4/26/11

पार्टनर की पालिटिक्स....?


हिन्दी पत्रकारिता को ऐसे दिन भी देखने थे... अमर उजाला के सम्पादकीय पन्ने पर एक लेख छापा है जिसमें बताया गया है कि हिन्दी के साहित्यकार और उनके संगठन आन्दोलनों में शरीक नहीं होते. मसलन भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना की अगुवाई वाले आन्दोलन में उन्होंने शिरकत नहीं की. यह सफ़ेद झूठ है. इसका मतलब यह है कि पत्रकार महोदय अपने इर्द-गिर्द कहीं नज़र नहीं डालते. वे आन्दोलनों में शरीक भी नहीं होते कि प्रत्यक्ष को प्रमाण माने, वे लोगों से बात नहीं करते कि अनुमान को प्रमाण मानें, वे कुछ पढ़ते भी नहीं कि शब्द को ही प्रमाण मान लें. वे सिर्फ लिखते हैं और मुक्तिबोध के जुमले को गैरजिम्मेदार तरीके से उछालते हैं- पार्टनरों की पालिटिक्स के बारे में पूछते हैं. अपनी पालिटिक्स तो वे सिर्फ लिख कर करते हैं. वे तीन टूटे हुए पैरों वाली लोकतंत्र की गाय का चौथा घायल पैर तोड़ने के इरादे से लिखते हैं. वे अगर देखते तो उन्हें पता होता कि सलवा जुडूम के प्रतिरोध से लेकर विनायक सेन की रिहाई तक और शर्मिला इरोम से लेकर जैतापुर तक साहित्यिक-सांस्कृतिक जमात आन्दोलनकारी जनता के साथ खड़ी है.

नीचे उनका लेख, लेख पर प्रणय कृष्ण की प्रतिक्रया, जसम का बयान और इस बाबत जनसत्ता की रिपोर्ट चिपका रहा हूँ. कृपया देखें और इस तरह के गैर जिम्मेदार लेखन के खिलाफ अपना प्रतिवाद दर्ज करें.

प्रणय कृष्ण का प्रतिवाद

प्रति
श्री यशवंत व्यास
अमर उजाला दैनिक

प्रिय यशवंत जी,

25 अप्रैल के अमर उजाला के सम्पादकीय पन्ने पर श्री श्याम विमल का लेख 'पार्टनर तुम्हारी पालिटिक्स क्या है?' पढ़कर हतप्रभ रहा जाना पडा कि क्या हिन्दी पत्रकारिता अब इस काबिल भी नहीं रही कि अपने अगल-बगल के अखबारों को ही झाँक-ताक ले. विमल जी ने फरमाया है कि हिन्दी के लेखक और लेखक संगठन अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से नदारद थे. चूँकि विद्वान् लेखक ने हमारे संगठन जन संस्कृति मंच का भी नाम लिया है , लिहाजा हम इस लेख में की गई गलतबयानी के प्रतिवादस्वरूप कुछ तथ्यों की ओर आपका ध्यान आकर्षित कराना चाहते हैं. पहली बात तो यह कि सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, बल्कि लखनऊ, कानपुर, गोरखपुर, पटना, रांची, बनारस, गाजीपुर आदि तमाम स्थानों पर न केवल जन संस्कृति मंच इस आन्दोलन में सक्रिय रहा, बल्कि कई जगह तो हमारा संगठन ही केंद्रीय भूमिका में रहा. (इन जगहों पर हमारी शिरकत के लिए आप खुद अपने अखबार और वहां के दूसरे अखबारों के स्थानीय संस्करण देख सकते हैं).

दिल्ली में 8 अप्रैल के दिन जन लोकपाल विधेयक लागू करने के सवाल पर जन संस्कृति मंच के अध्यक्ष प्रो. मैनेजर पांडेय के नेतृत्व में लेखकों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का समूह जंतर-मंतर पहुंचा और पिछले तीन दिन से जारी श्री अन्ना हजारे के आंदोलन के प्रति अपना समर्थन जताया। जंतर मंतर पर इस आंदोलन में शिरकत करने वालों में जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. मैनेजर पांडेय, राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कवि मंगलेश डबराल, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कवयित्री शोभा सिंह, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कवि मदन कश्यप, कवि-पत्रकार अजय सिंह, कहानीकार अल्पना मिश्र, कवि रंजीत वर्मा, द ग्रुप संस्था के संयोजक फिल्मकार संजय जोशी, संगवारी नाट्य संस्था के संयोजक कपिल शर्मा, युवा चित्रकार अनुपम राय, रंगकर्मी सुनील सरीन, संस्कृतिकर्मी सुधीर सुमन, श्याम सुशील, मीडिया प्रोफेशनल रोहित कौशिक, संतोष प्रसाद और रामनिवास आदि प्रमुख थे। सच तो यह है कि दिल्ली में हमारे संगठन के लगभग सभी राष्ट्रीय पदाधिकारी इस दिन सत्याग्रह के समर्थन में वहां मौजूद थे और श्याम विमल लिख रहे हैं कि 'किसी भी संघ का कोइ भी पदाधिकारी इस जनांदोलन में नज़र नहीं आया'. लेखक-संस्कृतिकर्मियों ने जंतर मंतर पर उपस्थित जनसमूह के बीच पर्चे भी बांटे।

हमने इस आशय का प्रेस वक्तव्य भी जारी किया जिसे कुछ अखबारों ने छापा भी. जनसता और दैनिक लोकसता की 09 अप्रैल की कटिंग मैं श्री विमल जी के आलेख के साथ एक कागज़ पर चिपकाकर आपके अवलोकनार्थ अटैच कर रहा हूँ. साथ ही उस समय भेजी गई प्रेस विज्ञप्ति भी अटैच कर रहा हूँ जिसे छापने या कम से कम पढ़ लेने या दूसरे अखबारों और ब्लाग जगत में उसके छपे संस्करणों पर ही ने नज़र डालने की ज़हमत यदि श्री विमल ने उठा ली होती तो इतना गैर-ज़िम्मेदारान और अहम्मन्य लेख लिखने से बाज़ आ गए होते . जनसत्ता वाले समाचार में आप यह भी देख सकते हैं मेरे संगठन के अलावा भी वहां शरीक हुए लेखकों का उसमें ज़िक्र है. लेकिन विमल जी लिखते हैं कि,' इसकी कहीं कोई चर्चा नहीं है कि हिन्दी के अमुक अमुक साहित्यकारों ने जंतर मंतर पधारकर भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल बिल के समर्थन में अन्ना हजारे के आन्दोलन को अपना समर्थन दिया." ज़ाहिर है कि आप साहित्यकारों या उनके संगठनों की विज्ञप्ति न पढेंगे, न छापेंगे,न दूसरे अखबारों/ब्लागों में छपी उनकी शिरकत की खबर से अवगत होने का कष्ट करेंगे,न खुद वहां जाकर मौक़ा-मुआयना करेंगे, फिर वैसी ही चर्चा तो होगी जैसी विमल जी ने अपने लेख में की है. क्या पलटकर विमल जी से ही नहीं पूछा जा सकता कि 'पार्टनर , आपकी पालिटिक्स क्या है.?'

बहरहाल हम उम्मीद करते हैं कि आप सम्पादकीय पृष्ठ पर हमारा यह पत्र ज़रूर छापेंगे और भूल सुधार/खेद प्रकाश भी कर लेंगे. आप के अखबार का मैं लेखक भी रहा हूँ , इसलिए ये लेख देख और भी पीड़ा हुई.

प्रणय कृष्ण,
महासचिव ,
जन संस्कृति मंच

जन संस्कृति मंच का बयान
जन संस्कृति मंच

जन लोकपाल विधेयक बनने से भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को बल मिलेगा: प्रो. मैनेजर पांडेय

दिल्ली, उत्तर प्रदेश और पटना में आज जसम से जुड़े लेखक-संस्कृतिकर्मी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में शामिल हुए
जनविरोधी अर्थनीति और भ्रष्ट राजनीति के खिलाफ आंदोलन जारी रहेगा : जन संस्कृति मंच

नई दिल्ली: 8 अप्रैल

जन लोकपाल विधेयक लागू करने के सवाल पर आज जन संस्कृति मंच के अध्यक्ष प्रो. मैनेजर पांडेय के नेतृत्व में लेखकों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का समूह जंतर-मंतर पहंुचा और पिछले तीन दिन से जारी श्री अन्ना हजारे के आंदोलन के प्रति अपना समर्थन जताया। जन संस्कृति मंच से जुड़े कलाकारों ने इसी तरह उत्तर प्रदेश के लखनऊ और गोरखपुर समेत कई दूसरे शहरों और बिहार की राजधानी पटना में इस भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में आज शामिल हुए। जंतर मंतर पर इस आंदोलन में शिरकत करने वालों में जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. मैनेजर पांडेय, राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कवि मंगलेश डबराल, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कवयित्री शोभा सिंह, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कवि मदन कश्यप, कवि-पत्रकार अजय सिंह, कहानीकार अल्पना मिश्र, कवि रंजीत वर्मा, द गु्रप संस्था के संयोजक फिल्मकार संजय जोशी, कवि रंजीत वर्मा, संगवारी नाट्य संस्था के संयोजक कपिल शर्मा, युवा चित्रकार अनुपम राय, रंगकर्मी सुनील सरीन, संस्कृतिकर्मी सुधीर सुमन, श्याम सुशील, मीडिया प्रोफेशनल रोहित कौशिक, संतोष प्रसाद और रामनिवास आदि प्रमुख थे। लेखक-संस्कृतिकर्मियों ने जंतर मंतर पर उपस्थित जनसमूह के बीच पर्चे भी बांटे।

इस मौके पर जसम अध्यक्ष प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा कि इस देश में जिस पैमाने पर बड़े-बड़े घोटाले सामने आए हैं और भ्रष्टाचार जिस कदर बढ़ा है, उससे आम जनता के भीतर भारी क्षोभ है। यह गुस्सा इसलिए भी है कि कांग्रेस-भाजपा समेत शासकवर्ग की जितनी भी राजनीतिक पार्टियां हैं, वे इस भ्रष्टाचार को संरक्षण और बढ़ावा दे रही हैं। अगर यूपीए सरकार श्री अन्ना हजारे की मांगों को मान भी लेती है, तो भी भ्रष्टाचार के खिलाफ छिड़ी इस मुहिम को और भी आगे ले जाने की जरूरत बनी रहेगी।

उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर में होने वाले घोटाले पहले के घोटालों की तुलना में बहुत बड़े हैं, क्योंकि निजीकरण की नीतियों ने कारपोरेट घरानों के लिए संसाधनों की बेतहाशा लूट का दरवाजा खोल दिया है. देश के बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों- जमीन, खनिज, पानी- ही नहीं लोगों की जीविका के साधनों की भी लूट का सिलसिला बेरोक-टोक जारी है। राडिया टेपों और विकीलीक्स के खुलासों ने साफ कर दिया है कि साम्राज्यवादी ताकतें कारपोरेट हितों और नीतियों के अनुरूप काम करने वाले मंत्रियों की सीधे नियुक्ति करवाती हैं। सभी तरह के सवालों से परे रखी गयी सेना के उच्चाधिकारी न सिर्फ जमीन घोटालों में लिप्त पाये गये हैं, बल्कि रक्षा सौदों में भी बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार होने का नियमित खुलासा हो रहा है। न्यायपालिका के शीर्ष पर विराजमान न्यायधीशों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने की खबरें प्रामाणिक तौर पर उजागर हो चुकी हैं। कांग्रेस के कई नेता भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद अपने पदों पर जमे हुए हैं। केंद्र ही नहीं राज्य सरकारों में भी भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। कर्नाटक में भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री भूमि घोटाले में संलिप्त हैं और पूरे प्रदेश की अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से जितनी अपनी अवैध अर्थव्यवस्था चलाने वाले रेड्डी बंधु सरकार के सम्मानित और प्रभावशाली मंत्री हैं। इन स्थितियों में कारपोरेट लूट और भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं को लाठी-गोली का सामना करना पड़ रहा है, उन्हें देशद्रोही बताकर जेलों में बंद किया जा रहा है, जबकि भ्रष्टाचारी खुलेआम घूम रहे हैं।

प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा कि ऐसे कठिन हालात में प्रभावी लोकपाल कानून बनाने के लिए शुरू हुई भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को और भी ऊंचाई पर ले जाने की जरूरत है, ताकि जनता की भावनाओं के अनुरूप भ्रष्टाचार से मुक्त देश बनाया जा सके।
जन संस्कृति मंच की मांग है कि

1. सरकार द्वारा तैयार किये गये नख-दंत विहीन लोकपाल कानून के मसविदे को रद्द किया जाये और भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्षरत कार्यकर्ताओं की भागीदारी से एक प्रभावशाली लोकपाल कानून बनाया जाये।

2. टाटा, रिलायंस, वेदांत और दाउ जैसे भ्रष्टाचार और कानून के उल्लंघन में संलिप्त कारपोरेट घरानों को काली सूची में डाला जाये।

3. स्विटजरलैंड के बैंकों में अपनी काली कमायी जमा किये लोगों के नाम सार्वजनिक किये जायें, काले धन की एक-एक पाई को देश में वापस लाया जाये और इसका इस्तेमाल समाज कल्याण के कामों में किया जाये। हम यह भी मांग करते हैं कि तमाम अंतरराश्ट्रीय कानूनों की आड़ में काले धन को विदेश ले जाने के सभी दरवाजे निर्णायक तौर पर बंद किये जायें।

4. आदर्श घोटाले व अन्य रक्षा घोटालों में लिप्त सैन्य अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाया जाये और उन्हें कड़ी सजा दी जाये.

5. कारपोरेट लूट और भ्रष्टाचार के लिए उर्वर जमीन मुहैया कराने वाली निजीकरण और व्यावसायीकरण की नीतियों को उलट दिया जाये।

6. कारपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए उनके दबाव में लिये गये सभी सरकारी निर्णयों की समीक्षा की जाये और उन्हें उलट दिया जाये।

जन संस्कृति मंच
राष्ट्रीय कार्यकारिणी की ओर से
सुधीर सुमन द्वारा जारी


नीचे विमल जी का मूल आलेख और अखबारों में छपी खबरें देखी जा सकती हैं.



4 comments:

durga said...

मुन्दहूँ आँख कतहूँ कछु नाहीं ..........अँधेरी गुफा का भूत उर्फ़ श्याम विमल .........

अशोक कुमार पाण्डेय said...

कुछ लोग बस अपनी बनाई अवधारणाओं से ही संचालित होते हैं...जेनरलाइजेशन और अज्ञान उनके सटीक हथियार होते हैं...

: केवल राम : said...

अब क्या कहें इन बातों पर .....!

S.N said...

shyam vimal hai kaun jinhe aap safai de rahe hai!anna ka andolan apane aap me ek fraud hai.kisi left cultural sangathan ko usaka samarthan karana bhi nahi chahiye.