9/22/11

संगीतकार और कवि- 1

  कुमार गन्धर्व और सर्वेश्वर  

पंडित कुमार गन्धर्व की गायकी हमेशा ही एक अद्भुत बेचैनी से पुर होती है. ग़ालिब याद आ गए कि 'पुर हूँ शिकवे से, राग से जैसे बाजा'. ये 'शिकवा' कुमार साहब के यहाँ उनके प्रिय कवि कबीर से सुर मिलाता आता है. यह कोई आसान काम नहीं, इसकी शर्त है 'दुनिया से यारी' वा 'दुनियादारी' का त्याग. माने यह कहने का साहस कि 'हमन है इश्क मस्ताना, हमन दुनिया से यारी क्या'.

विष्णु चिंचालकर द्वारा बनाया भावचित्र, आभार- श्री सुनील मुखी 




















कुमार साहब के गायन में डूबने के लिए
आइये एक कविता की साखी लेते चलें.
कविता सर्वेश्वर की है.

  सु रों के स हा रे-२  
  कुमार गन्धर्व का गायन सुनते हुए  

दूर-दूर तक
सोई पडी थीं पहाड़ियां
अचानक टीले करवट बदलने लगे
जैसे नींद में उठ चलने लगे.

एक अदृश्य विराट हाथ बादलों-सा बढ़ा
पत्थरों को निचोड़ने लगा
निर्झर फूट पड़े
फिर घूमकर सब कुछ रेगिस्तान में
बदल गया.

शांत धरती से
अचानक आकाश चूमते
धूल भरे बवंडर उठे
फिर रंगीन किरणों में बदल
धरती पर बरस कर शांत हो गए.

तभी किसी
बांस के बन में आग लग गयी
पीली लपटें उठने लगीं,
फिर धीरे-धीरे हरी होकर
पत्तियों से लिपट गयीं.

पूरा वन असंख्य बांसुरियों में बज उठा,
पत्तियाँ नाच-नाचकर
पेड़ों से अलग हो
हरे तोते बन कर उड़ गयीं.

लेकिन भीतर कहीं बहुत गहरे
शाखों में फंसा
बेचैन छटपटाता रहा
एक बारहसिंहा.

सारा जंगल कांपता हिलता रहा

लो वह मुक्त हो
चौकड़ी भरता
शून्य में विलीन हो गया
जो धमनियों से
अनंत तक फैला हुआ है.


1. राग भैरव -रवि के करम है रे  
2. राग  शिवमत भैरव -अरी ए री माल  
3. राग  भावमत भैरव- कंथा रे  जानू रे  जानू   

2 comments:

Ashok Pande said...

बेहतरीन पेशकश मृत्युंजय! सुन्दर! अति सुन्दर!

बाबुषा said...

सुन्दर.