9/20/11

सारंगी, सरोद और तबला

संगीत में स्वर के समानांतर भी वाद्य हमेशा रहे आये हैं. वे शब्दों के साथ भी रहे,  पर  कभी उनके   मुहताज बन कर  नहीं रहे. यहाँ तक कि प्राचीन मिथकों में भी वाद्य अपनी अलग पहचान के साथ खड़े हैं. मुरलीधर कृष्ण आदि अनेक रूप इस  बात की पुष्टि करते हैं. शब्दों से अलग यह  ध्वनियाँ आदि-ध्वनियों को विकसित करती, संवारती चली आयी है.

आइये आज सुनिए अपने-अपने  इलाके के सिरमौर तीन बड़े उस्तादों से-

सारंगी, सरोद और तबला   























सारंगी
पंडित रामनारायन  
(राग मारूं बिहाग, तीन ताल)
सरोद 
उस्ताद अमजद अली खान 
(राग जिला काफी)
तबला
पंडित समता प्रसाद  
(झपताल)

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