2/12/11

दो उस्तादों के सुरों में बसंत-बहार

सुनिए

'केतकी गुलाब जूही चम्पक बन फूले' और
'कलियन संग करत रंगरलियाँ'
पंडित भीमसेन जोशी से

और
'पिया संग खेलूँ होरी'
उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान से




2/10/11

कहें कवि दुर्गेंद्र अकारी...

(कविता के लिए जिन्होंने सब कुछ किया, पूरी जिन्दगी उसे दी, जनता ने उसे पाला पोसा, अपना बनाया और सर आँखों पर रखा. कहानी जैसी लगती इस बात के प्रमाण हैं दुर्गेन्द्र अकारी. उनसे दिलचस्प मुलाक़ात की सुधीर सुमन ने, यह रपट समकालीन जनमत से साभार) 

दुर्गेन्द्र अकारी 

पिछली गर्मियों में आरा पहुँचने पर मालूम हुआ कि जनकवि दुर्गेंद्र अकारी जी की तबीयत आजकल कुछ ठीक नहीं रह रही है। साथी सुनील से बात की, तो वे झट बोले कि उनके गांव चला जाए। उनकी बाइक से हम जून माह की बेहद तीखी धूप में अकारी जी के गांव पहुंचे। लोगों से पूछकर झोपड़ीनुमा दलान में हम पहुंचे, जिसकी दीवारें मिट्टी की थीं और छप्पर बांस-पुआल और फूस से बना था। एक हिस्से में दो भैंसे बंधी हुई थीं। दूसरे हिस्से में एक खूंटी पर अकारी जी का झोला टंगा था। एक रस्सी पर मच्छरदानी और कुछ कपड़े झूल रहे थे। दीवार से लगकर दो साइकिलें खड़ी थीं और बीच में एक खाली खाट, लेकिन अकारी जी गायब। हम थोड़े निराश हुए कि लगता है कहीं चले गए। फिर एक बुजर्ग शख्स आए। मालूम हुआ कि वे उनके भाई हैं। उन्होंने बताया कि अकारी गांव में ही हैं। खैर, तब तक एक नौजवान उन्हें पड़ोस से बुलाकर ले आया। उसके बाद उनसे हमने एक लंबी बातचीत की, जिसके दौरान हमें भोजपुर के क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास की झलक तो नजर आई ही, एक सीधे स्वाभिमानी गरीब नौजवान का संघर्षशील जनता का कवि बनने की दास्तान से भी हम रूबरू हुए।

जसम की ओर से 1997 में उनके चुनिंदा गीतों का एक संग्रह ‘चाहे जान जाए’ प्रकाशित हुआ था। उसकी भूमिका सुप्रसिद्ध स्वाधीनता सेनानी, कम्युनिस्ट और जनकवि रमाकांत द्विवेदी ‘रमता’ ने लिखा था कि बचपन के पितृ-विहीन अकारी ने हलवाही और मजदूरी की है, गीतों के कारण पुलिस और गुंडों के कठिन आघात झेले हैं और जेल भी काटी है। फिर भी वह संघर्ष की अगली कतार में ही हैं। प्रलोभनों को उन्होंने सदा ही ठुकराया है और गरीबी से उबरने की कोशिश न करके गरीबों को उबारने की कोशिश करते रहे हैं। सांस्कृतिक-राजनीतिक कार्यक्रमों के दौरान धोती कुर्ता पहने, कंधे में झोला टांगे ठेठ मेहनतकश किसान लगने वाले अकारी जी को गीत गाते तो हमने कई बार सुना-देखा : उनके गीतों की खास लय, जिसमें मौजूद करुणा, आह्वान और धैर्य के मिले-जुले भाव के हम कायल रहे.

‘मत कर भाई, तू बनिहारी सपन में’- इस गीत से उन्होंने अपने बारे में बताने की शुरुआत की। इस गीत को उन्होंने अपने ही गांव में एक रूपक की तरह मंच से प्रस्तुत किया था, जिसे सुनने के बाद हलवाहों ने हल जोतने से मना कर दिया था। चूंकि बनिहारों की पीड़ा को उस गीत में उन्होंने बड़ी प्रभावशाली तरीके से आकार दिया था, इसी कारण उनके नाम के साथ अकारी शब्द जुड़ गया। गीत का असर देखकर नौजवान अकारी का मन उसी में रमने लगा। इसी बीच नक्सलबाड़ी की चिंगारी भोजपुर में गिरी और उससे जुड़े सवाल और संघर्ष के मुद्दे इनके गीतों में आने लगे। वे सामंतों और सरकार के खिलाफ गीत लिखने लगे। उन्होंने चंवरी, बहुआरा, सोना टोला आदि गांवों में पुलिस-सीआरपीएफ से लोहा लेने वाले क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के बहादुराना प्रतिरोधों और उनकी शहादतों की घटना को अपने गीतों में पिरोया। उनकी पहली किताब का नाम था - जनजागरण। यह बताते हुए वे गर्व से भर उठे कि उनके गीतों को सुनकर लोगों का उत्साह बढ़ता था। जिस समय नक्सल का नाम सुनकर कोई अपने ओरी, छप्पर के किनारे भी नहीं ठहरने देता था, वैसी हालत में उन पर उन्होंने गीत लिखा।

हमने सवाल किया कि गीत लिखने के अलावा और क्या करते थे? उन्होंने कहा कि उनके लिए भी बड़ा गंभीर सवाल था कि जीविका के लिए क्या करें। किसी का नौकर बनके रहना उन्हें मंजूर न था। उसी दौरान उन्हें एक विचार आया कि मड़ई कवि की तरह किताब छपवाकर वे भी बेच सकते हैं। लेकिन मड़ई कवि से उन्होंने सिर्फ तरीका ही लिया, विषय नहीं लिया। मड़ई कवि सरकारी योजनाओं के प्रचार में गीत गाकर सुनाते थे, जबकि अकारी गीतों के जरिए सरकार की पोल खोलने लगे।

अकारी जी 74 के आंदोलन के साथ रहे। उन्होंने बताया- ‘जब इमरजेंसी लगा तो सब नेता करीब-करीब अलोपित हो गए। कुछ नेपाल की तराई में चले गए। हमको लगा कि इस तरह तो कहां क्या हो रहा है, इस बारे में कोई बातचीत ही नहीं हो पाएगी। तो उसी दौर में किताब छपवा के बेचने लगे ट्रेन में।’ उस वक्त का इनका एक मशहूर गीत था- 'बे बछरू के गइया भोंकरे, ओइसे भोंकरे मइया, बिहार तू त सून कइलू इंदिरा'। अपने गीतों के जरिए जनता पार्टी को वोट देने की अपील भी उन्होंने की और 74 के आंदोलन की जनभावना से गद्दारी करने वालों पर व्यंग्य भी किया-

'जनता जनता शोर भइल, जनता ह गोल भंटा हो
हाथ ही से तूरी ल, ना मारे पड़ी डंटा हो।'

अपनी पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछने पर अकारी जी ने बताया कि वे स्कूल नहीं गए। बुढ़वा पाठशाला में गए, पर वहां कुछ सीख नहीं पाए। एक दिन दलान पर लड़के पढ़ रहे थे तो उन्हीं से कहा कि भाई हमें भी कुछ पढ़ा दो। उन सबों ने एक टूटी स्लेट दी और उस दिन उन्होंने 'क' वर्ग के सारे अक्षर रात भर मे याद किए। इस तरह पांच-छह दिन में सारे अक्षरों को लिखना सीख गए। हमने पूछा कि अब तो किताब धड़ल्ले से पढ़ लेते होंगे, तो हंसते हुए बोले- पढ़ लेता हूं, पर ह्रस्व-इ और दीर्घ-ई अब भी समझ में नहीं आता।

शिक्षा के अभाव या शब्दों और भाषा के स्कूली ज्ञान के अभाव का जो सच था उसे भी उन्होंने एक तरह का ढाल बना लिया और अपने नाम के साथ एल एल पी पी लिखने लगे-दुर्गेंद्र अकारी, एल एल पी पी। उनके गीतों के पुराने संग्रहों में आज भी यही लिखा मिलता है। तो इस एल एल पी पी से जुड़ा एक किस्सा उन्होंने सुनाया कि एक बार जीआरपी वालों ने उन्हें पकड़ लिया। एक ने पूछा कि एल एल पी पी किसने लिखा है? अकारी बोले- हमने। उसने सवाल किया- इसका मतलब? अकारी- आप लोग पढ़े लिखे आदमी हैं अब हम क्या सिखाएं आपलोगों को। तो उसने कहा- इसका मतलब तो लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर होता है। अकारी बोले - वही है सर। उसने पूछा- गीत कैसे लिखते हो? अकारी के पास जवाब तैयार- क ख ग किसी तरह जोड़ के। फेयर किसी दूसरे से कराते हैं। उसमें से किसी ने कहा कि सिर्फ क ख ग के ज्ञान से इतना लिख पाना संभव नहीं है। उनमें एक बड़ा बाबू था, कुछ समझदार, उसने इनके इंदिरा विरोधी कुछ गीतों को सुना और कहा- समुद्र में बांध् बनाया जा सकता है, लेकिन कवियों के विचारों को बांध नहीं जा सकता। उसने यह भी कहा कि गीत तो आपका अच्छा है, पर यहां हमलोगों की जिम्मेवारी है। हमलोगों की बदनामी होगी। यहां मत गाइए-बजाइए। तो अकारी बोले- कहां जाएं, भाई? कचहरी पर जाते हैं, तो आप ही लोग हैं। बाजार में जाते हैं तो आप ही लोग हैं। यहां स्टेशन पर आते हैं, तो आप ही लोग हैं। हम मैदान में गाने के लिए गीत तो बनाए नहीं है। बड़ा बाबू बोला- नहीं मानिएगा, तो विदाउट टिकट में आपको पकड़ लेंगे।

विदाउट टिकट में तो अकारी जी नहीं पकड़े गए। लेकिन प्रलोभन और धमकी के जरिए उन्हें गीत लिखने से रोकने की कोशिश जरूर की गए। एक दिन वे आरा रेलवे स्टेशन पर किताब लेके पहुंचे तो वहां असनी गांव के कामेश्वर सिंह से मुलाकात हुई। अकारी ने बताया कि कामेश्वर सिंह उस तपेश्वर सिंह के भाई थे, जिन्हें सत्ता और प्रशासन के लोग बिहार के सहकारिता आंदोलन का नायक बताते हैं और आम लोग को-आपरेटिव माफिया। कामेश्वर सिंह ने अकारी से कहा कि वे किताब बेचना छोड़ दें। वे उनको नौकरी दिला देंगे। अकारी बोले- नौकरी तो नौकरी ही होती है। नौकर की तरह ही रहना होगा। लेकिन हमने जो किताब छपवाई है वह नौकर बनकर नहीं छपवाई है। इससे कम या ज्यादा पैसा भी आ रहा है। कामेश्वर सिंह ने कहा कि कुछ हो जाएगा तब? कोई घटना घट जाएगी तब? अकारी के पास सटीक जवाब था- होगा तो होगा, किसी भी काम में कुछ हो सकता है। कामेश्वर सिंह चिढ़कर बोले- तुम चंदबरदाई नहीं हो न! अकारी कहां चुप रहने वाले थे,पलट कर जवाब दिया- एक चंदबरदाई हुए तो आप गिन रहे हैं, यहां इस धरती ने आदमी आदमी को चंदबरदाई बनाके पैदा किया है। कामेश्वर सिंह थोड़े सख्त हुए- इसका मतलब कि तुम किताब बेचना नहीं छोड़ोगे? तो इसका परिणाम तुम्हें पता चलेगा? अकारी- ठीक है हम जान-समझ लेंगे।

उसके दो चार दिन बाद ही जब आरा स्टेशन पर एक चाय की दूकान के पास लोगों की फरमाइश पर अकारी 'चंवरी कांड' पर लिखा अपना गीत सुना रहे थे, तभी कामेश्वर सिंह का भेजा हुआ एक बदमाश साइकिल से वहां पहुंचा। वह दारु पिए हुए था। आते ही बोला- भागो यहां से। अकारी बोले- क्या बात है भाई। बदमाश उन पर चढ़ बैठा- पूछता है कि क्या बात है? यहां से जाओ। अकारी ने शांति से काम लिया- हम ठहरने के लिए नहीं आए हैं, दो-चार मिनट में हम खुद ही चले जाएंगे। तब तक वह उनके बगल में आ गया। अकारी ने चौकी पर से उतर कर उससे पूछा कि यह रोड आपका है? उसने कहा- हां, है। अकारी बोले- नहीं, जितना आपका हक़ है, उतना ही हमारा भी हक़ है, उतना ही सबका है। इस पर उसने उन्हें धकेल दिया। वे पीछे रखी साइकिलों पर गिरे। इस बीच वह जनसंघ समर्थक एक गुमटी वाले से हंटर मांगने गया, उसने हंटर के बदले फरसा दे दिया। फरसा लेकर वह आया और सीधे अकारी पर वार कर दिया। अपना सर बचाने की कोशिश में उन्होंने अपने हाथ उठाए। इसी बीच उसी चौकी पर बैठा एक साधु अचानक उठा और उसने अपनी कुल्हाड़ी पर फरसे के वार को रोक लिया। तब तक दूसरे लोग भी बीच बचाव में आ गए। जनता ने कहा कि कवि जी आप यहां से हट जाइए, वह गुंडा है। इस पर अकारी गरम हो गए, बोले कि वह गुंडा नहीं है, यही उसका रोजगार है, जिसका खाया है उसकी ड्यूटी में आया है। खैर, गुंडा गुंडई कर रहा हो, इंसान बेइज्जत हो रहा हो, पब्लिक देख रही हो, तो गलती किसकी है? यह सुनना था कि लोग उसे पकड़ने के लिए उठ खड़े हुए। लोगों का मूड बदलता देख, वह साइकिल पर सवार होके वहां से भाग गया। अकारी उसके बाद लगातार एक माह तक वहां जाते रहे, ताकि उसे यह न लगे कि वे डर गए, लेकिन वह फिर उन्हें नजर नहीं आया।

अकारी जी ने बताया कि वे नक्सल आंदोलन के पक्ष में गीत लिखते थे, कार्यकर्ता उनको पहचानते थे, लेकिन उनसे अपना राज खोलना नहीं चाहते थे। एक कारण यह भी था कि वे लोकदल के एक स्थानीय नेता राम अवधेश सिंह के साथ थे। राम अवधेश सिंह के साथ होमगार्ड, दफादार-चैकीदार के आंदोलन में जेल भी गए। लेकिन बाद में लोकदल उन्होंने छोड़ दिया। हुआ यह कि सेमेरांव नामक एक गांव में लड़कों का एक मैच हो रहा था। अकारी जी वहां पहुंचे तो लड़कों ने किताब के लिए भीड़ लगा दी। वहीं एक पुलिस कैंप था। वहां से एक सिपाही आया और एक किताब मांगकर चलता बना। इन्होंने पैसा मांगा तो उसने कहा- आके ले जाओ। ये पुलिस कैंप में गए तो सिपाहियों ने कहा- एक और किताब दो। इन्होंने एक और किताब दे दी। उसके बाद उन सबों ने कहा- जाओ भागो। इन्होंने कहा- क्यों भाई, पइसा दीजिए या किताब लौटाइए। एक सिपाही ने कहा कि भागोगे कि करोगे बदमाशी। नहीं माने तो पुलिस ने मारकर इनका पैर तोड़ दिया। उस वक्त इनकी उम्र करीब 25-30 के आसपास थी। चूंकि राम अवधेश सिंह को चुनाव में जिताने के लिए इन्होंने बहुत काम किया था इसलिए उनको खबर भेजी ,लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया। राम अवधेश सिंह का तर्क था कि इन्होंने बयान नहीं लिखवाया इसीलिए कुछ नहीं हुआ। अकारी जी का कवि अपनी जिद पर अड़ा रहा कि बयान क्या होता है, उस पर एक गीत लिखा था - 'टूटल टंगरी अकारी देखावे, ई तोड़ी निदर्दी आरक्षी कहावे', कहा वही बयान है। उसके बाद रामअवधेश सिंह ने कहा कि वे कर्पूरी ठाकुर से इस बारे में बात करेंगे। अकारी ने मना कर दिया कि कर्पूरी ठाकुर के पास उनके लिए वे न जाएं, वे खुद चले जाएंगे। खैर, कर्पूरी ठाकुर से जब मिले तो उन्होंने पूछा कि क्या हुआ कवि जी? कवि जी ने अपने ऊपर जुल्म की दास्तान कह सुनाई और उलाहना दे डाला कि आपकी सरकार में पुलिस ने पैर तोड़ दिया, केस नहीं हुआ तो क्या उसे कोई सजा नहीं होगी? आखिरकार कार्रवाई हुई और दो पुलिसकर्मी मुअत्तल हुए। लेकिन अकारी लोकदल में नहीं लौटे। रामअवधेश सिंह ने भी नौकरी का प्रलोभन भी दिया। लेकिन अब तो वे अपने गीतों के नायकों की राजनीतिक राह पर खुद ही चल पड़े थे।

लोकदल छोड़कर वे एक माह घर बैठे रहे। उसी दौरान भाकपा माले के कामरेडों ने उनसे संपर्क किया। इसके बारे में भी उन्होंने एक रोचक घटना सुनाई कि कामरेडों का आना-जाना मुखिया और सामंतों की निगाह से छुपा न रहा। मुखिया ने दलपति को समझाने भेजा कि यह खराब काम हो रहा है। दलपति से इन्होंने सवाल किया कि क्या खराब काम हो रहा है? उसने कहा- नक्सलाइट आ रहे हैं। अकारी बोले- तुम्हारे यहां कोई आता है कि नहीं? दलपति ने कहा- आते हैं, पर वे दूसरे आदमी होते हैं। अकारी कहां चुप रहने वाले थे, बोले- बताओ उनलोगों ने कौन सा खराब काम किया है, मुझे भी तो जरा पता चले? इसपर दलपति चीढ़कर बोला- तो भाई नहीं मानिएगा, तो हम गिरफ्तार करवा देंगे। अकारी ने चुनौती दे दी कि उसको गिरफ्तार कराना है, करा ले, लेकिन यह जान ले कि उसके साथ उन्हें भी जो करना होगा, कर देंगे। यह चेतावनी मुखिया तक पहुंची और मुखिया से थाना के दारोगा तक। दारोगा ने एक पट्टीदार से जमीन के एक मामले में एक केस करवा दिया और चैकीदार से इनको थाने पर बुलवाया। बाद में दारोगा खुद आया और उसने लोगों से कहा- हम इसको बुलाते हैं तो यह मुझे ही बुलाता है। अकारी निर्भीकता के साथ बोले- आपको जरूरत है तो आपको आना ही चाहिए। खैर, केस गलत था, सो थाने से ही मामला खत्म हो गया।

वैसे आंदोलनों में तो थाना, केस, जेल का चक्कर लगा ही रहता है। लेकिन 2009 में तो अकारी जी को 43 दिन बिना केस के जेल में रहना पड़ा। कारण यह था कि पुलिस गांव में किसी और को पकड़ने आई थीं। इनसे दरवाजा खोलवाने लगी। इन्होंने चोर-चोर का हल्ला मचा दिया। हल्ला से हुआ यह कि जिन लोगों को पकड़ने पुलिस आई थी वे भाग गए। उसके बाद गुस्से में पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। इन्हें समझ में नहीं आया कि किस केस में जेल में डाला गया है। कोई वारंट और बेलटूटी भी नहीं थी। आखिरकार 43 दिन बाद जज ने रिलीज भेजा। जेलर बेल बांड मांगने लगा। अकारी जी बोले- जब केस ही नहीं पता तो बेल कैसे फाइल करते। बाद में जज के रिलीज आर्डर पर इन्हें छोड़ा गया। हमने यहीं उनसे जेल जीवन की कठिनाइयों पर लिखे गए उनके लोकप्रिय गीत को सुनाने का आग्रह किया। उन्होंने सुनाया-


हितवा दाल रोटी प हमनी के भरमवले बा
आगे डेट बढ़वले बा ना।

जाने कब तक ले बिलमायी, हितवा देवे ना बिदाई
बिदा रोक रोक के नाहक में बुढ़ववले बा। आगे डेट...

बीते चाहता जवानी, हितवा एको बात ना मानी
बहुते कहे सुने से गेट प भेट करवले बा। आगे डेट...

बात करहु ना पाई देता तुरूते हटाई
माया मोह देखा के डहकवले बा। आगे डेट...

देवे नास्ता में गुड़ चना, जरल कच्चा रोटी खाना
बोरा टाट बिछाके धरती प सुतवले बा। आगे डेट...

गिनती बार बार मिलवावे, ओसहीं मच्छड़ से कटवावे
भोरे भरल बंद पैखाना प बैठवले बा। आगे डेट...

एको वस्त्रा ना देवे साबुन, कउनो बात के बा ना लागुन
नाई धोबी के बिना भूत के रूप बनवले बा। आगे डेट...

कवि दुर्गेंद्र अकारी, गइलें हितवा के दुआरी
हितवा बहुत दिन प महल माठा खिअइले बा। आगे डेट....

हमने उनसे पूछा कि इतने लंबे अरसे से वे जनता के लिए गीत लिखते रहे, अब उम्र के इस मुकाम पर क्या महसूस होता है? उन्होंने इसे लेकर फ़िक्र जाहिर की कि आंदोलन हुए, उससे लोग लाभान्वित भी हुए, संघर्ष किए, कुछ मिला। लेकिन फिर उन्हें परेशानी होने लगी। परेशानी से बचने के लिए लोग किसी तरह जीने-खाने की कोशिश करने लगे हैं। यही जीने का ढंग बनने लगा है। जो ठीक नहीं है। हमने कहा कि संघर्ष भी तो हमेशा एक गति से और एक तरीके से नहीं चलता। आज जनता का आंदोलन कैसे मजबूत होगा, संस्कृति के क्षेत्र में काम करने वाले क्या करें? संस्कृति में तो ऊर्जा आंदोलन से ही मिलती है। आंदोलन जितना जनहित में होगा, उतनी संस्कृति भी जनहित में बढ़ेगी, क्रांतिकारी रूप में बढ़ेगी। हमने सवाल किया कि कवि भी तो कई बार आंदोलन को ऊर्जा देते हैं। जब आंदोलन में उभार न हो, उस वक्त कवि क्या करे, क्या आंदोलन का इंतजार करे? अकारी बोले- नहीं, कवि कभी-कभी माहौल को देखते हुए कुछ ऐसा निकालता है कि जिससे माहौल बदल जाता है।

हमने पूछा कि उनके राजनीतिक-सांस्कृतिक सफर में कौन से ऐसे साथी थे, जिनकी उन्हें बहुत याद आती है। इस पर उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया। कहा कि जितने साथी लगे थे या आज भी लगे हैं सब अपनी ऊर्जा लेके लगे हैं, जिनसे जितना हुआ उसने जनता के लिए उतना काम किया और आज भी कर रहे हैं। हमने कहा कि सारी पार्टियां अपने को गरीबों का हितैषी कहती हैं, लेकिन गरीबों की ताकत को बांटने की साजिश में ही लगी रहती हैं। आज के दौर में गरीब के पक्ष में कोई राजनीति या संस्कृति किस तरह काम करे कि उसकी एकजुटता बढ़े। उन्होंने जवाब दिया कि उन्हें तो यही समझ में आया कि सारी पार्टियां वर्ग की पार्टी होती हैं। वे अपने अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं। गरीब के पक्ष में बोलने वाली बाकी पार्टी सिर्फ अपना मतलब साधने के लए गरीब का नाम लेती है। सिर्फ माले है जिसके लिए गरीब मतलब साधने की चीज नहीं, बल्कि गरीबों की पक्षधरता उसका सिद्धांत ही है। जबकि कांग्रेस सामंत-पूंजीपति की पार्टी है और भाजपा इस मामले में उससे भी आगे है, ज्यादा उद्दंड है।

उस वक्त बिहार में चुनाव हुए नहीं थे। हमने उनसे नीतीश के सरकार के बारे में पूछा और सड़कों की हालत में सुधार के दावे पर उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही। उन्होंने बड़ी दिलचस्प प्रतिक्रिया दी- गरीब आदमी के हित में सड़क थोड़े है। गरीब आदमी को कभी कभार कहीं जाना होता है, तो वह गाड़ी से जाए या पैदल जाए, उसके लिए बहुत फर्क तो पड़ता नहीं। हां, बड़ा-बड़ा पूंजीपति का कारोबार चले, इसके लिए तो सड़कें जरूरी हैं ही। बंटाईदारी के बारे में पूछने पर बोले कि यह भूमि सुधर से जुड़ा सवाल है। हमने कहा कि इसे लेकर बहुत कन्फ्यूजन फैलाया गया है, एकदम छोटे किसानों को भी शासकवर्गीय पार्टियां डरा रही हैं कि उनकी जमीन छीन जाएगी। हमने पूछा कि इस मुद्दे पर आंदोलन की कोई संभावना लगती है आपको? अकारी बोले कि भूमि सुधार तो तभी पूरी तरह से हो पाएगा, जब बिहार में वामपंथ का शासन आएगा। क्या यह संभव है? क्या जीवन का लंबा समय गरीबों की मुक्ति और गरीबों का राज कायम करने के संघर्षों में लगा देने के बाद उम्र के आखिरी दौर में कोई उम्मीद लगती है या निराश हैं कुछ- यह सवाल करने पर अकारी थोड़ी देर चुप रहे और बड़ी गंभीरता से बोले कि अभी दो-चार चुनाव और लगेगा। हमने फिर सवाल दागा कि क्या फिर लालू, रामविलास या नीतीश जैसे लोग नहीं आ जाएंगे? इस पर अकारी बोले- आएंगे, लेकिन विक्षोभ पैदा हो रहा है। इनमें कोई भी जनहित में काम करने वाला नहीं है, ये सब अंततः सामंत और पूंजीपति का हित ही साधेंगे।


वापस लौटते वक्त सुनील की बाइक का टायर पंक्चर हो गया था। सुनील टायर ठीक करवाने आगे बढ़ गए थे। झुलसाती धूप में मैं उस राह पर चल रहा था, अकारी जी के बारे में सोचते हुए। उन्होंने बताया कि उनकी किताबें खूब बिकती थीं। बनारस में एक रैली में 1800 की किताबें बिक जाने को वे अपने जीवन की किसी महत्वपूर्ण घटना की तरह याद रखे हुए हैं। जहां पैसा और सुविधएं ही जीवन की श्रेष्ठता का पैमाना बनती जा रही हों, वहां इस 1800 की कीमत जो समझेगा, शायद वही इसके प्रतिरोध में नए जीवन मूल्य गढ़ पाएगा। हां, बेशक अकारी जी धरा के खिलाफ चलते रहे हैं, जब लालू चालीसा लिखा जा रहा था तो उन्होंने लालू चार सौ बीसा लिखा। प्रलोभनों को ठुकराया और लुटेरों और शोषकों को पहचानने में कभी नहीं चूके। गांव में विभिन्न जातियों के यहां चोरी की घटना पर ‘बताव काका कहवां के चोर घुस जाता’ से लेकर बोफोर्स घोटाले पर ‘चोर राजीव गांधी, घूसखोर राजीव गांधी’ जैसे गीत लिखे। जब छोटी रेलवे लाइन बंद हुई, तो उस पर बड़े प्यार से जो गीत उन्होंने लिखा- 'हमार छोटको देलू बड़ा दिकदारी तू' वह जनजीवन के प्रति गहरे लगाव का सूचक है। उनके गीत कहत ‘अकारी बिहार मजदूर पर, सहत बाड़ ए भइया कवना कसूर पर’ की गूंज तो देश के बाहर भी गई। अकारी जी हमारे बीच हैं, यह बड़ी बात है। उनके गीतों में भोजपुरी के कई दुलर्भ शब्द हैं और इंकलाब के प्रति एक धैर्य भरी उम्मीद है। उनके गीतों में जो लड़ने की जिद है, चाहे जान जाए, पर चोर को साध् कहने और साध् को चोर कहने वाली इस व्यवस्था को बदल देने का जो उनका संकल्प है, उसे सलाम!





सुधीर सुमन, युवा आलोचक, कथा आलोचना में गहरी दिलचस्पी, समकालीन जनमत के सम्पादक मंडल में, फिलहाल में दिल्ली में रहते हैं.

2/9/11

वसंत बरास्ते विद्यापति - नागार्जुन



सरस बसंत समय भल पाओल दखिन पवन बह धीरे.
सपनहुं रूप बचन एक भाखिए मुख सओं दुरि करि चीरे..

तोहर बदन सम चाँद होअथि नहीं जईओ जतन बिहि देला.
कए बेरि काटि बनाओल नव कए तईओ तुलित नहीं भेला..

लोचन तूल कमल नहीं भए सक से जग के नहीं जाने.
से फेरि जाए नुकाएल जल भये पंकज निज अपमाने..

भनइ विद्यापति सुनु बर जौबति ई सभ लछमी समाने.
राजा सिबसिंग रूपनराएन लखिमा देहि रमाने..


सुन्दरी! तुम्हारा रूप मेरे लिए सपना हो गया है. घूंघट हटा लो, अपने श्रीमुख से एकाध बोल निकालो न! मैं कब से तरस रहा हूँ.

यह कितना अच्छा अवसर मिला है! रसमय बसंत सामने है. दक्षिण पवन हौले-हौले बह रहा है. घूंघट हटा लो न!

विधाता ने बड़ी तरकीब भिडाई, बड़े यत्न किये. फिर भी चाँद को तुम्हारे मुंह की तरह नहीं बना पाया! कई बार उसने चाँद की काट-छांट की, नए सिरे से कई बार उसने चाँद को गढ़ा, फिर भी चाँद तुम्हारे मुख की तुलना में पूरा नहीं उतरा!

कौन नहीं जानता की कमल तुम्हारी आँखों की बराबरी नहीं कर पाया? बेचारे कमल को ऐसी ग्लानि हुई कि जाकर पानी के अन्दर छुप गया.

विद्यापति ने कहा- सुन्दरी, मेरी बात सुनो. तुम साक्षात लक्ष्मी हो. रूपनारायण राजा शिवसिंह और रानी लखिमा देवी प्रसन्न रहें.

(पद विद्यापति पदावली से और अनुवाद बाबा नागार्जुन द्वारा)

2/8/11

वसंत - रघुवीर सहाय


यह उदास मौसम
और मन में कुछ टूटता सा

अनुभव से जानता हूँ
वसंत है

रघुवीर सहाय

2/5/11

हिन्दी-उर्दू का दोआब (शमशेर की आलोचना दृष्टि पर गोपाल प्रधान)


हमारी ही हिन्दी, हमारी ही उर्दू...

वैसे तो शमशेर का समूचा गद्य आलोचकों का ध्यान आकर्षित करता रहा है लेकिन उसका अधिकांश आलोचनात्मक लेखन ही है। शमशेर जी प्रेमचंद के बाद हिंदी के ऐसे दूसरे बड़े लेखक हैं जिनका गहरा दखल हिंदी के साथ ही उर्दू साहित्य में भी था । उनका अपना विशिष्ट क्षेत्र कविता है इसलिये आलोचना भी ज्यादातर काव्यालोचन है । शमशेर की आलोचना में पहली जो चीज ध्यान खींचती है वह यह कि वे हिंदी और उर्दू के साहित्य को अलग अलग करके देखने की प्रवृत्ति के आम हो जाने से खासे परेशान हैं । इस प्रवृत्ति का वे तरह तरह से विरोध करते हैं । इस द्विभाजन पर उनका क्रोध और बेबसी व्यंग्य का रूप लेकर डायरी की एक टीप में प्रकट हुई है।

वे कहते हैं कि मान लीजिये कि मैं शासक जाति का हूँ और मेरे अधीन तीन चार जातियों, भाषाओं और संस्कृतियों का एक देश है तो मैं यह करूँगा कि... चारों जातियों और भाषाओं को भरसक अलग अलग रखने, एक दूसरे से उदासीन अपने को अलग अलग सबसे श्रेष्ठ समझने और दूसरे को अपने से नीचा, अपनी रूढ़ियों और धार्मिक मान्यताओं में आकंठ डूबे रहने के लिये खूब प्रोत्साहित किया जायेगा ।(कुछ गद्य रचनायें, पृष्ठ 299) यही माहौल हिंदी और उर्दू को लेकर औपनिवेशिक शासकों ने बनाया था। इस बात को शमशेर जी ने दर्द के साथ सुभद्रा कुमारी चौहान पर लिखे लेख 'राष्ट्रीय वसंत की प्रथम कोकिला' में बयान किया है। वे लिखते हैं, "खिलाफ़त वाले सत्याग्रह आंदोलन में हमारे इतिहास और संस्कृति की सभी धारायें मिलकर एक प्रचंड शक्ति का वेग बन गयी थीं । मगर वाह, उस अपराजेयता की बँधी हुई मुट्टी को साम्राज्यवाद की बेमिसाल कूटनीति ने किस तरह मसल मसल कर धीरे धीरे ढीला किया है- तब से आज तक का इतिहास यही है- उसको आज नेताओं की जख्मी उँगलियों की दुखती नसें और जोड़ बंद ही जानते हैं- कलाई से पंजा जैसे अलग हो गया है, और उँगलियाँ आपस में नहीं मिलतीं।"(कुछ गद्य रचनायें, पृष्ठ 43) ध्यान देने की बात यह है कि ऐसा वे गुलाम भारत में नहीं बल्कि आजाद भारत में लिख रहे थे । स्पष्ट है कि स्वतंत्र भारत में भी फूट डालने की नीति जारी है। शमशेर पूरी ताकत से इसके विरुद्ध लड़ते हैं।

उनका कहना है कि किसी भी अच्छे कवि को जिन परंपराओं से प्रेरणा लेनी चाहिये उनमें हिंदी के साथ साथ उर्दू की परंपरा भी शामिल है क्योंकि "हिंदी खड़ी बोली भाषा का एक रूप है । खड़ी बोली भाषा का दूसरा रूप उर्दू है।"( कुछ और गद्य रचनायें, पृष्ठ 253) इसीलिये उनके लेखन में आद्यंत हिंदी के साथ ही साथ उर्दू की साहित्यिक परंपरा का भी आधिकारिक विश्लेषण मिलता है । अनेक लोगों को इसके कारण शमशेर उर्दू की ओर थोड़ा अधिक झुके दिखाई पड़ते हैं । रामविलास शर्मा ने भी यह आरोप उन पर लगाया। 'दोआब' की भूमिका लिखते हुए उन्होंने दर्ज किया, "शमशेर का रागात्मक संबंध उर्दू काव्य से अधिक है, हिंदी काव्य से कम।"( कुछ गद्य रचनायें, पृष्ठ 17) आज इसकी जाँच पड़ताल करने पर रामविलास जी की आपत्तियों में कुछ ज्यादती महसूस होती है।

यह सही है कि शमशेर की आलोचना में कलात्मक सौष्ठव और जनप्रतिबद्धता के बीच गहरी कशमकश है लेकिन इसे उर्दू के प्रति उनके अनुराग में अवस्थित करना समस्या से मुँह मोड़ना होगा। यह द्वंद्व शुरू से ही हिंदी आलोचना में रहा है और प्रत्येक ईमानदार आलोचक ने इसको महसूस और हल किया है। प्रारंभ में यह तनाव संदेश और शैली के बीच सामंजस्य की समस्या के रूप में पेश किया जाता था। प्रगतिशील आलोचना ने संदेश की जगह प्रतिबद्धता का सवाल उठाया और इस मामले में शमशेर प्रगतिशील आलोचना के साथ हैं।

उनकी पसंदीदा कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान हैं। ऊपर उद्धृत लेख के अलावा एक और लेख उन्होंने 'सुभद्रा कुमारी चौहान : एक अध्ययन' शीर्षक से लिखा जो 'कुछ और गद्य रचनायें' में संकलित है। इस लेख में शमशेर का प्रतिबद्ध आलोचक पूरी धार के साथ मौजूद है। सुभद्रा जी की समझ की सीमा बताते हुए शमशेर लिखते हैं, "वह शायद इस बात की कायल नहीं थीं कि हमारी पूँजीवादी दुनिया आज सीधी दो तबकों में बँट गयी है। शायद उनको यह विश्वास पूरी तरह नहीं हुआ था कि आज अमीर-गरीब और ऊँच-नीच का भेद और समाज की सारी विषमताएँ अकेले जनसेवा और सुधार के संघर्षों से ही नहीं मिटाई जा सकतीं।"(कुछ और गद्य रचनायें, पृष्ठ 89-90) शमशेर सुभद्रा जी की आदर्शवादी राजनीतिक समझ को काव्यकला के प्रति उनकी उदासीनता से जोड़ते हैं। अपनी प्रिय कवयित्री के इस दृष्टिकोण से असहमति दर्ज कराते हुए शमशेर लिखते हैं, "दरअसल इस दृष्टिकोण में कला-पक्ष की एकदम उपेक्षा है, और उसके अंदर छुपी हुई है कलाकार को एक चुनौती; वस्तुतः यह उसकी हार है और दार्शनिक की विजय। यह दृष्टिकोण कलाकार और दार्शनिक दोनों का विरोध लिये हुए है, उनकी सच्ची एकता नही, जिसकी शक्ति वह कला की अभिव्यक्ति में प्रकट करता ।" (कुछ और गद्य रचनायें, पृष्ठ 93) कला के प्रति सावधानी उनके तईं कवि की जिम्मेदारी है।

ऐसा नहीं है कि कला और प्रतिबद्धता के बीच का द्वंद्व शमशेर के यहाँ पूरी तरह से हल हो गया है । 'एक बिल्कुल पर्सनल एसे' में उनका यह द्वंद्व खुलकर व्यक्त हुआ है । नागार्जुन, त्रिलोचन और अज्ञेय में फ़र्क बताते हुए वे कहते हैं, "जबकि नागार्जुन और त्रिलोचन मुझे दृष्टि देते हैं, अज्ञेय मुख्यतः 'सच्चे कलाकार की शिल्पगत अनुभूति'...।" दृष्टि और शिल्पगत अनुभूति में वे 'तत्वतः' अपने लिये- सांस्कृति प्रेरणा के लिये- कोई विरोध तो नहीं पाते, मगर 'प्रत्यक्ष' में यह अंतर महत्वपूर्ण समझते हैं। इस अंतर को स्पष्ट करने के लिये मध्यकालीन हिंदी कविता से जो उदाहरण वे ले आते हैं वह दिलचस्प हैं । "अपनी बात को और तरह से स्पष्ट करने के लिये अगर मैं कहूँ कि रामायण में और रहीम के दोहों में 'दृष्टि' और बिहारी के दोहों में 'कला की अनुभूति' है तो शायद मेरा अर्थ स्पष्ट हो।" सारतः "नागार्जुन, त्रिलोचन और केदार के यहाँ 'दार्शनिक' दृष्टिकोण मुख्य है, अज्ञेय के यहाँ कला।" (कुछ और गद्य रचनायें, पृष्ठ 32-33) यह द्वंद्व जब जीवन में ही हल नहीं हुआ है, और जब व्यक्ति समाज में मौजूद विषमता के फलस्वरूप व्यक्तित्व के विभाजन से ग्रस्त है तो स्वभाविक है कि इसकी छाया साहित्य और साहित्यालोचन में भी दिखाई पड़े।

शमशेर इस द्वंद्व से पूरी तरह वाकिफ़ हैं । इसे हल करने के लिये सैद्धांतिक स्तर पर वे कला की सामाजिक धारणा विकसित करते हैं। 'अमूर्त कला' शीर्षक लेख में वे कहते हैं, "कला की अभिव्यक्ति व्यक्ति और समाज की आशाओं- आकांक्षाओं और क्षणिक समर्थताओं का एक सजीव और गतिशील दर्पण है।" इसी लेख में अपनी बात साफ़ करते हुए आगे बताते हैं, "...जिसे हम टेकनीक या कला की अभिव्यक्ति का ढंग- ताल, छंद, तोल, विन्यास का हिसाब रखना कहते हैं- वह सिर्फ़ जीवन की गुंजलक अनुभूतियों की गति का परतौ, उनकी परछाईं, उनका आभास मात्र है।" (कुछ और गद्य रचनायें, पृष्ठ 165) अपनी सोच को यथार्थवाद के भीतर ही कायम रखने की जद्दोजहद करते हुए वे यथार्थवाद की भोंड़ी समझ का विरोध करते हैं, "यथार्थवाद का झंडा उठाने का मतलब अगर सिर्फ़ यह हो जाता है कि प्रतीक, रहस्य या केवल गति के ताल, छंद को व्यक्त करने वाली कला के हम सिरे से विरोधी हैं, तो यह मेरे ख्याल से यथार्थवाद के साथ भी अन्याय होगा ।" इस समझ के साथ वे अपना मत स्थिर करते हुए कहते हैं, "जो चीज हमारे लिये महत्वपूर्ण है, वह केवल यह कि कलाकार अपने विषय के अंदर किन तत्वों, किन विशेषताओं को दिखाना चाहता है और वह कहाँ तक उन्हें दिखाने में सफल होता है । ...शैली का यथार्थवादी या प्रतीकात्मक होना किसी कलाकृति का मूल्य निर्धारित नहीं करता । कोई कलाकृति किसी अनुभूति को कितनी सच्चाई और सफलता से व्यक्त करती है इस पर उसका मूल्य है ।" (कुछ और गद्य रचनायें, पृष्ठ 167)

कलाकृति के मूल्यांकन के लिये शैली को अपर्याप्त बताने के बाद वे कलाकार के दृष्टिकोण को भी इसके लिये नाकाफ़ी बताते हैं, "किसी विशेष दृष्टिकोण के होने से ही कोई- कोई कलाकृति अधिक निर्दोष या दोषपूर्ण नहीं हो जायेगी। कलात्मक अनुभूति की सच्चाई और शक्ति ही शैलीगत दृष्टिकोण की सार्थकता को प्रमाणित करेगी। शैली (अथवा टेकनीक) और विषयवस्तु के संबंध को हम अनुभूति की विशेषता से अलग रखकर नहीं समझ सकते । अगर अनुभूति नहीं है, या कच्ची है, तो टेकनीक भी बेकार है और विषयवस्तु भी ।" ( कुछ और गद्य रचनायें, पृष्ठ 168) कला के बारे में वे एक नया नजरिया अपनाते हैं जब कैफ़ी आजमी के प्रसंग में कहते हैं, "तमाम कला राजनीति है।" लेकिन 'कोरी राजनीति' नहीं - वह 'राजनीति' जिसमें आम आदमी की आशाएँ-आकांक्षाएँ सुलगती हैं। हर सच्चा कलाकार -देखा जाय तो, हर युग में- उसी अग्नि का ताप झेलता है।" ( कुछ और गद्य रचनायें, पृष्ठ 123) कला की इसी समझदारी के साथ शमशेर ने विभिन्न कवियोम पर विचार किया है।

कविता के क्षेत्र में शमशेर की रुचियाँ पर्याप्त विविध थीं । उर्दू उनके लिये घरेलू भाषा की तरह थी । अदबदाकर वे किसी भी प्रसंग में उर्दू कवियों का जिक्र अवश्य करते हैं। मैथिलीशरण गुप्त के साथ हाली का उनका तुलनात्मक विवेचन मशहूर है। इसमें उन्होंने दोनों कवियों की महत्ता को स्वाधीनता की भावना जगाने के प्रसंग में उजागर किया । इसके अलावा इकबाल, गालिब, फ़ैज, कैफ़ी आजमी आदि के अतिरिक्त उर्दू की कवयित्रियों पर विस्तार और अधिकार से लिखा। इसी कारण शमशेर ने आलोचना में हरेक तरीका अपनाया । उनकी आलोचना में एक ओर तो फ्रांसीसी कवि लुई अरागाँ का ऐसा विश्लेषण है जिसमें एक विदेशी कवि को पूरी तन्मयता के साथ उस देश की मिट्टी, जनता और इतिहास में अवस्थित किया गया है तो दूसरी ओर निराला की एक कविता 'बैठ ले कुछ देर / आओ, एक पथ के पथिक से, / प्रिय, अंत और अनंत के / तम-गहन जीवन घेर।' की टी एस इलियट के शब्दों में 'नीबू निचोड़ आलोचना' है । उनका एक मन ऐसे कवियों पर लहालोट है जिन्होंने वर्ण्य विषय को कविता के छंद में साध लिया है तो दूसरी ओर मुक्त छंद की विशेषतायें भी उन्हें आकर्षित करती हैं। गीतों की सफलता उन्हें स्पृहाजनक लगती है। भाषा की चुस्ती और मुहावरेदानी में चूक उनकी नजर में अक्षम्य है। अपने पसंदीदा कवियों को भी उन्होंने कठोरता से इन मानदंडों पर कसा और उनकी चूकों की ओर संकेत किये। यह कठोरता उनमें सिर्फ़ दूसरों के लिये नहीं अपने लिये भी थी। इसीलिए वे अपने आपको कवि मानने में संकोच करते रहे। आलोचक भी उन्होंने अपने को नहीं माना। फिर भी जैसे वे बड़े कवि हैं, उसी तरह एक महत्वपूर्ण आलोचक भी।

अपनी पसंदीदा प्रत्येक कविता को व्याख्यायित करने लायक विश्लेषण के औजार विकसित करने की बेचैनी शमशेर की आलोचना में कदम कदम पर दिखाई पड़ती है। इस वजह से उनकी आलोचना में प्रतिमानों की गहरी कशमकश है । बहरहाल, यह इच्छा भी बड़ी बात है जिसका अभाव कुछ दूर हो सके तो उनके शताब्दी वर्ष की यह भी महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी ।




(गोपाल प्रधान, प्रतिबद्ध आलोचक, समाज विज्ञान की पुस्तकों के बेहतरीन अनुवाद के लिए भी जाने जाते हैं. जन संस्कृति मंच से गहरा जुड़ाव. आजकल अंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में पढ़ा रहे हैं.)

2/3/11

शमशेर और गोरख को याद करते हुए...

हकीकत को लाये तखैय्युल से बाहर...
(शमशेर जन्मशती आयोजन,21-22 जनवरी, दिल्ली की रपट)


21-22 जनवरी को गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में जसम की ओर से शमशेर जन्मशती का आयोजन हुआ। इस राष्ट्रीय स्तर के आयोजन में साहित्य और कला की कई विधाओं और उन विधाओं से जुड़े लोगों का संगम हुआ। शमशेर हिंदी की प्रगतिशील धारा के ऐसे कवि रहे हैं जिनका बाद की पीढ़ी के कवियों पर बहुत प्रभाव रहा है। इस आयोजन में उनकी कविता, उनके गद्य और उनकी चित्रकला के साथ-साथ हिंदी-उर्दू का दोआब विषय पर साहित्यकारों ने अपने विचार रखे। पहले सत्र में कवियों ने अपने कविकर्म पर शमशेर के प्रभाव का जिक्र किया।

वरिष्ठ कवि वीरेन डंगवाल ने कहा कि शमशेर से हमें भौतिक दुनिया की सुंदर सच्चाइयों से बावस्ता रहने की सीख मिली। वे अपनी काव्य प्रेरणाओं को ऐतिहासिक संदर्भों के साथ जोड़ते हैं। उनकी कविता में प्राइवेट-पब्लिक के बीच कोई अंतराल नहीं है। मंगलेश डबराल ने कहा कि शमशेर मानते थे कि कविता वैज्ञानिक तथ्यों का निषेध नहीं करती। उनकी कविता आधुनिकवादियों और प्रगतिवादियों- दोनों के लिए एक चुनौती की तरह रही है। कथ्य और रूप के द्वंद्व को सुलझाने के क्रम में हर कवि को शमशेर की कविता से गुजरना होगा। गिरधर राठी ने कहा कि भाषा और शब्दों का जैसा इस्तेमाल शमशेर ने किया, वह बाद के कवियों के लिए एक चुनौती-सी रही है। वे सामान्य सी रचनाओं में नयापन ढूंढ लेने वाले आलोचक भी थे। ऐसा वही हो सकता है जो बेहद लोकतांत्रिक हो। अनामिका ने कहा कि शमशेर की कविताएं स्त्रियों के मन को छूने वाली हैं। वे बेहद अंतरंग और आत्मीय हैं। वे सरहदों को नहीं मानतीं। मदन कश्यप ने उन्हें प्रेम और सौंदर्य का कवि बताते हुए कहा कि वह सामंती-धार्मिक मूल्यों से बनी नैतिकता को कविता में तोड़ते हैं, पर उसे सीधे चुनौती देने से बचना चाहते हैं।

त्रिनेत्र जोशी ने कहा कि शमशेर संवेदनात्मक ज्ञान के कवि हैं। अपने ज्ञान और विचार को कैसे संवेदना के जरिए समेटा जाता है, हमारी पीढ़ी ने उनसे यही सीखा है। शोभा सिंह का कहना था कि शमशेर के प्रभाव से उनका कविता, मार्क्सवाद और जन-आंदोलन से जुड़ाव हुआ। इब्बार रब्बी ने शमशेर की रचनाओं और जीवन में निजत्व के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि उनकी काव्य पंक्तियां मुहावरे की तरह बन गई हैं। नीलाभ ने कहा कि शमेशर का व्यक्ति जिस तरह से जीवन को देखता है, उनकी कविता उसी का लेखाजोखा है। उनकी कविता में 1947 से पहले आंदोलन से उपजा आशावाद भी है और उसके बाद के मोहभंग से उपजी निराशाएं भी हैं। संगोष्ठी का संचालन युवा कवि अच्युतानंद मिश्र ने किया।

इस संगोष्ठी से पूर्व शमशेर, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और फैज की रचनाओं पर आधारित चित्रकार अशोक भौमिक द्वारा बनाए गए पोस्टरों और जनकवि रमाशंकर विद्रोही की पुस्तक ‘नई खेती’ का लोकार्पण प्रसिद्ध आलोचक डॉ. मैनेजर पांडेय ने किया। डॉ. पांडेय ने कहा कि कविता को जनता तक पहुंचाने का काम जरूरी है। विद्रोही भी अपनी कविता को जनता तक पहुंचाते हैं। किसान आत्महत्याओं के इस दौर में ऐसे कवि और उनकी कविता का संग्रह आना बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी कहा कि चित्रकला के जरिए कविता को विस्तार दिया जा सकता है। इस मौके पर कवि कुबेर दत्त द्वारा संपादित शमशेर पर केंद्रित फिल्म का प्रदर्शन किया गया।

दूसरे सत्र में काव्यपाठ की शुरुआत एक वीडियो के प्रदर्शन से हुई जिसमें खुद शमशेर अपनी चर्चित कविताओं को पढ़ते हुए नजर आए। उनकी आवाज में उन मर्मस्पर्शी कविताओं को सुनना एक अलग ही अनुभव था। अध्यक्षता इब्बार रब्बी
और गिरधर राठी ने की तथा संचालन आशुतोष कुमार ने किया। शोभा सिंह, कुबेर दत्त, दिनेश कुमार शुक्ल, लीलाधर मंडलोई, अनामिका, रमाशंकर यादव विद्रोही, राम कुमार कृषक, मदन कश्यप, नीलाभ, वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल, त्रिनेत्र जोशी, पंकज चतुर्वेदी आदि ने अपनी कविताएं सुनाईं, जिनमें कई कविताएं शमशेर पर केंद्रित थीं।

समारोह के दूसरे दिन 22 जनवरी को आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. मैनेजर पांडेय ने कहा कि शमशेर की कविताएं विद्वानों के लेखों या शब्दकोशो के जरिए कम समझ में आती हैं, जीवन-जगत के व्यापक बोध से उनकी कविताएं समझ में आ सकती हैं। प्रगतिशील और गैरप्रगतिशील आलोचना में यह फर्क है कि प्रगतिशील आलोचना रचना को समझने में मदद करती है, लेकिन गैर प्रगतिशील आलोचना रचना के प्रति समझ को और उलझाती है। वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि एक पल शमशेर की कविता में बहुत आता है, लेकिन यह असीम से जुड़ा हुआ पल है। काल के प्रति शमशेर का जो रुख है, वह बेहद विचारणीय है। साहित्यालोचक प्रो. नित्यानंद तिवारी ने कहा कि कठिन प्रकार में बंधी सत्य सरलता बिना किसी भीतर से जुड़ी विचारधारा के बिना संभव नहीं है। शमशेर का गद्य जीवन से जुड़ा गद्य है। वे जनसामान्य के मनोभाव की अभिव्यक्ति के लिए गद्य को प्रभावशाली मानते थे।

प्रो. राजेंद्र कुमार ने कहा कि शमशेर ऐसे कवि थे जो अभावों से अपनी भावमयता को संपन्न करते रहे। तमाम किस्म की प्रतिकूलताओं से उनकी होड़ रही। वह हकीकत को कल्पना के भीतर से बाहर लाने की तमन्ना वाले कवि है। सुरेश सलिल ने शमशेर, मुक्तिबोध, केदार और नागार्जुन जैसे कवियों को आपस में अलगाए जाने की कोशिशों का विरोध करते हुए इस पर जोर दिया कि इन सारे कवियों की सांस्कृतिक-वैचारिक सपनों की परंपरा को आगे बढ़ाए जाने की जरूरत है। अल्पना मिश्र ने कहा कि शमशेर का गद्य पूरे जनजीवन के यथार्थ को कविता में लाने के लिए बेचैन एक कवि का वैचारिक गद्य है। यह गद्य जबर्दस्त पठनीय है। कला का संघर्ष और समाज का संघर्ष अलग नहीं है, इस ओर वह बार बार संकेत करते हैं। योगेंद्र आहूजा ने कहा कि शमशेर केवल कवियों के कवि नहीं थे। नूर जहीर ने शमशेर से जुड़ी यादों को साझा करते हुए कहा कि हिंदी-उर्दू की एकता के वह जबर्दस्त पक्षधर थे। उर्दू के मिजाज को समझने पर उनका जोर था। गोबिंद प्रसाद ने शमशेर की रूमानियत का पक्ष लेते हुए कहा कि उनके समस्त रोमान के केंद्र में मनुष्य का दर्द मौजूद है। आशुतोष कुमार ने कहा कि शमशेर और अज्ञेय की काल संबंधी दृष्टियों में फर्क है। शमशेर एक क्षण के भीतर के प्रवाह को देखने की कोशिश करते हैं। उनकी कविता एक युवा की कविता है, जो हर तरह की कंडिशनिंग को रिजेक्ट करती है। अजय सिंह ने शमशेर संबंधी विभिन्न आलोचना दृष्टियों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए शमशेर को गैरवामपंथी वैचारिक प्रवृत्तियों से जोड़कर देखे जाने का विरोध किया।

आयोजन में रमण सिन्हा ने चित्रकला के ऐतिहासिक संदर्भों के साथ शमशेर की चित्रकला पर व्याख्यान-प्रदर्शन किया। कला आलोचक अनिल सिन्हा ने कहा कि विडंबना यह है कि उत्तर भारत में विभिन्न विधाओं का वैसा अंतर्मिलन कम मिलता है, जैसा शमशेर के यहां मिलता है। सुप्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक ने चित्रकला की जनसांस्कृतिक परंपरा की ओर ध्यान देने का आग्रह किया और कहा कि बाजार ने जिन चित्रकारों से हमारा परिचय कराया है वही श्रेष्ठता की कसौटी नहीं हैं, इसका उदाहरण शमशेर की चित्रकला है। कार्यक्रम का संचालन पत्रकार भाषा सिंह ने किया।

दो दिनों के इस आयोजन में नई पीढ़ी और वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों की मौजूदगी तो महत्वपूर्ण थी ही, जिस तरीके से इस आयोजन में विभिन्न विधाओं में सक्रिय रचनाकारों और कलाकारों ने अपनी भागीदारी निभाई, वह भी उत्साहवर्द्धक रहा। सभागार के बाहर प्रदर्शित अशोक भौमिक द्वारा बनाए गए शमशेर की कविताओं पर आधारित विशाल पोस्टर भी आयोजन का आकर्षण थे, इन पोस्टरों में मुकेश बिजौले और अनुपम के चित्रों का इस्तेमाल किया गया था। बहुआयामी प्रतिभा वाले शमशेर की सृजनात्मकता के हर रंग को इस आयोजन ने दिल्ली के साहित्य जगत के समक्ष पेश किया।


कविता! युग की नब्ज़ धरो...
(गोरख स्मृति संकल्प और जसम, उत्तर प्रदेश के पांचवें राज्य सम्मेलन 29-30 जनवरी 2011 की रपट)

गोरख स्मृति संकल्प और जसम, उत्तर प्रदेश का पांचवा राज्य सम्मेलन 29-30 जनवरी 2011 को कवि गोरख पांडेय के गांव में संपन्न हुआ। गोरख के गुजरने के 21 साल बाद जब पिछले बरस लोग देवरिया जनपद के इस ‘पंडित का मुंडेरा’ गांव में जुटे थे, तब करीब 65 लोगों ने गोरख से जुड़ी अपनी यादों को साझा किया था। इस बार भी वे उत्प्रेरक यादें थीं। उनके सहपाठी अमरनाथ द्विवेदी ने संस्कृत विश्वविद्यालय में छात्रसंघ के अध्यक्ष और बीचयू में एक आंदोलनकारी छात्र के बतौर उनकी भूमिका को याद किया। उन्होंने बताया कि गोरख अंग्रेजी के वर्चस्व के विरोधी थे, लेकिन हिंदी के कट्टरतावाद और शुद्धतावाद के पक्षधर नहीं थे। बीचयू में संघी कुलपति के खिलाफ उन्होंने छात्रों के आंदोलन का नेतृत्व किया, जिसके कारण उन्हें विश्वविद्यालय प्रशासन की यातना भी झेलनी पड़ी। साम्राज्यवादी-सामंती शोषण के खिलाफ संघर्ष के लिए उन्होंने नक्सलवादी आंदोलन का रास्ता चुना और उसके पक्ष में लिखा। जहां भी जिस परिवार के संपर्क में वे रहे उसे उस आंदोलन से जोड़ने की कोशिश की।

भर्राई हुई आवाज में राजेन्द्र मिश्र ने उनकी अंतिम यात्रा में उमड़े छात्र-नौजवानों, रचनाकारों और बुद्धिजीवियों के जनसैलाब को फख्र से याद करते हुए कहा कि मजदूरों और गरीबों की तकलीफ से वे बहुत दुखी रहते थे। फसल कटाई के समय वे हमेशा उनसे कहते कि पहले वे अपनी जरूरत भर हिस्सा घर ले जाएं, उसके बाद ही खेत के मालिक को दें। पारसनाथ जी के अनुसार वे कहते थे कि अन्याय और शोषण के राज का तख्ता बदल देना है और सचमुच उनमें तख्ता बदल देने की ताकत थी। गोरख की बहन बादामी देवी ने बड़े प्यार से उन्हें याद किया। उन्हें सुनते हुए ऐसा लगा जैसे गोरख की बुआ भी वैसी ही रही होंगी, जिन पर उन्होंने अपनी एक मशहूर कविता लिखी थी। जसम महासचिव प्रणय कृष्ण ने कहा कि जिस संगठन को गोरख ने बनाया था उसकी तरफ से उनकी कविता और विचार की दुनिया को याद करते हुए खुद को नई उर्जा से लैस करने हमलोग उनके गांव आए हैं। गोरख ने मेहनतकश जनता के संघर्ष और उनकी संस्कृति को उन्हीं की बोली और धुनों में पिरोकर वापस उन तक पहुंचाया था। उन्होंने सत्ता की संस्कृति के प्रतिपक्ष में जनसंस्कृति को खड़ा किया था, आज उसे ताकतवर बनाना ही सांस्कृतिक आंदोलन का प्रमुख कार्यभार है।

इसके बाद ‘जनभाषा और जनसंस्कृति की चुनौतियां’ विषय पर जो संगोष्ठी हुई वह भी इसी फिक्र से बावस्ता थी। आलोचक गोपाल प्रधान दो टूक तरीके से कहा कि हर चीज की तरह संस्कृति का निर्माण भी मेहनतकश जनता करती है, लेकिन बाद में सत्ता उस पर कब्जा करने की कोशिश करती है। भोजपुरी और अन्य जनभाषाओं का बाजारू इस्तेमाल इसलिए संभव हुआ है कि किसान आंदोलन कमजोर हुआ है। समकालीन भोजपुरी साहित्य के संपादक अरुणेश नीरन ने कहा कि जन और अभिजन के बीच हमेशा संघर्ष होता है, जन के पास एक भाषा होती है जिसकी शक्ति को अभिजन कभी स्वीकार नहीं करता, क्योंकि उसे स्वीकार करने का मतलब है उस जन की शक्ति को भी स्वीकार करना। कवि प्रकाश उदय का मानना था कि सत्ता की संस्कृति के विपरीत जनता की संस्कृति हमेशा जनभाषा में ही अभिव्यक्त होगी। कवि बलभद्र की मुख्य चिंता भोजपुरी की रचनाशीलता को रेखांकित किए जाने और भोजपुरी पर पड़ते बाजारवादी प्रभाव को लेकर थी।

प्रो. राजेंद्र कुमार ने कहा कि जीवित संस्कृतियां सिर्फ यह सवाल नहीं करतीं कि हम कहां थे, बल्कि वे सवाल उठाती हैं कि हम कहां हैं। आज अर्जन की होड़ है, सर्जन के लिए स्पेस कम होता जा रहा है। सत्ता की संस्कृति हर चीज की अपनी जरूरत और हितों के अनुसार अनुकूलित करती है, जबकि संस्कृति की सत्ता जनता को मुक्त करना चाहती है। प्रेमशीला शुक्ल ने जनभाषा के जन से कटने पर फिक्र जाहिर की। विद्रोही ने कहा कि हिंदी और उससे जुड़ी जनभाषाओं के बीच कोई टकराव नहीं है, बल्कि दोनों का विकास हो रहा है। हमें गौर इस बात पर करना चाहिए कि उनमें कहा क्या जा रहा है। संगोष्ठी के अध्यक्ष और सांस्कृतिक-राजनैतिक आंदोलन में गोरख के अभिन्न साथी रामजी राय ने कहा कि गोरख उन्हें हमेशा जीवित लगते हैं, वे स्मृति नहीं हैं उनके लिए। जनभाषा में लिखना एक सचेतन चुनाव था। उन्होंने न केवल जनता की भाषा और धुनों को क्रांतिकारी राजनीति की उर्जा से लैस कर उन तक पहुंचाया, बल्कि खड़ी बोली की कविताओं को भी लोकप्रचलित धुनों में ढाला, ‘पैसे का गीत’ इसका उदाहरण है। अपने पूर्ववर्ती कवियों और शायरों की पंक्तियों को भी गोरख ने बदले हुए समकालीन वैचारिक अर्थसंदर्भों के साथ पेश किया।

उन्होंने कहा कि जनभाषाएं हिंदी की ताकत हैं और बकौल त्रिलोचन हिंदी की कविता 'उनकी कविता है जिनकी सांसों को आराम न था।' सत्ता के पाखंड और झूठ का निर्भीकता के साथ पर्दाफाश करने के कारण ही गोरख की कविता जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हुई। ‘समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आई’ संविधान में समाजवाद का शब्द जोड़कर जनता को भ्रमित करने की शासकवर्गीय चालाकी का ही तो पर्दाफाश करती है जिसकी लोकप्रियता ने भाषाओं की सीमाओं को भी तोड़ दिया था, कई भाषाओं में इस गीत का अनुवाद हुआ। रामजी राय ने गोरख की कविता ‘बुआ के नाम’ का जिक्र करते हुए कहा कि मां पर तो हिंदी में बहुत-सी कविताएं लिखी गई हैं, पर यह कविता इस मायने में उनसे भिन्न है कि इसमें बुआ को मां से भी बड़ी कहा गया है। संगोष्ठी का संचालन आलोचक आशुतोष कुमार ने किया।

सांस्कृतिक सत्र में हिरावल (बिहार) के संतोष झा, समता राय, डी.पी. सोनी, राजन और रूनझुन तथा स्थानीय गायन टीम के जितेंद्र प्रजापति और उनके साथियों ने गोरख के गीतों का गायन किया। संकल्प (बलिया) के आशीष त्रिवेदी, समीर खान, शैलेंद्र मिश्र, कृष्ण कुमार मिट्ठू, ओमप्रकाश और अतुल कुमार राय ने गोरख पांडेय, अदम गोंडवी, उदय प्रकाश, विमल कुमार और धर्मवीर भारती की कविताओं पर आधारित एक प्रभावशाली नाट्य प्रस्तुति की। आशीष मिश्र ने भिखारी ठाकुर के मशहूर नाटक विदेशिया के गीत भी सुनाए, इस दौरान लोकधुनों का जादुई असर से लोग मंत्रमुग्ध हो गए। इस अवसर पर एक काव्यगोष्ठी भी हुई, जिसमें अष्टभुजा शुक्ल, कमल किशोर श्रमिक, रमाशंकर यादव विद्रोही, राजेंद्र कुमार, कौशल किशोर, रामजी राय, प्रभा दीक्षित, चंद्रेश्वर, भगवान स्वरूप कटियार, चतुरानन ओझा, सच्चिदानंद, मन्नू राय, सरोज कुमार पांडेय ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। संचालन सुधीर सुमन ने किया।

सम्मेलन में प्रतिनिधियों ने मनोज सिंह को जसम, उ.प्र. के राज्य सचिव और प्रो. राजेद्र कुमार को अध्यक्ष के रूप में चुनाव किया। इस अवसर पर एक स्मारिका भी प्रकाशित की गई है, जिसमें गोरख की डायरी से प्राप्त कुछ अप्रकाशित कविताएं, जनसंस्कृति की अवधारणा पर उनका लेख और उनके जीवन और रचनाकर्म से संबंधित शमशेर बहादुर सिंह, महेश्वर और आशुतोष के लेख और साक्षात्कार हैं। इस बीच 29 जनवरी को बिहार के आरा और समस्तीपुर में भी गोरख की स्मृति में आयोजन हुए। आरा में काव्यगोष्ठी की अध्यक्षता कथाकार नीरज सिंह, आलोचक रवींद्रनाथ राय और जसम के राज्य अध्यक्ष रामनिहाल गुंजन ने की तथा संचालन राकेश दिवाकर ने किया। इनके अतिरिक्त सुमन कुमार सिंह, ओमप्रकाश मिश्र, सुनील श्रीवास्तव, के.डी. सिंह, कृष्ण कुमार निर्मोही, भोला जी, अरुण शीतांश, संतोष श्रेयांस,जगतनंदन सहाय, अविनाश आदि ने अपनी कविताओं का पाठ किया तथा युवानीति के कलाकारों ने गोरख के गीत सुनाए। समस्तीपुर में डा. सुरेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में गोरख की याद में आयोजित संकल्प संगोष्ठी में रामचंद्र राय ‘आरसी’, डा. खुर्शीद खैर, डा. मोईनुद्दीन अंसारी, डा. एहतेशामुद्दीन, डा. सीताराम यादव और डा. सुरेंद्र प्रसाद सुमन ने अपने विचार रखे।

(सुधीर सुमन द्वारा भेजी गयी रपटें)

2/2/11

उस्ताद अमीर खान साहब

एक बार पंडित भीमसेन जोशी से किसी ने चुहल करते कहा- 'आप तो समझ में आते हैं, पर अमीर खान साहब समझ में नहीं आते हैं.' जोशी जी अमीर खान साहब के गायन के मुरीद थे. सो उन्होंने पलटकर फरमाया- 'आप मुझे सुनिए. मैं अमीर खान साहब को सुनता हूँ.'
जोशी जी का यह कहना विनम्रता मात्र नहीं थी. सचमुच रेशम सी मखमली आवाज़ के मालिक उस्ताद अमीर खान साहब शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में मील के पत्थर हैं. मुरकी और तिहाई का जैसा सुन्दर इस्तेमाल खान साहब के यहाँ है, वह उन्हीं को सोभता है.

सुनिए राग मारवा में
गुरु बिन ज्ञान न पावे

और राग दरबारी में
किन बैरन कान भरे






उस्ताद अमीर खान (1912 -1974), संगीत की तालीम मुख्यतः अपने पिता शाहमीर खान से, इंदौर घराने के संस्थापक.

2/1/11

'एक बार हम गएन बंबई....' और 'होल इन द बकेट...'


बच्चों के लिए लिखे गए पुराने लोकगीत एक ख़ास ढर्रा पकड़ कर चलते हैं. उनमें से कुछ कार्य-कारण श्रृंखला को रोचक बनाते हुए आगे बढ़ते हैं. दुनिया में हर जगह बच्चों के लिए लिखे गए गीतों में यह कामन बात है. हो सकता है कि बच्चों की सवाल पूछने की प्रवृति को ध्यान में रख कर इन गीतों को बुना गया हो.

आज पढ़िए अवधी-भोजपुरी अंचल में बच्चों के लिए गाया जाने वाला एक गीत-

एक बार हम गएन बंबई नौकरी कीन्हा तीन
दुई ठो छोड-छाड़ दीन एक ठो कईबई नाहीं कीन

जवन कईबई नहीं कीन वोहमें मिला रुपैया तीन
दुई तो फाट-फूट गै एक ठो चलबै नाहीं कीन

जवन चलबै नाहीं कीन ओसे गाँव बसावा तीन
दुई तो उजरि पुजरि गै एक ठो बसबई नाहीं कीन

जवन बसबई नाहीं कीन ओहमें कोहार बसावा तीन
दुई तो मरी-खपि गै एक ठो अईबई नाहीं कीन

जवन अईबई नाहीं कीन उहै हांडी पकावा तीन
दुई तो फूट-फाट गै एक ठो पकबई नाहीं कीन

जवन पकबई नाहीं कीन ओहमें चाउर पकावा तीन
दुई तो जर-भुनि गै एक ठो भबई नहीं कीन

जवन भबे नाहीं कीन ओहमें पंडित खियावा तीन
दुई तो भाग-भूग गै एक ठो अईबई नहीं कीन

जवन अईबई नहीं कीन ओके मारा लाठी तीन
दुई तो ऐहमुर-ओहमुर परि गै एक ठो लगबै नाहीं कीन

जवन लगबै नाहीं कीन ओह्पे चला मुकदमा तीन
दुई तो छूट छाट गै एक में पेशिअई नहीं दीन

और सुनिए हैरी बेलाफोंटे की आवाज़ में बच्चों की यह कविता. बेलाफोंटे ने इसे 61 में रिकार्ड कराया था. ये एक पुराने लोकगीत का बदला हुआ रूप है. इसके बोल ये रहे-

There's a hole in my bucket, dear Liza, dear Liza,
There's a hole in my bucket, dear Liza, a hole.
Then fix it, dear Henry, dear Henry, dear Henry,
Then fix it, dear Henry, dear Henry, fix it.

With what shall I fix it, dear Liza, dear Liza?
With what shall I fix it, dear Liza, with what?
With a straw, dear Henry, dear Henry, dear Henry,
With a straw, dear Henry, dear Henry, a straw.

The straw is too long, dear Liza, dear Liza,
The straw is too long, dear Liza, too long,
Then cut it, dear Henry, dear Henry, dear Henry,
Then cut it, dear Henry, dear Henry, cut it.

With what shall I cut it, dear Liza, dear Liza?
With what shall I cut it, dear Liza, with what?
With an ax, dear Henry, dear Henry, dear Henry,
With an ax, dear Henry, dear Henry, an ax.

The ax is too dull, dear Liza, dear Liza,
The ax is too dull, dear Liza, too dull.
Then sharpen it, dear Henry, dear Henry, dear Henry,
Then sharpen it, dear Henry, dear Henry, sharpen it.

With what shall I sharpen it, dear Liza, dear Liza?
With what shall I sharpen it, dear Liza, with what?
With a stone, dear Henry, dear Henry, dear Henry,
With a stone, dear Henry, dear Henry, a stone.

The stone is too dry, dear Liza, dear Liza,
The stone is too dry, dear Liza, too dry.
Then wet it, dear Henry, dear Henry, dear Henry,
Then wet it, dear Henry, dear Henry, wet it.

With what shall I wet it, dear Liza, dear Liza?
With what shall I wet, dear Liza, with what?
With water, dear Henry, dear Henry, dear Henry,
With water, dear Henry, dear Henry, water.

In what shall I carry it, dear Liza, dear Liza?
In what shall I carry it, dear Liza, in what?
In a bucket, dear Henry, dear Henry, dear Henry,
In a bucket, dear Henry, dear Henry, bucket.

There's a hole in my bucket, dear Liza, dear Liza,
There's a hole in my bucket, dear Liza, a hole..