5/31/11

राशिद खान- नचिकेता



राशिद खान हिन्दुस्तानी के जितने बड़े गायक हैं, वैसे ही बांग्ला के नचिकेता. यह विरल संयोग है की दोनों ने एक साथ रिकार्डिंग करवाई, न सिर्फ एक साथ बल्कि एक ही ट्रैक में पहले आप राशिद साहब से कुछ सुनेंगें और फिर उसी के आस-पास का बांग्ला में नचिकेता से.
फ्यूजन का यह प्रयोग मुझे हमेशा से बहुत भला लगा है. कुछ तो इसलिए की राशिद खान साहब मुझे बेहद पसंद हैं और कुछ इसलिए कि भारतीय भाषाओं के बीच जो सम्बन्ध बनने चाहिए, उस बेहतर दिशा की और ये अल्बम इशारा करता है. हिन्दी- बांग्ला के साहित्यकारों को भी इस दिशा में कुछ चेत हो तो क्या ही मज़ा रहे....


सुनिए इसी अल्बम से दो गीत-


अरी हे आली पीया बिन ...
रंग रंगीला बनरा मेरा...





(ऊपर के चित्र के चित्रकार हैं जार्ज पॉली, चित्र शीर्षक है - म्यूजिक 114)

5/30/11

बेगम अख्तर- तीन बंदिशें


बेगम अख्तर से गज़लें सुनना और ठुमरी-दादरा सुनना दो अलग अनुभव हैं. जब वे ग़ालिब की गज़लें गातीं है तो एक पुरानी दुनिया सामने आ जाती है जिसका शीराज़ा बिखरने को है. ग़ालिब की शायरी के इस मर्म को बेगम साहिबा ने जितनी गहराई से ज़ज्ब किया, उतना और किसी ने नहीं. पर वही बेगम साहिबा जब लोक और शास्त्रीय गायन के बीच घूमती, ठुमरी और दादरा के रंग में होती हैं तो आप एक नयी चीज का अनुभव करते हैं. एक ख़ास घरेलूपने का, जिसे पुरानी पीढी की महिलायें बहुत सहेज के अपने पास रखती थीं.

मैं जब भी उनको ठुमरी या दादरा गाते हुए सुनता हूँ तो मुझे अपने गाँव की प्रौढ़ महिलायें याद आ जाती हैं, पान का बीड़ा दबाये पीढ़े पर बैठी हुई, कुछ गुनगुनाती हुई.

आज सुनते हैं उसी पुरकशिश आवाज़ में ये तीन बंदिशें -

हमार कही मानो राजा जी...
सोवत निंदिया जगाई...
पत राखो न राखो...




5/5/11

मजदूरों पर फायरिंग की जनसंगठनों ने तीव्र निंदा की

गोरखपुर में मजदूरों पर फायरिंग की जनसंगठनों ने तीव्र निंदा की

गोरखपुर। बरगदवा स्थित औद्योगिक इकाई अंकुर उद्योग लिमिटेड पर मंगलवार की सुबह फैक्टी के प्रबन्ध तंत्र के इशारे पर की गई फायरिंग में डेढ दर्जन से अधिक मजदूरों के घायल होने की घटना की जनसंगठनों, मानवाधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तीव्र निंदा की है। आज दोपहर हुई एक बैठक में इस घटना को प्रशासन की शह पर पूंजीपतियों, संगठित आपराधिक गिरोहों और साम्प्रदायिक ताकतों के गठजोड़ द्वारा किया गया बताया गया।

बैठक में कहा गया कि लम्बे अर्से से बरगदवा और गीडा स्थित औद्योगिक इकाइयों में कार्यरत मजदूरों द्वारा श्रम कानूनों का पालन कराने की मांग उठाई जा रही है लेकिन कारखानेदारों, प्रशासन और श्रम विभाग द्वारा मजदूरों की आवाज पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। जब मजदूर अपने शोषण के खिलाफ संगठित हो गए और अपने हक के लिए लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करने लगे तो इस आंदोलन को बदनाम करने का प्रयास किया जाने लगा। आंदोलन को माओवादियों द्वारा प्रेरित कहा गया। इससे भी जब मजदूरों की एकता कमजोर नहीं हुई तो उनके दमन का प्रयास शुरू हुआ।

पिछले वर्ष साम्प्रदायिक ताकतों ने मजदूरों और उनके नेताओं पर हमला किया। प्रशासन ने हमलावरों पर कार्यवाही करने के बजाय मजदूर नेताओं को ही पकड़कर जेल में डाल दिया लेकिन इसके खिलाफ मजदूरों व गोरखपुर के नागरिक समाज के प्रबल प्रतिरोध के कारण प्रशासन को झुकना पड़ा और मजदूर आंदोलन की जीत हुई लेकिन एक बार फिर उन्हीं ताकतों ने संगठित आपराधिक गिरोह की मदद से मजदूरों पर फायरिंग कर आंदोलन को कुचलने की कोशिश की है। बैठक में प्रशासन को आगाह किया गया कि यदि उसने मजदूरों पर बर्बर हमले के इस मामले में प्रबंध तंत्र और उसके पालतू अपराधियों को बचाने का प्रयास किया तो नागरिक समाज चुप नहीं बैठेगा और सडक पर उतर कर प्रतिरोध करेगा।

बैठक में मजदूर संगठनों, इंसाफ पसंद राजनीतिक ताकतों, मानवाधिकार संगठनों और राजनीतिक दलों से मजदूरों पर बर्बर हमले के खिलाफ एकजुट होने और जोरदार संघर्ष छेड़ने का आहवान किया गया। बैठक में पीयूसीएल के जिला संयोजक फतेहबहादुर सिंह, वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन, पीयूएचआर के अध्यक्ष सुभाष पाल एडवोकेट, श्याममिलन एडवोकेट, जनसंस्कृति मंच के प्रदेश सचिव मनोज कुमार सिंह, अशोक चैधरी, गोपाल राय, बैजनाथ आदि उपस्थित थे।

जन संस्कृति मंच की प्रेस विज्ञप्ति
4 मई. दिल्ली

जन संस्कृति मंच कल ३ मई के दिन गोरखपुर (उ.प्र.) के बरगदवा औद्योगिक क्षेत्र की अंकुर उद्योग लि. नामक फैक्‍ट्री के मालिक द्वारा कुख्‍यात हिस्‍ट्री शीटर प्रदीप सिंह और उसके गुंडों के माध्यम से मजदूरों पर गोली चलाए जाने की कठोर भर्त्सना करता है और दोषियों को तत्काल दंडित करने की मांग करता है. यह घटना मज़दूरों द्वारा मई दिवस के अवसर पर दिल्ली में मांगापत्रक आन्दोलन में शरीक होने से बौखलाए उद्योगपतियों द्वारा अंजाम दी गयी. विगत दो सालों से इस क्षेत्र में चल रहे आन्दोलन के खिलाफ उद्योगपतियों के समर्थन में एक ओर वहां के सांसद आदित्य नाथ तो दूसरी ओर पूरा जिला प्रशासन लामबंद है और आन्दोलन को हतोत्साहित करने और दमन की पृष्ठभूमि बनाने के लिए उसे कभी ''चर्च के पैसे से चल रहा'' बताया जा रहा है, तो कभी माओवादियों द्वारा भड़काया गया बताया जा रहा है.

इस घटना में भी प्रशासन का रुख यही है कि बजाय उद्योगपतियों और उनके गुंडों पर कार्रवाई करने के वह मज़दूर नेताओं और अगुवा मज़दूरों को हिंसा की इस घटना में फर्जी ढंग से फंसाने की जुगत में है. हम सभी लोकतांत्रिक ताकतों से अपील करते हैं कि इसमें प्रशासन को कामयाब न होने दें.

जन संस्कृति मंच घायल हुए २० मज़दूरों, फैक्ट्री का घेराव साथियों और वहां के मजदूर आन्दोलन से अपनी एकजुटता ज़ाहिर करता है.

( प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी )

हस्ताक्षर के लिए याचिका का लिंक यहाँ है-
http://www.petitiononline.com/gkpfir/petition.html