेस के राहुल गांधी का दलित व आम आदमी प्रेम हो, सर्वजन या बहुजन के मुखौटे वाली मायावती की तथाकथित दलितवादी राजनीति हो या नीतीश कुमार का महादलित प्रेम हो, इससे गरीब, भूमिहीनों और दलितों की जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आया है, बल्कि उनके जीवन का संकट निरंतर बढ़ता जा रहा है, इस नाटक में यह सच बड़े ताकतवर तरीके से सामने आया। नाटक में कोई राजनीतिक प्रसंग तो नहीं था, लेकिन आम आदमी का जो सच है उसकी तासीर कितनी राजनीतिक हो सकती है, यह इसे देखते हुए महसूस किया जा सकता था।

यह नाटक राजधानी पटना के सिद्धार्थनगर में हाल में महादलितों पर की गई भूमाफियाओं की गोलीबारी में मारी गईं शहीद बुट्टी देवी को समर्पित था। बिहार या पूरे देश में भूमाफिया और बिल्डर्स किस तरह से स्थानीय प्रशासन, पुलिस और सरकार को अपने हित में इस्तेमाल करते हैं, इस सच से पूरे देश की जनता वाकिफ है। इस घटना में भी ऐसा ही हुआ, जिसमें महादलित जब अपनी जमीन के लिए विरोध में उतरे तो उन पर हमला हुआ। लेकिन एक महिला की मौत के बाद भी जिस तरीके से उन्होंने प्रतिरोध जारी रखा, वह निरीह और निर्बल मानी जाने वाली जनता के भीतर छिपी हुई ताकत की बानगी था। गरीब और मेहनतकश लोग इस तरह क्यों विद्रोह और प्रतिरोध करने को मजबूर होते हैं, नाटक ‘मोहनदास’ में मोहनदास की त्रासद दास्तान को देखते हुए दर्शकों ने इसे बखूबी महसूस किया।

19-20 अप्रैल 2011 को पटना के कालिदास रंगालय में मंचित नाटक ‘मोहनदास’ हिंदी के चर्चित कथाकार और कवि उदय प्रकाश के इसी नाम की कहानी पर आधारित था। निर्देशक और नाट्य रूपांतरकार संतोष झा का स्पष्ट तौर पर कहना है कि ‘‘धनवान और ताकतवर लोगों के लिए यह समय पहले किसी भी वक्त की तुलना में ज्यादा मुफीद और मौजमस्ती भरा है, जबकि वंचित व कमजोर तबके का इंसान निरंतर असहाय और मजबूर होता चला जा रहा है। यह मंजर पूरे देश में है। कया शहर और क्या गांव, हर जगह यही हाल है। नाटक इसी यथार्थ की एक झलक दिखाता है। जिन सवालों को यह नाटक उठाता है, दर्शक उनके बारे में सोचें और उनका उत्तर तलाशने की कोशिश करें, यही इसका मकसद है।’’

हंस पत्रिका में जब उदय प्रकाश की यह कहानी छपी थी, तब इसके नायक, उसके परिवार और गांव आदि के नामों का महात्मा गांधी के परिवार और जन्मस्थान के नाम से जुड़े होने तथा न्यायिक प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों का नाम मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, हरिशकर परसाई जैसे हिंदी के चर्चित साहित्यकारों के नाम पर होने के कारण साहित्यिक दायरे में वाद-विवाद भी हुआ था। उदय प्रकाश की कहानी कला और कहानी के प्रतीकों को लेकर तरह-तरह की व्याख्याएं भी हुई थीं। लेकिन उस वक्त भी हिरावल ने उन प्रतीकों और बहसों के बजाए इस कहानी के नायक की इस पीड़ा को केंद्र में रखकर नाटक किया था, कि किस तरह एक प्रतिभावान दलित नौजवान की आइडंटिटी ही उससे छीन ली जाती है और बिसनाथ जैसे नकली और प्रतिभाहीन को यह सामाजिक व्यवस्था और यह तंत्र मोहनदास साबित कर देता है। उदय प्रकाश के अनुसार ‘मोहनदास वास्तव में एक जीता-जागता असली आदमी है और उसकी जिंदगी इस समय दरअसल संकट में है।.....मोहनदास एक असलियत है। इसकी पुष्टि आप चाहें तो हमारे गांव ही नहीं, इस देश के किसी गांव के किसी बाशिंदे से पूछकर कर सकते हैं।’’

दरअसल ‘मोहनदास’ उस तंत्र का एक रूपक है, जहां जोर-जबरदस्ती, तिकड़म, संबंध के जरिए योग्य की जगह अयोग्य लोग काबिज होते हैं, जहां लोकतंत्र के ठेकेदार सबसे ज्यादा अलोकतांत्रिक होते हैं, जहां जनता का विकास करने वाले सिर्फ अपनी समृद्धि के लिए जनता के विनाश की कार्रवाइयां संचालित करते हैं, जहां जनता के प्रति उनका प्रेम, दया और सहानुभूति सिर्फ पाखंड होता है, जहां भेदभाव की तमाम सामाजिक परंपराएं और मजबूत की जाती हैं, जहां शोषण, गुलामी, अन्याय, उत्पीड़न की तमाम प्रवृत्तियों का शासकवर्ग संरक्षण और संवर्धन करता है। नाटक एनजीओ मार्का समाजसेवियों पर भी कटाक्ष करता है, जो गरीबों की बस्तियों में जाकर उनकी मुक्ति की उम्मीद तो बंधाते हैं, लेकिन उनके जीवन संघर्षों के साथी नहीं होते, बल्कि वे खुद इसी व्यवस्था में अपने लिए कुछ खास हासिल कर लेने की जुगाड़ में रहते हैं।

नाटक में कई पात्रों के नैरेशन के जरिए मोहनदास और उसके परिवार की कहानी आगे बढ़ती है। मोहनदास के पिता काबा दास कबीरपंथी हैं, साईं इतना दीजिए जामे कुटंब समाय जैसी प्रवृत्ति के। उनके बेटे मोहनदास ने फस्र्ट डिवीजन से ग्रेजुएट किया था और विश्वविद्यालय की टापर सूची में उसका दूसरा स्थान था। ग्रेजुएट के बाद मोहनदास नौकरी की तलाश में जुटता है, लेकिन लिखित परीक्षा में सबसे ऊपर रहने के बावजूद हर बार इंटरव्यू में वह असफल हो जाता है। हर बार अफसर, नेता या किसी बड़े आदमी का कोई रिश्तेदार उसकी जगह चुन लिया जाता है। एक कोइलरी में नौकरी की उम्मीद जगती है, लेकिन उसके ज्वाइनिंग लेटर का वह इंतजार ही करता रह जाता है। हद हो जाती है, जब उसे अचानक पता चलता है कि उसकी जगह उसी के नाम से उसी के प्रमाणपत्रों के आधार पर एलआईसी में काम करने वाले एक बड़े किसान नगेंद्रनाथ का बेटा विश्वनाथ उर्फ बिसनाथ उसकी जगह नौकरी कर रहा है। बिसनाथ के तरफदार मोहनदास को इसके लिए मजबूर करते हैं कि वह खुद को मोहनदास नहीं, बल्कि विश्वनाथ बताए। वह कानून की शरण में जाता है, लेकिन न्यायपालिका, पुलिस और समाज हर जगह से अपमान, उत्पीड़न और यातना झेलता है। व्यवस्था में मौजूद मुक्तिबोध, परसाई और शमशेर जैसे ईमानदार और संवेदनशील अधिकारियों की सहानुभूति और मदद के बावजूद उसे अपना नाम और नौकरी नहीं मिल पाती। ईमानदार अधिकारियों को शिकस्त मिलती है और अन्यायी जीत जाते हैं।

चरम निराशा और पुलिसिया यातना से गुजरते हुए अंत में मोहनदास गुहार लगाता है कि ‘‘मैं किसी भी अदालत में चलकर हलफनामा देने के लिए तैयार हूं कि मैं मोहनदास नहीं हूं। ...बस मुझे चैन से जिंदा रहने दिया जाए।....जो लूटना हो लूटो। अपना अपना घर भरो। लेकिन हमें अपनी मेहनत से जीने दो।’ जाहिर है अपनी मेहनत से कोई सम्मानजनक ढंग से जी पाए, इसके अवसर भी आज का तंत्र नहीं दे रहा है। नाटक के इस अंतिम दृश्य के कंट्रास्ट में निर्देशक ने विश्वकप में भारत की जीत पर बौराए लोगों के जश्न का एक दृश्य संयोजित किया था, जो एक तरह से राष्ट्रवाद को भी बहस के दायरे में समेट लेता है। यह एक प्रायोजित राष्ट्रवाद है जिसके जुनून और नशे में मोहनदास जैसे करोड़ों लोग, जो बेरोजगारी, अवसरों के अभाव, भ्रष्टाचार और भेदभाव झेल रहे हैं, जो अपने वाजिब लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित हैं, उनकी पीड़ाजनक सचाई को लोगों की निगाह और चेतना से गायब करने की कोशिश की जाती है।

नाटक में नुक्कड़ नाटकों और मनोशारीरिक नाटकों की कुछ युक्तियों का भी सहारा लिया गया था। मोहनदास जैसी लंबी कहानी, जिसमें अपने समय की यथार्थ संबंधी सूचनाओं को एक ही कहानी में समेट लेने का जो खास उदय प्रकाशीय स्टाइल और आग्रह है, वह भी है और जिसमें मौजूद प्रतीकों के अर्थों में उलझने के पर्याप्त अवसर भी हंै, उसके बीच से डेढ़ घंटे में आम आदमी, खासकर दलित-वंचित-मेहनतकश समुदाय के प्रतिनिधि के तौर पर मोहनदास की त्रासदी को मंच पर पेश कर देना एक निर्देशकीय कौशल ही कहा जाएगा। कुशलता यह भी है कि नाटक कहानी के मूल कथ्य को कहीं भी नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि उसे और ताकतवर तरीके से पेश करता है। नैरेशन में लगे पात्र ही नाटक के चरित्रों की भूमिकाएं भी निभाते हैं और कई बार मोहनदास के पीछे चलते हुए वे उस विशाल जनसमूह को भी मूर्त करते हैं, जो बेरोजगारी और भेदभाव की समस्या को झेल रहा है, जिन प्रतिभाओं को कुचला जा रहा है या जिनकी उपेक्षा हो रही है। त्रासदी के रंग को और गाढ़ा करने में कहानी को नैरेट करने वाले पात्रों की काले वेशभूषा की भी अहम भूमिका थी।

सुमन कुमार ने मोहनदास के टूटन की प्रक्रिया को अपनी शारीरिक भाव-भंगिमा और डायलाग डिलिवरी के जरिए बड़े ही प्रभावशाली तरीके से व्यक्त किया। पुलिस और दबंग-लंपट नौजवान की भूमिका में रोहित विकास और अफसर की भूमिका में दीपक कुमार का अभिनय काबिल-ए-तारीफ था। विश्वनाथ और उसकी पत्नी की मूमिका में रामकुमार तथा अंकिता ने जीवंत अभिनय किया। कुमार परवेज न्यायिक दंडाधिकारी मुक्तिबोध की भूमिका में थे, उन्होंने उनके वैचारिक व्यक्तित्व को मूर्त करने की कोशिश की। समता राय ने मोहनदास की पत्नी कस्तुरीबाई की भूमिका का बखूबी निर्वाह किया। कथा को नैरेट करने में भी उनकी भूमिका प्रभावशाली रही। राजन कुमार, चांदनी, युसूफ, हिमांशु शेखर,, संजीव गुप्ता, रूनझुन और संतोष झा ने भी अपनी भूमिकाओं का कुशलता से निर्वाह किया। प्रकाश परिकल्पना विज्येंद्र कुमार टांक की थी।

नाटक ने मानो दर्शकों की दुखती रग को छू लिया। नौजवान दर्शक खासे प्रभावित नजर आए। पहले दिन प्रस्तुति के दौरान ही एक दर्शक की आवाज सुनाई पड़ी- बिल्कुल ऐसा होता ही है। दूसरे ने कहा कि एकदम सही फैक्ट है। दूसरे दिन ब्रगल में बैठे मैथिली के कथाकार अशोक की टिप्पणी थी, कि कहानी जितना मोहनदास की पीड़ा के प्रति पाठकों को संवेदनशील करती है, यह नाटक उससे कहीं ज्यादा उसकी संवेदना को झकझोरता है। यह नाटक ज्यादा धारदार है। सीपीआई (एमएल) के केंद्रीय कमेटी सदस्य श्यामचंद्र चैधरी की प्रतिक्रिया यह थी कि नाटक सच को सामने लाता है और इसका त्रासद अंत दर्शकों को आक्रोश से भर देता है, यही इसकी सफलता है।


सुधीर सुमन

2 comments:

सुनील गज्जाणी said...

namaskaar !
acchi kahaaniyaa ka avashya hi manchan honaa chahiye ,kaahaniyaa achchi ho naa ki kisi famous naam kaa upyog kiyaa jaaye uday prakash jee sahity me kisi parichay ki aawashyktaa nahi hai , kahani achchi hai , naatya roop pradan karne ke liye shree santosh jha saab kaa bhi aabhar !
sadhuwad
saadar !

मृत्युंजय said...
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