9/29/11

गुरुशरण जी को जसम की श्रद्धांजलि

  क्रांतिकारी नाट्यकर्मी और 
जन संस्कृति मंच के संस्थापक अध्यक्ष गुरुशरण सिंह नहीं रहे  

28 सितम्बर ,2011. बुधवार. 


संस्कृति की दुनिया में शहीद भगत सिंह की विरासत के वाहक पंजाब के विख्यात रंगकर्मी गुरुशरण सिंह आज नहीं रहे. वे उम्र के 82 साल पूरे कर चुके थे. भगत सिंह उनके सबसे बड़े प्रेरणा-स्रोत थे और उनके जीवन और सन्देश को वे लगातार अपने नाटकों में जीवंत ढंग से प्रस्तुत करते रहे. ये भी अजब संयोग है क़ि उनका निधन आज 28 सितम्बर को हुआ जो शहीद-ए-आज़म का जन्मदिवस है. आज चंडीगढ़ में उनका निधन हुआ और दोपहर बाद उनकी अंत्येष्टि संपन्न हुई. उनकी अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में आम नागरिक और संस्कृतिकर्मी शामिल थे. शोक सभा इतवार को होगी. परिवार में उनकी पत्नी और दो बेटियाँ हैं.

महज १६ साल की उम्र में गुरुशरण सिंह ने कम्यूनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली और ता-उम्र कम्यूनिस्ट उसूलों पर कायम रहे. आज फोन पर जन संस्कृति मंच के साथियों से बात करते हुए गुरुशरण जी की बड़ी बेटी ने गर्व के साथ कहा क़ि उन्हें इस बात का हमेशा गर्व रहेगा क़ि उनके पिता ने कभी भी किसी सरकार के साथ कोइ समझौता नहीं किया, अपने उसूलों से कभी पीछे नहीं हटे. रसायन शास्त्र से एम.एस.सी. करने के उपरांत वे पंजाब सरकार के सिंचाई विभाग में रिसर्च आफिसर के पद पर नियुक्त हुए. इस पद पर रहते हुए उन्होंने भाखड़ा नांगल बाँध और दूसरी महत्वपूर्ण परियोजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 

यहीं काम करते हुए उन्होंने 1956 से अपनी क्रांतिकारी नाट्य-यात्रा शुरू की. जब वे नाटक करते तो उसमें बेटियों सहित उनका पूरा परिवार भाग लेता. देश-विदेश में उन्होंने हज़ारों प्रस्तुतियां कीं. बगैर साजो-सामान के जनता के बीच गावों, मुहल्लों, चौराहों और सडकों पर मामूली संसाधनों के साथ नाटक करना उनकी नाट्य-शैली का अभिन्न अंग था.सामंती शोषण, पूंजीवादी लूट और दमन तथा साम्राज्यवाद के विरोध में जन-जागरण इन नाटकों का मुख्य उद्देश्य होता. तमाम समसामयिक घटनाओं के सन्दर्भ भी मूलतः इन्हीं केन्द्रीय उद्देश्यों की पूर्ती के लिए उनके नाटकों में नियोजित रहते थे. 

गुरुशरण सिंह ने जनता के रंगमंच, आन्दोलनकारी और प्रयोगधर्मी थियेटर, ग्रामीण रंगमंच का पंजाब में उसी तरह विकास किया जैसा क़ि बादल सरकार ने बंगाल में. यह एक अखिल भारतीय प्रक्रिया थी जो देश में आमूलचूल बदलाव के लिए चल रहे जन-संघर्षों के साथ संस्कृतिकर्मियों द्वारा कंधे से कंधा मिलाकर चलने के संकल्प से उपजी थी. जिस तरह बादल सरकार मूल कर्मभूमि बंगाल होने के बावजूद कभी बंगाल तक सीमित नहीं रहे, वैसे ही गुरुशरण सिंह भी कभी पंजाब तक महदूद नहीं रहे. यही कारण था क़ि प्रधानतः हिंदी-उर्दू क्षेत्र के संगठन जन संस्कृति मंच के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही और वे दिल्ली में अक्टूबर 1985 में सम्पन्न हुए उसके स्थापना सम्मलेन में संस्थापक अध्यक्ष बनाए गए. क्रांतिकारी कवि गोरख पाण्डेय महासचिव चुने गए. 

गुरुशरण सिंह और अवतार सिंह 'पाश' ऐसे क्रांतिकारी संस्कृतिकर्मी थे जिन्होनें 1980 के दशक में अलगाववादी आन्दोलन में सुलगते पंजाब में पूरी निर्भीकता के साथ गाँव- गाँव जाकर भगत सिंह के सपनों , भारतीय क्रान्ति की ज़रुरत, समाजवाद की ज़रुरत, सामंती शोषण और साम्राज्यवाद के विरोध की आवाज़ को बुलंद किया. 'पाश' इसी प्रक्रिया में शहीद हुए.

गुरुशरण जी ने राजनीति में सक्रिय भूमिका से भी कभी गुरेज़ नहीं किया. 'पंजाब लोक सभ्याचार मंच' और 'इंकलाबी मंच ,पंजाब' के तो वे संस्थापक ही थे. इंडियन पीपुल्स फ्रंट की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् के सदस्य रहे. भाकपा (माले) के बहुत करीबी हमदर्द रहे और लगातार उसके कार्यक्रमों में सरगर्मी से शिरकत करते रहे. वे सांस्कृतिक मोर्चे पर भी महज कलाकार नहीं, बल्कि एक सम्पूर्ण और समर्पित संस्कृतिकर्मी की भूमिका में रहे. अपने अभिन्न मित्र बलराज साहनी की याद में उन्होनें 'बलराज साहनी यादगार प्रकाशन' की स्थापना कर सैकड़ों छोटी-बड़ी किताबों का प्रकाशन किया जिनकी कीमत बहुत ही कम हुआ करती थी. इन किताबों को वे अक्सर खुद अपने झोले से निकाल कर बेचा भी करते थे. उनके लिए कोइ काम छोटा या बड़ा नहीं था.

लम्बे समय से बीमार रहने के बावजूद गुरुशरण जी सदैव राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से सजग और अपने उद्देश्यों के लिए सचेष्ट रहे. पंजाबी और हिन्दी में उनके ढेरों नाटक जनता की स्मृति में अमर रहेंगे. 'इन्कलाब जिंदाबाद' या 'जन्गीराम की हवेली' जैसे उनके नाटक हिन्दी दर्शक भी कभी भूल नहीं सकते.

वे अपने सम्पूर्ण जीवन और संस्कृति-कर्म में जनवादी, खुशहाल और आज़ाद भारत के जिस सपने को साकार करने के लिए जूझते रहे, उसे ज़िंदा रखने और पूरा करने का संकल्प दोहराते हुए हम अपनी सांस्कृतिक धारा के जुझारू प्रतीक का. गुरुशरण सिंह को जन संस्कृति मंच की और से लाल सलाम पेश करते हैं.

(प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी )

1 comment:

रामाज्ञा शशिधर said...

एक जलती मशाल जो हमेशा अनेक रंगों और छवियों में अँधेरे समय से लड़ती रही,उस मशाल से जुड़ी और जली अन्य सभी मशालों की जिम्मेदारी है कि उस रौशनी को बनाये रखें.एक क्रन्तिकारी को ऐसे ही श्रद्धांजलि दी जा सकती है.