9/25/11

संतो ! सहज समाधि भली... प्रणय कृष्ण

सम्मान के बहाने अमरकांत जी के रचना-कर्म पर एक टीप -प्रणय कृष्ण 

 सादगी बड़ी कठिन साधना है. अमरकांत का व्यक्तित्व और कृतित्व, दोनों ही इसका प्रमाण है. अमरकांत के जीवन संघर्ष को कोइ अलग से न जाने, तो उनके सहज, आत्मीय और स्नेहिल व्यवहार से शायद ही कभी समझ पाए की इस सहजता को कितने अभावों, बीमारियों, उपेक्षाओं और दगाबाजियों के बीच साधा गया है. आत्मसम्मान हो तो आत्मसम्मोहन, आत्मश्लाघा और आत्मप्रदर्शन की ज़रुरत नहीं पड़ती. मुझे लगता है की 16 साल की उम्र में बलिया के जिस बालक ने कालेज छोड़ जे. पी.- लोहिया- नरेन्द्रदेव के नेतृत्व वाले 'भारत छोडो आन्दोलन' में कूद पड़ने का निर्णय लिया था, वह बालक अभी भी अमरकांत में ज़िंदा है.

जिस रचनाकार की 2-3 कहानियां भी दुनिया के किसी भी महान कथाकार के समकक्ष उसे खडा करने में समर्थ हैं, ('दोपहर का भोजन', 'डिप्टी कलक्टरी ', ज़िन्दगी और जोंक' या कोई चाहे तो अन्य कहानियां भी चुन सकता है), उसे उपेक्षा की मार पड़ती ही रही. ये उनके छोटे बेटे अरविन्द और बहू रीता का ही बूता था कि अपनी स्वतंत्र ज़िंदगी छोड़ उन्होंने हिन्दी समाज के इस अप्रतिम कथाकार को हमारे बीच भौतिक रूप से बनाए और बचाए रखा है. अमरकांत भारतीय जीवन की विदूपताओं, उसकी घृणास्पद तफसीलों में बगैर किसी अमूर्तन का सहारा लिए अपनी ठेठ निगाह जितनी देर तक टिका सकते हैं, उतना शायद ही कोइ अन्य प्रेमचंदोत्तर कथाकार कर पाया हो. उनका कथाकार भीषण रूप से अमानवीय होती गयी स्वातंत्र्योत्तर भारत की परिस्थितियों के बीच बगैर भावुक हुए, बगैर किसी हाहाकार का हिस्सा बने पशुवत जीवन जीने को अभिशप्त किरदारों के भीतर भी इंसानियत की चमक को उभार देता है. अमरकांत साबित कर देते हैं कि इसके लिए किन्ही बड़े आदर्शों का चक्कर लगाना ज़रूरी नहीं, बल्कि जीवन खुद ऐसा ही है. जीवन से ज़्यादा विश्वसनीय कुछ और नहीं. 

'ज़िंदगी और जोंक' का रजुआ एक असंभव सा पात्र है लेकिन पूरी तरह विश्वसनीय. हम आप भी रजुआ को जीवन में देखे हुए हैं, लेकिन उसके जीवन और चरित्र की जटिलताओं में जब हम अमरकांत की लेखनी की मार्फ़त प्रवेश करते हैं, तब हमारे सामने एक असंभव सा जीवन प्रत्यक्ष होता है, मानवता के सीमान्त पर बसर की जा रही ज़िंदगी सहसा हमारे बोध में दाखिल होती है. विश्वनाथ त्रिपाठी ने ठीक ही लिखा है कि अमरकांत 'कफ़न' की परम्परा के रचनाकार हैं. 'ज़िंदगी और जोंक' के रजुआ का 'करुण काइयांपन' घीसू-माधो के काइएपन की ही तरह उसकी असहायता की उपज है. ये कहानी उस अर्द्ध औपनिवेशिक और मज़बूत सामंती अवशेषों वाले भारतीय पूंजीवादी व्यवस्था पर चोट है जिसने गरीब आदमी को पशुता के स्तर पर जीने को मजबूर कर रखा है, जिसका ज़िंदा बचा रहना ही उसकी उपलब्धि है, जिसकी जिजीविषा ने ही उसे थेथर बना दिया है, जिसका इस समाज में होना ही व्यवस्था पर करारा व्यंग्य भी है और उसकी अमानवीयता का सूचकांक भी.

अमरकांत विडम्बनाओं और विसंगतियों को जिस भेदक व्यंग्य के साथ प्रकट करते हैं, वह दुर्लभ है. वे जिस बहुविध द्वंद्वों से घिरे समाज के कथाकार हैं, उसकी जटिल टकराहटों में निर्मित किरदारों और जीवन व्यापार को वे ऐसी सहजता से पेश करते हैं कि कोइ धोखा खा जाए.पशु-बिम्बों में अंकित अनगिनत मानवीय भंगिमाएँ, कहानियों की निरायास प्रतीकात्मकता, माहौल को सीधे संवेद्य बनाने वाली बिलकुल सामान्य जीवन-व्यवहार से ली गईं नित नूतन उपमाएं, जनपदीय मुहावरों और कथन -भंगिमाओं से भरी, सहज और खरी चलती हुई ज़बान, अद्भुत सामाजिक संवेदनशीलता और मनोवैज्ञानिक गहराई से बुने गए तमाम दमित तबकों से खड़े किए गए उनके अविस्मर्णीय चरित्र, समाज और दुनिया को आगे ले जानेवाली बातों और भाव-संरचनाओं का गहरा विवेक उनके कथाकार की विशेषता है. रजुआ, मुनरी, मूस, सकलदीप बाबू , 'इन्हीं हथियारों से' की बाल-वेश्या ढेला, सुन्नर पांडे की पतोह, 'हत्यारे ' कहानी के दो नौजवान, बऊरईया कोदो खानेवाला गदहा जैसे अनगिनत अविस्मर्णीय और विश्वसनीय किरदारों के ज़रिए अमरकांत ने हमारे समाज की हजारहा विडंबनाओं को जिस तरह मूर्त किया है, वह सरलता के जटिल सौन्दर्यशास्त्र का प्रतिमान है. उत्तरवादी और अन्तवादी घोषणाओं के नव-साम्राज्यवादी दौर में भी अमरकांत के यथार्थवाद को विकल्पहीनता कभी क्षतिग्रस्त न कर सकी. इसका प्रमाण है 2003 में प्रकाशित उनका उपन्यास 'इन्हीं हथियारों से' जो सन 1942  के 'भारत छोडो आन्दोलन' की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है.

प्रगतिशील आन्दोलन के 75 वें साल में अमरकांत को यह सम्मान मिलना एक सुखद संयोग है. ज्ञानपीठ से सम्मानित हिंदी के अन्य मूर्धन्य साहित्यकारों का प्रगतिशील आन्दोलन से वैसा जीवन भर का सम्बन्ध नहीं रहा जैसा की अमरकांत का. अमरकांत को जितने सम्मान, पुरस्कार मिले हैं, उनकी कुल राशि से ज़्यादा उनके जैसे व्यापक रूप से पढ़े जाने वाले लेखक की रायल्टी बनती थी, जिसे देना उनके प्रकाशकों को गवारा न हुआ. पिछले 15 सालों से हमने अमरकांत को कम से कम तीन किराए के मकानों में देखा है. दो कमरों से ज़्यादा का घर शायद ही उन्हें मयस्सर हुआ हो.

'इन्ही हथियारों से' का एक अदना सा पात्र कहता है," बड़ी-बड़ी बातें, बड़े-बड़े सिद्धान्त सिर्फ व्यवहार से ही सार्थक और सहज हो सकते हैं, जिसके बिना जीवन से ही रस खींचकर गढ़े हुए सिद्धान्त,जीवन से अलग होकर बौने और नाकाम हो जाते हैं." अमरकांत का जीवन और रचना-कर्म खुद इस की तस्दीक करता है. काश ! हिन्दी के प्रतिष्ठान चलाने लोग अमरकांत होने के इस अर्थ को समझ पाते !

1 comment:

anurag vats said...

bhai, aapne amarkant ji ke lekhan kii khoobiyon ko, unki katha-jagat men maujoodgi ko tatha unke jeewat ko bahut kam shabdon men rekhankit kar diya. unki kai kahaniyan mujhe bhi atyant priy hain.