5/30/11

बेगम अख्तर- तीन बंदिशें


बेगम अख्तर से गज़लें सुनना और ठुमरी-दादरा सुनना दो अलग अनुभव हैं. जब वे ग़ालिब की गज़लें गातीं है तो एक पुरानी दुनिया सामने आ जाती है जिसका शीराज़ा बिखरने को है. ग़ालिब की शायरी के इस मर्म को बेगम साहिबा ने जितनी गहराई से ज़ज्ब किया, उतना और किसी ने नहीं. पर वही बेगम साहिबा जब लोक और शास्त्रीय गायन के बीच घूमती, ठुमरी और दादरा के रंग में होती हैं तो आप एक नयी चीज का अनुभव करते हैं. एक ख़ास घरेलूपने का, जिसे पुरानी पीढी की महिलायें बहुत सहेज के अपने पास रखती थीं.

मैं जब भी उनको ठुमरी या दादरा गाते हुए सुनता हूँ तो मुझे अपने गाँव की प्रौढ़ महिलायें याद आ जाती हैं, पान का बीड़ा दबाये पीढ़े पर बैठी हुई, कुछ गुनगुनाती हुई.

आज सुनते हैं उसी पुरकशिश आवाज़ में ये तीन बंदिशें -

हमार कही मानो राजा जी...
सोवत निंदिया जगाई...
पत राखो न राखो...




4 comments:

Arvind Mishra said...

वाह क्या खूब -वही पुरकशिश इम्मार्टल आवाज !

सागर said...

आपके गानों का चयन बहुत अच्छा है, इतना अलग कि बस एक से मिलता है - 'पारुल -चाँद पुखराज' से ... मूड बना देते हो आप. लेकिन शिकायत यह है कि प्रविष्टि बहुत दिनों पर आती है.
इस क्लास को बनाये रखें... और यूँ ही सुनने को कुछ भूली बिसरी पर ज़हन में बसी चीजें मिलती रहें. आमीन !

सागर said...

क्षमा करें मेरे अपडेट में ही को समस्या थी... प्रविष्टियाँ हैं और लगातार आई हैं.

' मिसिर' said...

खूबसूरत बंदिशें ! मरहबा !