9/27/11

संगीतकार और कवि- 2

  भीमसेन जोशी, अली अकबर खान और मंगलेश डबराल   


(4 फरवरी , 1922 - 24, जनवरी  2011)



















वैसे तो कलाओं के आपसी समबन्धों पर बात करने वाले  आलिमों की कोई कमी नहीं, पर कभी आपको मौक़ा मिले तो इनको महसूस करिए. ये एक अद्भुत दुनिया है, जहां दो अपने-अपने फन के माहिर लोग एक दूसरे के गहरे रियाज, समझ और श्रम को सलाम पेश करते हैं. इस लिहाज से संगीत और कविता का अजुगत-अद्भुत नाता है.  शास्त्रीय संगीत से लेकर ग़ज़ल और कव्वाली गायकी तक ये सिलसिला पसरा है. इस श्रृंखला में मैं अपनी पसंद के कुछ फनकारों की आवाजाही को सामने रखने का जतन करूंगा. 

संगीतकार और कवि श्रृंखला में आज पेश है पंडित भीमसेन जोशी का गाया हुआ राग दुर्गा. इसको सुनते हुए हमारे समय के अद्भुत कवि मंगलेश जी ने एक कविता लिखी थी. कविता सिद्धांत के ब्लॉग बुद्धू-बक्सा पर दिखी तो याद आयी. सो आज वही कविता और जोशी जी की आवाज़ में राग दुर्गा. साथ ही सुनिए राग दुर्गा का एक नया रंग, उस्ताद अली अकबर खान के तारों से. अभी बहुत दिन नहीं हुए जब ये दोनों उस्ताद सशरीर हमारे बीच होते थे. उनकी याद का भी एक सुर इस प्रस्तुति का भाग हो, सोच यही रहा हूँ...


   राग दुर्गा  
 (भीमसेन जोशी के गाये इस राग को सुनने की एक स्मृति) 

  मंगलेश डबराल 

एक रास्ता उस सभ्यता तक जाता था
जगह-जगह चमकते दिखते थे उसके पत्थर
जंगल में घास काटती स्त्रियों के गीत पानी की तरह
बहकर आ रहे थे
किसी चट्टान के नीचे बैठी चिड़िया
अचानक अपनी आवाज़ से चौंका जाती थी
दूर कोई लड़का बांसुरी पर बजाता था वैसे ही स्वर
एक पेड़ कोने में सिहरता खड़ा था
कमरे में थे मेरे पिता
अपनी युवावस्था में गाते सखि मोरी रूम-झूम
कहते इसे गाने से जल्दी बढ़ती है घास

सरलता से व्यक्त होता रहा एक कठिन जीवन
वहाँ छोटे-छोटे आकार थे
बच्चों के बनाए हुए खेल-खिलौने घर-द्वार
आँखों जैसी खिड़कियाँ
मैंने उनके भीतर जाने की कोशिश की
देर तक उस संगीत में खोजता रहा कुछ
जैसे वह संगीत भी कुछ खोजता था अपने से बाहर
किसी को पुकारता किसी आलिंगन के लिए बढ़ता
बीच-बीच में घुमड़ता उठता था हारमोनियम
तबले के भीतर से आती थी पृथ्वी की आवाज़

वह राग दुर्गा थे यह मुझे बाद में पता चला
जब सब कुछ कठोर था और सरलता नहीं थी
जब आखिरी पेड़ भी ओझल होने को था
और मैं जगह-जगह भटकता था सोचता हुआ वह क्या था
जिसकी याद नहीं आयी
जिसके न होने की पीड़ा नहीं हुई
तभी सुनाई दिया मुझे राग दुर्गा
सभ्यता के अवशेष की तरह तैरता हुआ
मैं बढ़ा उसकी ओर
उसका आरोह घास की तरह उठता जाता था
अवरोह बहता आता था पानी की तरह.


1 comment:

बाबुषा said...

बढ़िया सीरीज शुरू की है आपने..जारी रखिये.